रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २९७ ) आकृष्य चूर्णयेच्छुद्धं चतुःषष्टिविभागतः । वज्रं वा तदभावे तु वैक्रान्तं षोडशांशिकम् ॥ ८१ ॥ सोनेकी भस्म एक तोला, रससिन्दूर या पारदभस्म दो तोले, मोतीकी भस्म ३ तोले, गंधक ४ तोले, सोनामाखी भस्म ५ तोले, चांदीकी भस्म ४ तोले, मूंगेकी भस्म ७ तोले और सुहागा २ तोले, इन सब औषधियोंको बिजौरे नींबूके रसमें तीन दिन तक खरल करके गोला बना धूपमें सुखा लेवे । पश्चात् इस गोलेको नमकसे भरी हुई हांडीमें रखकर और उसका मुख अच्छे प्रकारसे बंद करके चार प्रहर तक मंद मंद अग्निके द्वारा पकावे । शीतल होनेपर समस्त औषधिका चौसठवां भाग हीरेकी भस्म अथवा जो हीरा न मिले तो वैक्रान्तकी भस्म सोलहवाँ भाग मिलावे ॥ ७९–८१ ॥ महामृगांकः खलु सिद्ध एष श्रीनन्दिनाथप्रकटी- कृतोऽयम् । वल्लोऽस्य सेव्यो मरिचाज्ययुक्तः सेव्योऽथवा पिप्पलिकासमेतः ॥ ८२ ॥ अत्रो- पचाराः कर्त्तव्याः सर्वे क्षयगदोदिताः । बल्यं वृष्यञ्च भोक्तव्यं त्यजेत्सूतविरोधि यत् ॥ ८३ ॥ यक्ष्माणं बहुरूपिणं ज्वरगदं गुल्मं तथा विद्रधिं, मन्दाग्निं स्व- रभेदकासमरुचिं वान्तिञ्च मूर्च्छां भ्रमिम् । अष्टावेव महागदान्नरगदान्पाण्ड्वामयान्कामलान्, पित्तो- त्थांश्च समग्रकान्बहुविधानन्यांस्तथा नाशयेत् ८४ यह सिद्ध महामृगाङ्क श्रीनन्दिनाथका प्रगट किया हुआ है । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर कालीमिरचोंके चूर्ण और घृतके द्वारा अथवा पीपलके चूर्णके द्वारा सेवन कराकर क्षयरोगोक्त