भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (२९९) मातुलुंगवरावह्निस्वम्लवेतसमार्कवम् । हयमाराद्र्करसैः पाचितो लघुवह्निना ॥ ८९ ॥ वातपित्तकफोत्क्लेशान् ज्वरान् संमर्दितानपि । सन्निपातं निहन्त्याशु सर्वाङ्गैकाङ्गमारुतान् ॥ ९० ॥ सेवितश्च सितायुक्तो मागधीरजसा युतः । मधुकाद्र्कसंयुक्तस्तद्व्याधिहरणौषधैः ॥ ९१ ॥ सेवितो हन्ति रोगान्हि व्याधिवारणकेसरी । क्षयमेकादशविधं शोषं पाण्डुं क्रिमिं जयेत् ॥ ९२ ॥ कासं पञ्चविधं श्वासं मेहमेदोमहोदरम् । अश्मरीं शर्करां शूलं प्लीहगुल्महलीमकम् ॥ सर्वव्याधिहरो बल्यो वृष्यो मेध्यो रसायनः ॥ ९३ ॥ पश्चात् इसको लोहेके पात्रमें डालकर बिजौरे नींबू, त्रिफला, चीता, अमलवेत, भांगरा, कनेर और अदरखके रसमें मन्द मन्द अग्निसे पकावे । इस औषधिके सेवन करनेसे वातपित्त, कफोत्क्लेश, ज्वर, सन्निपात, सर्वांगव्याप्त वातरोग और एकांगाश्रित वातरोग नष्ट होते हैं । इस औषधिको मिश्री और पीपलके चूर्णके साथ, मुलेठी और अदरखके रसके साथ, अथवा व्याधिनाशक अन्यान्य औषधियोंके साथ सेवन करनेसे ग्यारह प्रकारका क्षय, शोष, पांडु, क्रिमि, पांच प्रकारकी खाँसी, श्वास, प्रमेह, मेद, उदररोग, अश्मरी, शर्करा, शूल, प्लीहा, गुल्म और हलीमक प्रभृति समस्त रोग नष्ट होते हैं । तथा बल, वीर्य, मेधा और रसकी वृद्धि होती है ॥ ८९-९३ ॥