रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 335, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३०९ ) सहस्रं याति नारीणां भक्षणादस्य मानवः । क्षीणता न च शुक्रस्य न च बुद्धिबलक्षयम् ॥४२॥ द्विमाषमुपयोगेन निहन्ति कामलागदान् । शुक्रसन्दीपनं कृत्वा ज्वरं हन्ति न संशयः ॥ ४३॥ नारिकेलजलेनैव भक्ष्योऽयं च रसायनः ॥ क्षीरानुपानाद्वृष्योऽयं न क्वचित्प्रतिहन्यते ॥ ४४ ॥ शुद्ध पारा २ कर्ष और शुद्ध गंधक २ कर्ष लेवे, इन दोनोंको एकत्र खरल करके कज्जली बना लेवे । पश्चात् बेलगिरी, अरणी, सोनापाठा, कुंभेर, पाठ, खिरेंटी, नागरमोथा, पुनर्नवा, आमले, कटेरी, अडूसेके पत्ते, विदारीकंद और सतावर इन प्रत्येकके एक एक कर्ष रसके द्वारा अच्छे प्रकारसे खरल करके पश्चात् दश तोले परिमाण अडूसेका रस लेकर उसमें खूब खरल करे । फिर इसमें अभ्रक ४ कर्ष, कपूर १ तोला, जावित्री १ मासा, जायफल १ मासा, बालछड़ १ मासा, तालीशपत्र १मासा, इलायची १ मासा और लौंग १ मासा लेकर सबको एकत्र विदारी- कंदके स्वरसमें पीसकर गोली बना लेवे । इन गोलियोंके सेवन करनेसे अत्यन्त उग्र राजयक्ष्मा, क्षत, उरक्षत, पांच प्रकारकी खांसी, श्वास, स्वरभेद, अरुचि, कामला, पांडुरोग, प्लीहा, हलीमक, जीर्णज्वर, तृषा, गुल्म, आमजन्य संग्रहणी, अतिसार, शोथ, कुष्ठ और भगन्दर रोग नष्ट होते हैं, यह औषधि उत्तम रसायन है । वीर्यको बढ़ानेवाली, नेत्रोंको हितकारी और पुष्टिको बढ़ानेवाली है। इसका सेवन करनेवाला मनुष्य सौ स्त्रियोंके साथ विषय करनेपर भी वीर्यक्षय नहीं होता तथा बुद्धि और बलकी कभी न्यूनता नहीं होती । इस औषधिको दो मासे परिमाण सेवन करनेसे कामला रोग नष्ट होता है; इससे शुक्रकी वृद्धि होकर ज्वर नष्ट होता है । इसको नारियलके जलके अनुपानके साथ सेवन करनेसे, दूधके अनुपानके साथ सेवन करनेसे वीर्यकी वृद्धि होती है । इसको तरुणानन्द रस कहते हैं ॥ ३३-४४ ॥