रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 337, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३११ ) इस औषधिके सेवन करनेपर पान और भोजनका कुछ नियम नहीं है । शीत पवन और सूर्यकी धूपका सेवन, स्त्रीप्रसंग आदिका कुछ परहेज नहीं है । इसपर यथेष्ट आहार और विहार करे । इस औषधिके सेवन करनेसे मनुष्य सुवर्णके समान वर्णवाला हो जाता है । इसको महोदधि रस कहते हैं ॥ ४५-५० ॥ जया गुटिका । सूतकं गन्धकं लौहं विषं वत्सकमेव च । विडङ्गं केशरं मुस्तमेलाग्रन्थिकरेणुकम् ॥ ५१ ॥ त्रिकटु त्रिफला चित्रं शुद्धं जैपालबीजकम् । एतानि समभागानि द्विगुणो गुड उच्यते ॥ ५२ ॥ तिन्तिडीबीजमानेन प्रातःकाले च भक्षयेत् । कासं श्वासं क्षयं गुल्मं प्रमेहं विषमज्वरम् ॥ ५३ ॥ अजीर्णं ग्रहणीरोगं शूलं पाण्ड्वामयन्तथा । अपाने हृदये शूले वातरोगे गलग्रहे ॥ ५४ ॥ अरुचावतिसारे च सूतिकातङ्कपीड़िते । जयाख्या निर्मिता ह्येषा भक्षणीया सुरैरपि ॥ ५५ ॥ पारा, गंधक, लोहभस्म, विष, कुड़ेकी छाल, वायविडंग, नाग- केशर, नागरमोथा, इलायची, पीपलामूल, रेणुका, त्रिफला, त्रिकुटा, चीतेकी जड़ और शुद्ध जमालगोटे यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे और सब चूर्णसे दुगुना पुराना गुड़ लेवे । इन सब औषधियोंको एकत्र पीसकर इमलीके बीजोंकी समान गोली बनाकर प्रातःकाल नित्य सेवन करनेसे कास, श्वास, क्षय, गुल्म, प्रमेह, विषमज्वर, अजीर्ण, संग्रहणी, शूल और पांडुरोग नष्ट होते हैं । इस औषधिका गुह्यशूल, हृदयशूल, वातरोग, गलेकी पीड़ा, अरुचि, अतिसार और सूतिकारोगमें