रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २६२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गोली बना लेवे। प्रातःकाल तीन गोलियोंका सेवन करे और ऊपरसे शीतल जलका अनुपान करे तो केवल पैत्तिक क्रिमिरोग तथा कदाचित वातपैत्तिक क्रिमिरोग भी नष्ट होता है। इसको श्रीमान् गहनानन्दनाथने कहा है। इसको क्रिमिशूलिजलप्लव रस कहते हैं ॥ १६-१८ ॥ क्रिमिकाष्ठानल रस । विशुद्धं पारदं गन्धं वङ्गं तालं वराटकम् । मनःशिला कृष्णकाचं सोमराजीं विडङ्गकम् ॥१९॥ दन्तीबीजञ्च जैपालं शिवा टङ्कणचित्रकम् । कर्षमात्रन्तु प्रत्येकं वज्रीक्षीरेण मर्दयेत् ॥ २० ॥ कलायसदृशीं कृत्वा वटिकां भक्षयेत्ततः । क्रिमिकाष्ठानलो नाम रसोऽयं परिनिर्मितः ॥ श्लैष्मिके श्लेष्मपित्ते च श्लेष्मवाते च शस्यते ॥२१॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक, वंगभस्म, हरतालभस्म, कौड़ीकी भस्म, मैन- शिल, काले रंगका कांच, बावची, वायविडंग, दन्तीके बीज, जमाल- गोटा, हरड़, सुहागा और चित्रककी जड़ यह प्रत्येक औषधि एक एक तोला परिमाण लेकर थूहरके दूधमें खरल करके मटरकी बराबर गोली बना लेवे। इस औषधिके सेवन करनेसे कफजक्रिमि, कफपित्तजक्रिमि और कफवातजक्रिमि रोग नष्ट होता है । इसको क्रिमिकाष्ठानल रस कहते हैं ॥ १९-२१ ॥ लाक्षादि वटी । लाक्षाभल्लातश्रीवासश्वेतापराजिताशिका । अर्जुनस्य फलं पुष्पं विडङ्गमथ गुग्गुलुः ॥ २२ ॥ एभिः कीटाश्च शाम्यन्ते तिष्ठतापि गृहे सदा ।