रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २९६ ) सोनाभस्म, रससिन्दूर या पारद् भस्म, गन्धक, मोती, शुद्ध पारा, सुहागा, चांदी भस्म और सोनामाखीभस्म यह प्रत्येक औषधि समान भाग लेकर कांजीमें पीसकर गोलासा बना लेवे । फिर इस पिंडको मिट्टीमें लपेटकर धूपमें सुखाकर नमकसे भरी हुई हांडीमें रखकर एक दिन तक मन्द मन्द अग्निसे पकावे । जब शीतल होजाये तब इसमेंसे औषधिको निकालकर चूर्ण कर ले । दो रत्ती परिमाण इस औषधिको कालीमिरचोंके चूर्ण और घृतके साथ सेवन करे तो राजयक्ष्मा रोग नष्ट होता है । इसको कुमुदे-श्वर रस कहते हैं ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ यक्ष्मकेसरी रस । त्रिकटुत्रिफलैलाभिर्जातीफललवङ्गकैः । नवभागोन्मितैस्तुल्यं लौहपारदसिन्दुरम् ॥ मधुना क्षयरोगाँश्च हन्त्ययं यक्ष्मकेसरी ॥ ७० ॥ हरड़, बहेड़ा, आमला, सोंठ, मिरच, पीपल, इलायची, जायफल और लौंग यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग, लोहभस्म ९ भाग, रससिन्दूर नव भाग और स्वर्णसिन्दूर ९ भाग लेवे, इन सब औषधि- योंको एकत्र पीसकर सहतमें मिलाकर सेवन करे तो क्षयरोग नष्ट होता है । इसको यक्ष्मकेसरी रस कहते हैं ॥ ७० ॥ बृहच्चन्द्रामृत रस । रसगन्धकयोर्ग्राह्यं कर्षमेकं सुशोधितम् । अभ्रं निश्चन्द्रकं दद्यात्पलार्द्धञ्च विचक्षणः ॥ ७१ ॥ कर्पूरं शाणकं दद्यात्स्वर्णं तोलकसंमितम् । ताम्रञ्च तोलकं दद्याद्विशुद्धं मारितं भिषक् ॥ ७२॥ लौहं कर्षं क्षिपेत्तत्र वृद्धदारकजीरकम् । विदारी शतमूली च क्षुरकञ्च बला तथा ॥ ७३ ॥