रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३१३ ) अन्यरोगेषु तं दद्याद्रसं स्वच्छन्दभैरवम् । तुष्टिं पुष्टिमसौ कुर्यात्सौकुमार्यञ्च कारयेत् ॥ ६२ ॥ पारा १ भाग, गन्धक २ भाग इन दोनों औषधियोंको एकत्र खरल करके ज्वालामुखीके रसमें पांच दिन तक खरल करे । फिर मूषामें स्थापन करके रात्रिके समय मध्यम अग्निसे पुटमें पकावे । इसमेंसे दो रत्ती परिमाण औषधि लेकर संग्रहणी, खांसी, श्वास, उन्मादयुक्त उग्र ज्वर और निद्राकी अल्पता आदि रोगोंमें प्रयोग करे । इसके अतिरिक्त अन्यान्य रोगोंमें भी यह औषधि प्रयुक्त करनी चाहिये । इससे तुष्टि, पुष्टि और शरीरमें कोमलता उत्पन्न होती है । इसको स्वच्छन्दभैरव रस कहते हैं ॥ ५९-६२ ॥ रसगुटिका । रसभागो भवेदेको गन्धको द्विगुणो भवेत् । त्रिभागा पिप्पली पथ्या चतुर्भागा विभीतकः ॥६३॥ पञ्चभागस्त्वामलाश्च षड्गुणाः सप्तभागिका । भार्गी सर्वमिदं चूर्णं भाव्यं बब्बोलजैर्द्रवैः ॥ ६४ ॥ एकविंशतिवारञ्च मधुना गुटिका कृता । विभीतकप्रमाणेण प्रातरेकान्तु भक्षयेत् ॥ कासं श्वासं हरेत्क्षुद्राक्वाथन्तदनु कृष्णया ॥ ६५ ॥ पारा १ भाग, गंधक २ भाग, पीपल ३ भाग, हरड़ ४ भाग, बहेड़ा ५ भाग,आमले ६ भाग और भारंगी ७ भाग लेवे, इन सबको एकत्र बबूरके रसमें २१ बार भावना देकर सहतमें खरल करके बहेड़ेकी समान गोली बना लेवे । प्रतिदिन एक एक गोली प्रातःकाल सेवन करे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे खाँसी और श्वास रोग नष्ट होते हैं । इस औषधिके सेवनके अन्तमें पीपलके चूर्णके साथ कटेरीके रसको पान करे । इसको रसगुटिका कहते हैं ॥ ६३-६५ ॥