रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३१२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रयोग करे । यह औषधि देवतालोंकों भी सेवन करनी चाहिये । इसको जया गुटिका कहते हैं ॥ ५१-५५ ॥ विजया गुटिका । सूतकं गंधकं लौहं विषं चित्रकपत्रकम् । विडंगं रेणुका मुस्तमेलाकेशरग्रन्थिकम् ॥ ५६ ॥ फलत्रिकं त्रिकटुकं शुल्वभस्म तथैव च । एतानि समभागानि द्विगुणो दीयते गुडः ॥ ५७ ॥ कासे श्वासे क्षये गुल्मे प्रमेहे विषमज्वरे । सूतायां ग्रहणीरोगे शूले पाण्ड्वामये तथा ॥ हस्तपादादिदाहे च गुटिकेयं प्रशस्यते ॥ ५८ ॥ पारा, गन्धक, लोहभस्म, विष, चित्रकके पत्ते, वायविडंग, रेणुका, नागरमोथा, इलायची, नागकेशर, पीपलामूल, त्रिफला, त्रिकुटा और ताम्रभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सब चूर्णके बराबर पुराना गुड़ लेवे । इन सबको एकत्र पीसकर यथोचित मात्रा- नुसार सेवन करनेसे खाँसी, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, सूतिकारोग, ग्रहणी, शूल, पांडुरोग तथा हाथ और पावोंकी दाह दूर होती है । इसको विजया गुटिका कहते हैं ॥ ५६-५८ ॥ स्वच्छन्दभैरव रस । रसमेकं द्विधा गंधं गंधतुल्यञ्च सैन्धवम् । ज्वालामुखीरसैः पञ्च दिनानि परिमर्दयेत् ॥ ५९ ॥ मूषिकायां निरुध्याथ पुटेद्रात्रौ च मध्यमम् । सर्वं भस्म यदा याति वल्लमेनं प्रयोजयेत् ॥ ६० ॥ ग्रहण्यां संग्रहण्याञ्च कासे श्वासे विशेषतः । उग्रासु ज्वरतन्द्रासु निद्रास्वल्पासु योजयेत् ॥ ६१ ॥