रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । उद्धृत्योष्णारनालेन मृत्पात्रे क्षालयेत्सुधीः । एवं संशोधितः सूतः सप्तकंचुकवर्जितः ॥ २७ ॥ ऊन ( भेडके बाल ), हल्दी, ईंटका चूर्ण, गृहधूम, जंभीरीका रस, घीकुमारीका रस इन सबमें प्रत्येकको पारेसे सोलहवां भाग लेकर पारदमें मिलां एक दिन ( सात दिनतक ऐसा वृद्धोपदेश है ) खरल करे फिर गरम कांजीसे माटीके पात्रमें धोडाले इसी प्रकार सात दिन- तक खरल करनेसे पारा नाग दोषको त्याग देता है १॥ ऐसे ही इन्द्रायणकी जड और अंकोठ ( ढेश वृक्ष ) के चूर्णको पारेसे सोलहवां भाग लेकर घीकुमारके रसमें रगड़ कर गर्म कांजीसे धोडाले तो वंग- दोषको त्याग देता है २॥ ऐसेही पारेको अमलतासके गूदेमें सात दिन मर्दन कर गर्म कांजीसे धोता रहे तो पारेका मलदोष दूर होता है ३॥ इसी प्रकार चीतेकी जडकी छालके चूर्णमें मर्दन करनेसे वह्निदोष दूर होता है ४॥ काले धतूरेके रसमें या बीजोंके चूर्णमें उप- रोक्त विधिसे पारेका मर्दन करनेसे पारेका चांचल्य दोष दूर होता है ५॥ त्रिफलेके चूर्णमें उपरोक्त विधिसे रगडे तो पारेका विषदोष नष्ट होता है ६॥ ऐसेही त्रिकुटेके चूर्णमें मर्दन करनेसे पारेका गिरि दोष दूर होता है ७॥ एवं गोखरूके चूर्णमें मर्दन करनेसे पारेका असह्याग्नि दोष दूर होता है ८॥ हरेक दोषके दूरकरनेके लिये उस २ द्रव्यके सोलहवें भाग चूर्णमें घीकुमारका रस डालकर उसमें पारेको मर्दन करे फिर मिट्टीके पात्रमें डाल राईकी गर्म की हुई कांजीसे धोडाले । इस प्रकार शोधन किया हुआ पारा सात कंचुकी रहित हा जाता है ॥ २४–२७ ॥ अन्य प्रकारसे शोधन । श्रीखण्डं देवकाष्ठञ्च काकजंघा-जया-द्रवैः । कर्कटी-मूषली-कन्या-द्रवं दत्त्वा विमर्दयेत् । दिनैकं पातयेत्पश्चात् शुद्धं विनियोजयेत् ॥ २८ ॥