भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ३१० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । महोदधि रस । सूतकं गन्धकं लौहं विषञ्चैव वराङ्गकम् । ताम्रकं वङ्गभस्मापि व्योमकञ्च समांशकम् ॥४५॥ त्रिकटु भद्रमुस्तञ्च विडङ्गं नागकेशरम् । रेणुकामलकञ्चैव पिप्पलीमूलमेव च ॥ ४६ ॥ एषाञ्च द्विगुणं भागं मर्दयित्वा प्रयत्नतः । भावना तत्र दातव्या गजपिप्पलिकाम्बुभिः ॥४७ ॥ चणमात्रा वटी कार्या संग्रहग्रहणीहिता । कासं हन्ति तथा श्वासमर्शांसि च भगन्दरम्॥४८॥ हृच्छूलं पार्श्वशूलञ्च कर्णरोगं कपालिकाम् । हरेत्संग्रहणीरोगानष्टौ च जाठराणि च ॥ प्रमेहान्विंशतिश्चैव चतुर्विधमजीर्णकम् ॥ ४९ ॥ न चान्नपाने परिहार्यमस्ति न शीतवातातपमैथुनेषु । यथेष्टचेष्टाभिरतः प्रयोगे नरो भवेत् काञ्चन- राशिगौरः ॥ ५० ॥ शुद्ध पारा, गन्धक, लोहभस्म, विष, दालचीनी, तांबाभस्म, वंग- भस्म और अभ्रकभस्म यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग,सोंठ,मिरच, पीपल,नागरमोथा, वायविडंग, नागकेशर, रेणुका, आमले और पीपला- मूल यह प्रत्येक औषधि दो दो भाग इन सब औषधियोंको एकत्र मर्दन करके गजपीपलके रसकी भावना देकर चनेकी बराबर गोली बना लेवे । यह गोली ग्रहणी रोगमें अत्यन्त हितकारी है । इस औषधिके सेवन करनेसे खांसी, श्वास, बवासीर, भगन्दर, हृदयशूल, पार्श्वशूल, कर्णरोग, कपालिका रोग, संग्रहणी, आठ प्रकारके उदर रोग, बीस प्रकारके प्रमेह और चारप्रकारका अजीर्ण रोग ये सब नष्ट होते हैं,