भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 584 में से

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भाषाटीकासहित । ( ९ ) श्वेत चन्दन, देवदारु, काकजंघा, जया ( जयन्ती या भांग ) का रस, कर्कटी, ( दन्दाल डोडा ) मूसली ( काली मूसली और घीकुंवारका रस इन सब द्रव्योंमें पारेको एक दिन मर्दन करके ऊर्ध्व पातनयंत्रमें उडाले फिर निकाल कर कांजीसे धोकर सब कार्यमें इस पारेको लेवे यह शुद्ध पारद् है ॥ २८ ॥ ० कुमार्या च निशाचूर्णैर्दिनं सूतं विमर्दयेत् । पातयेत्पातनायन्त्रे सम्यक् शुद्धो भवेद्रसः ॥ २९ ॥ अथवा-हलदीके चूर्ण और घीकुमारके रसमें पारेको खरल करके ऊर्ध्व पातन ( डमरु ) यंत्रद्वारा उडा लेवे तो यह पारद शुद्ध होजा- यगा इसको सब औषधियोंमें डाले ॥ २९ ॥ रसस्य द्वादशांशेन गन्धं दत्त्वा विमर्दयेत् । जम्बीरोत्थैर्द्रवैर्यामं पाच्यं पातनयन्त्रके । पुनर्मर्द्यं पुनः पाच्यं सप्तवारं विधानतः ॥ ३० ॥ अथवा-पारेमें पारेसे बारहवें भाग शुद्ध आमलासार गंधक मिलाकर जंबीरी नींबूके रसमें एक पहर मर्दन करे फिर ऊर्ध्वपातन यंत्र ( डमरुयंत्र ) द्वारा पारेको उडाले फिर इस पारेमें बारहवां भाग शुद्ध गंधक और मिलाकर जंबीरीके रसमें मर्दन कर ऊर्ध्वपातन यंत्रमें उडावे ऐसे ७ वार उडानेसे पारा शुद्ध होजाता है ॥ ३० ॥ जयन्त्या वर्द्धमानस्य चार्द्रकस्य रसेन च । वायस्याश्चानुपूर्व्येण मर्दनं रसशोधनम् ॥ ३१ ॥ एषां प्रत्येकशस्तावन्मर्दयेत्स्वरसेन च । यावच्च शुष्कतां याति सप्तवारं क्रमेण च ॥ ३२ ॥ उद्धृत्योष्णारनालेन मृद्भाण्डे क्षालयेत्सुधीः । सर्वदोषविनिर्मुक्तः सप्तकंचुकवर्जितः । जायते शुद्धसूतोऽयं युज्यते सर्वकर्मसु ॥ ३३ ॥

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