भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ३९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । आहार और व्यवहारादि प्रयोग करे । बल और वीर्यवर्द्धक समस्त पदार्थ भक्षण करे और रसविरोधी सकल पदार्थोंको त्याग देवे । इस औषधिके सेवन करनेसे अनेक उपद्रव युक्त राजयक्ष्मा, ज्वर, गुल्म, विद्रधि, मन्दाग्नि, स्वरभेद, खाँसी, अरुचि, वमन, मूर्च्छा, भ्रम, आठ प्रकारके महारोग, विषरोग, पांडुरोग, कामला, पित्तजन्य अनेक प्रकारके रोग और इसके अतिरिक्त अन्यान्य अनेक रोग नष्ट हो जाते हैं । इसको महामृगांक कहते हैं ॥ ८२–८४ ॥ क्षयकेसरी । मृतमभ्रं मृतं सूतं मृतं लौहञ्च ताम्रकम् । मृतं नागं च कांस्यं च मण्डूरं विमलं मृतम् ॥ ८५ ॥ वङ्गं खर्परकं तालं शंखटंकणमाक्षिकम् । मृतं स्वर्णं मृतं कान्तं वैक्रान्तं विद्रुमौक्तिकम् ॥ ८६ ॥ वराटिका च माणिक्यं राजपट्टञ्च गन्धकम् । [