रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथवा-जयन्ती, एरण्ड, अदरख और काकमाची ( मकोय ) इन चारोंके स्वरसमें क्रमपूर्वक एक एकके स्वरसमें सात सात वार मर्दन कर सुखाता जावे और सूखनेपर मट्टीके पात्रमें डालकर राईकी गर्म की हुई कांजीसे धो डाले ऐसे ही जयंती आदि चारोंके स्वरसमें पृथक् पृथक् मर्दन कर कांजीसे धो डाले तो पारा शुद्ध और सर्व दोष रहित सप्तकंचुकी वर्जित होजाता है । यह पारा सब प्रयोगोंमें काममें लाने योग्य होजाता है ॥ ३१-३३ ॥ निशेष्टकाधूमरजोऽम्लपिष्टो विकंचुकः स्याद्धि ततश्च सोर्णः । वरा-ऽऽरनाला-ऽनल-कन्यकाभिः सत्र्यूषणाभिर्मृदितस्तु सूतः ॥ ३४ ॥ अथवा-हल्दी, ईंटका चूर्ण, गृहधूम और अम्लवर्ग इसमें पारेको मर्दन कर सुखावे, कांजीसे धो डाले फिर इसमें ऊन, त्रिफलेका चूर्ण, त्रिकुटेका चूर्ण, चित्रक, घीकुमार और कांजी मिलाकर मर्दन करे, सूखनेपर गर्म की हुई कांजीसे धोकर पारद निकाल ले तो पारद सप्तकंचुकी रहित और शुद्ध होजाता है ॥ ३४ ॥ दिनैकं मर्दयेत्सूतं कुमारीसम्भवैर्द्रवैः । तथा चित्रकजैः क्वाथैर्मर्दयेदेकवासरम् । काकमाचीरसैः सार्द्धं दिनमेकन्तु मर्दयेत् ॥ ३५ ॥ अथवा-पारेको घीकुमारके रसमें एक दिन खरल करे फिर सुखा- कर गर्म की हुई कांजीसे धो डाले । ऐसे ही एक दिन चित्रकके रसमें खरल करे । और इसी प्रकार काकमाची ( मकोय ) के रसमें खरल- करे फिर मट्टीके पात्रमें डालकर गर्म कांजीसे धो डाले तो पारद शुद्ध होजाता है ॥ ३५ ॥