भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पूर्या वराटिका तेन टंकणेन विलेपयेत् ॥ ३३ ॥ वराटीं पूरयेद्भाण्डे रुद्धां गजपुटे पचेत् । विचूर्णयेत्स्वांगशीते पोट्टलीं हेमगर्भिकाम् । मृगांकवच्चतुर्गुञ्जामक्षणाद्राजयक्ष्मनुत् ॥ ३४ ॥ पारेकी भस्म ३ भाग, सोनेकी भस्म १ भाग, तांबा भस्म १ भाग, गंधक १ भाग इन सब औषधियोंको एकत्रकर चित्रकके रसमें दो प्रहर तक खरल करके एक कौड़ीमें भर देवे और उस कौड़ीके मुखको सुहा- गेसे बंद कर देवे, फिर उस कौड़ीको मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे, शीतल होनेपर कौड़ीको पीसकर चूर्ण कर ले । फिर इसको चार रत्ती परिमाण मृगांकके समान सेवन करनेसे राजयक्ष्मा रोग नष्ट होता है । इसको हेमगर्भपोट्टली रस कहते हैं ॥ ३२-३४ ॥ सर्वांगसुन्दर रस । रसं गन्धञ्च तुल्यांशं द्वौ भागौ टंकणस्य च । मौक्तिकं विद्रुमं शंखभस्म देयं समांशकम् ॥ ३५॥ हेमभस्मार्धभागञ्च सर्वं खल्ले विमर्दयेत् । निम्बुद्रवेण संपिष्य पिडिकां कारयेत्ततः ॥ ३६ ॥ पश्चाद्गजपुटं दत्त्वा सुशीतञ्च समुद्धरेत् । हेमभस्मसमं तीक्ष्णं तीक्ष्णार्धं दरदं मतम् ॥ एकीकृत्य समस्तानि सूक्ष्मचूर्णानि कारयेत् ॥३७॥ पारा १भाग, गन्धक १ भाग, सुहागा २ भाग तथा मोती, मूंगा और शंखकी भस्म यह सब एक २ भाग और स्वर्णभस्म आधा भाग लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर कागजी नींबूके रसमें खरल करके पिण्डा- कार बनाकर मूषामें रखकर गजपुटमें पकावे । शीतल होनेपर मूषा- मस औषधिको निकालकर पश्चात् उसमें आधा भाग तीक्ष्ण लोहभस्म और लोहेसे आधा भाग सिंग्रफ मिलाकर बारीक पीस लेवे ॥ ३५-३७॥