रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २६३ ) भुजङ्गा मूषिका दंशाः संघनामा मतङ्गजाः । दूरादेव पलायन्ते किं न कीटाश्च ये पराः ॥ २३ ॥ लाख, भिलावे, श्रीवासका गोंद ( गंधबिरोजा ), सुफेद कोइलकी जड़, अर्जुनके फल, अर्जुनके फूल, वायविडंग और गूगल इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर एकत्र मर्दन करके गोली बना लेवे; इन गोलियोंके सेवन करनेसे क्रिमिरोग नष्ट होता है । जिस घरमें यह औषधि स्थित रहती है उस घरमेंसे साँप, चूहे, डांस, मकोड़े आदि जीव दूर भाग जाते हैं । इसको लाक्षादि वटी कहते हैं ॥ २२ ॥ २३ ॥ क्रिमिहर रस । शुद्धसूतमिन्द्रयवमजमोदा मनःशिला । पलाशबीजं गन्धश्च देवदाल्या द्रवैर्दिनम् ॥ २४ ॥ संमर्द्य भक्षयेन्नित्यं शालपर्णीरसैः सह । सितायुक्तं पिबेच्चानु क्रिमिपातो भवत्यलम्॥ २५ ॥ पारा, इन्द्रजौ, अजमोद, मैनशिल, ढाकके बीज और गंधक इन सब औषधियोंको समान भाग लेकर देवदाली ( वंदाल ) के रसमें एक दिन तक खरल करके गोली बना लेवे, शालिपर्णीके रस और मिश्रीके साथ इन गोलियोंके सेवन करनेसे उदरस्थित सम्पूर्ण क्रिमि नष्ट हो जाते हैं । इसको क्रिमिहर रस कहते हैं ॥ २४ ॥ २५ ॥ विडंगलोह । रसं गन्धञ्च मरिचं जातीफललवंगकम् । कणा तालं शुण्ठि टङ्कं प्रत्येकं भागसम्मितम् ॥ २६ ॥ सर्वचूर्णसमं लौहं विडङ्गं सर्वतुल्यकम् । लौहं विडङ्गकं नाम कोष्ठस्थक्रिमिनाशनम् ॥२७॥