भारतकोश
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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( १० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथवा-जयन्ती, एरण्ड, अदरख और काकमाची ( मकोय ) इन चारोंके स्वरसमें क्रमपूर्वक एक एकके स्वरसमें सात सात वार मर्दन कर सुखाता जावे और सूखनेपर मट्टीके पात्रमें डालकर राईकी गर्म की हुई कांजीसे धो डाले ऐसे ही जयंती आदि चारोंके स्वरसमें पृथक् पृथक् मर्दन कर कांजीसे धो डाले तो पारा शुद्ध और सर्व दोष रहित सप्तकंचुकी वर्जित होजाता है । यह पारा सब प्रयोगोंमें काममें लाने योग्य होजाता है ॥ ३१-३३ ॥ निशेष्टकाधूमरजोऽम्लपिष्टो विकंचुकः स्याद्धि ततश्च सोर्णः । वरा-ऽऽरनाला-ऽनल-कन्यकाभिः सत्र्यूषणाभिर्मृदितस्तु सूतः ॥ ३४ ॥ अथवा-हल्दी, ईंटका चूर्ण, गृहधूम और अम्लवर्ग इसमें पारेको मर्दन कर सुखावे, कांजीसे धो डाले फिर इसमें ऊन, त्रिफलेका चूर्ण, त्रिकुटेका चूर्ण, चित्रक, घीकुमार और कांजी मिलाकर मर्दन करे, सूखनेपर गर्म की हुई कांजीसे धोकर पारद निकाल ले तो पारद सप्तकंचुकी रहित और शुद्ध होजाता है ॥ ३४ ॥ दिनैकं मर्दयेत्सूतं कुमारीसम्भवैर्द्रवैः । तथा चित्रकजैः क्वाथैर्मर्दयेदेकवासरम् । काकमाचीरसैः सार्द्धं दिनमेकन्तु मर्दयेत् ॥ ३५ ॥ अथवा-पारेको घीकुमारके रसमें एक दिन खरल करे फिर सुखा- कर गर्म की हुई कांजीसे धो डाले । ऐसे ही एक दिन चित्रकके रसमें खरल करे । और इसी प्रकार काकमाची ( मकोय ) के रसमें खरल- करे फिर मट्टीके पात्रमें डालकर गर्म कांजीसे धो डाले तो पारद शुद्ध होजाता है ॥ ३५ ॥

भाषाटीकासहित । (११) रसोनस्वरसैः सूतो नागवल्लीदलोत्थितैः । त्रिफलायास्तथा क्वाथै रसो मर्द्यः प्रयत्नतः ॥३६॥ ततस्तेभ्यः पृथक् कृत्वा सूतं प्रक्षाल्य काञ्जिकैः । सर्वदोषविनिर्मुक्तं योजयेद्रसकर्मसु ॥ ३७ ॥ अथवा-पारेको रसोन ( लहसुन ) के स्वरसमें खरल करे फिर नागर- वेलके पानके रसमें खरल करे, तदनंतर त्रिफलेके क्वाथमें यत्नपूर्वक खरल करे । फिर इनसे पारेको अलग कर कांजीसे धो डाले तो पारा सर्व दोषरहित और सब काममें लाने योग्य होजाता है ॥३६॥ ३७ ॥ अथोर्ध्वपातनसंस्कार । भागास्त्रयो रसस्यार्कभागमेकं विमर्दयेत् । जंबीरद्रवयोगेन यावदायाति पिण्डताम् ॥ ३८ ॥ तत्पिण्डं तलभाण्डस्थमूर्ध्वभाण्डे जलं क्षिपेत् । कृत्वालवालं केनापि ततः सूतं समुद्धरेत् ॥ ऊर्ध्वपातनमित्युक्तं भिषग्भिः सूतशोधने ॥ ३९ ॥ पारा ३ भाग, शुद्ध ताम्रके छोटे बारीक पत्र १ भाग इन दोनोंको जंबीरी नींबूके रसमें तबतक खरल करे जबतक पारे और तांबेका पिंडसा न बन जावे । जब पिण्डसा बन जाय तो उसको एक मिट्टीके घट ( चाटीके ) अन्दर टिकियासी बनाकर रख दे, दूसरा उतना ही बडा घट लेकर उस पात्रके मुखपर अधो- मुख रखकर दोनों घटोंका मुख गजनी ( मुलतानी ) मट्टी और कपडेसे विधिवत् संधान कर देवे फिर इसको चूल्हेपर चढाकर नीचे क्रमसे अग्नि जलावे । ऊपरके अधोमुख घटके ऊपर चिकनी मट्टीसे घेरासा बनाकर उसमें शीतल जलसे भिगोकर कपडा रखता रहे जिससे अधोमुख घटका तलभाग ( थल्ला ) गरम न होने पावे इसको दो पहरकी अग्नि देकर फिर शीतल होनेपर उतार कर

( १२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ऊपरके घटमें उडकर लगे हुए पारदको निकाल ले । इसको वैद्योंने ऊर्ध्वपातन यंत्र ( डमरुयन्त्र ) कहा है । यह पारेके शोधनमें ऊर्ध्वपातन संस्कार है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ अधःपातनसंस्कार । नवनीताह्वयं सूतं घृष्ट्वा जम्भाम्भसा दिनम् । वानरी-शिग्रु-शिखिभिः सैन्धवा-ऽऽसुरिसंयुतैः॥४०॥ नष्टपिष्टं रसं कृत्वा लेपयेदूर्ध्वभाण्डके । ऊर्ध्वभाण्डोदरं लिप्त्वाऽधोभाण्डं जलसंयुतम् ॥४१॥ सन्धिलेपं द्वयोः कृत्वा तद्यन्त्रं भुवि पूरयेत् । उपरिष्टात्पुटे दत्ते जले पतति पारदः । अधःपातनमित्युक्तं सिद्धाद्यैः सूतकर्मणि ॥ ४२ ॥ शुद्ध आमलासार गंधक और पारेको एक दिन जम्बीरीरसमें खरल कर कजली बना ले, इस कजलीमें कौंचके बीज, सहँजनेके बीज, अपामार्ग (औंगा, चिरचिटा ) के बीज, सेंधानमक और राई मिलाकर जम्बीरीके रसमें घोटे । जब सब मिलकर पीठीसी बन जावे तो इस पीठीको ऊपरके घटमें लेप करदे, नीचेके पात्रमें पानी भरकर ऊपरका लेपवाला पात्र पानीवाले पात्रके मुखपर अधोमुख रख- कर दोनोंके मुखको कपडमिट्टीसे बंद करदे फिर पानीवाले पात्रको मुखपर्य्यंत पृथ्वीमें गाड दे, ऊपरवाले अधोमुख पात्रके सब ओर आरने उपले लगा कर अग्नि देवे तो सब पारा नीचे पानीमें चला जावेगा । पारेके संस्कारोंमें सिद्धादिकोंने इसको अधःपातन संस्कार कहा है ॥ ४०–४२ ॥ तिर्यक्पातनसंस्कार । घटे रसं विनिक्षिप्य सजलं घटमन्यकम् । तिर्यङ्मुखं द्वयोः कृत्वा तन्मुखं रोधयेत्सुधीः ॥ ४३ ॥

भाषाटीकासहित । ( १३ ) रसाधो ज्वालयेदग्निं यावत्सूतों जलं विशेत् । तिर्यक्पातनमित्युक्तं सिद्धैर्नागार्जुनादिभिः ॥ ४४ ॥ एक बडे अच्छे घडेमें पारा डाल दे और दूसरे वैसेही घडेमें पानी डाले फिर दोनों घटोंको तिरछे करके विधिवत् दोनोंके मुख जोड देवे। फिर पारेवाले घटके नीचे अग्नि जलावे तो पारा उडकर पानीमें चला जायगा । इस पारदके संस्कारको नागार्जुन आदि सिद्धोंने तिर्यक्- पातन संस्कार कहा है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ बोधनसंस्कार । एवं कदर्थितः सूतः षण्ढत्वमधिगच्छति । तन्मुक्तयेऽस्य क्रियते बोधनं कथ्यते हि तत् ॥ ४५ ॥ इस प्रकार मर्दन और पातन आदि करनेसे कंचुकी आदि दोष तो दूर हो जाते हैं परंतु पारेमें षण्ढत्व ( नपुंसकता ) आजाती है । उस षण्ढत्वके दूर करनेको हम बोधन संस्कार कहते हैं ॥ ४५ ॥ विश्वामित्रकपाले वा काचकूप्यामथापि वा । सूतं विनिक्षिप्य जलं तत्र तन्मज्जनावधि ॥ ४६ ॥ पूरयेत्रिदिनं भूम्यां गजहस्तप्रमाणतः । अनेन सूतराजोऽयं षण्ढभावं विमुञ्चति ॥ ४७ ॥ नारियलमें या काचकी शीशीमें पारा डालकर उसमें इतना पानी डाले जिसमें पारा डूबजावे फिर इसका मुख बंद करके डेढगज गहरे गढेमें दबादे चौथे दिन निकाल ले तो पारेका षण्ढत्व दूर होजाता है। कोई इस पारेको नारिकेल या शीशीमें डालकर इसमें नमकका पानी डाल पृथ्वीमें गाडे ऐसा मानते हैं । कहीं “ सूतं विनिक्षिप्य जलं ” इस पाठकी जगह “ सृष्ट्यंबुजं विनिक्षिप्य ” ऐसा पाठ लिखकर सोलह वर्षकी स्त्रीका मासिक रज डालना ऐसा मानते हैं ॥४६॥४७॥ २

( १४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हिंगुलसे पारा निकालनेकी विधि । अथवा हिंगुलात्सूतं ग्राहयेत्तन्निगद्यते । जम्बीरनिम्बुनीरेण मर्दितो हिंगुलो दिनम् ॥ ४८ ॥ ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण ग्राह्यः स्यान्निर्मलो रसः । कंचुकैर्नागवङ्गाद्यैर्निर्मुक्तो रसकर्मणि । विना कर्माष्टकेनैव सूतोऽयं सर्वकर्मकृत् ॥ ४९ ॥ जहांपर संस्कारशुद्ध पारद् न मिल सके तो सिंगरफसे निकाला हुआ पारा लेना चाहिये सो सिंगरफसे पारा निकालनेकी विधि कहते हैं- सिंगरफको एक दिन नींबूके रसमें मर्दन करके ऊर्ध्वपातन यंत्रद्वारा पारा निकाल ले । यह पारा मलरहित सप्तकंचुकी और नाग वंगादि दोष रहित होता है यह हिंगुलसे निकाला हुआ पारा अष्ट संस्कारके विनाही सब कर्ममें लेने योग्य होता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ पारदके अष्ट संस्कार । स्वेदनं मर्दनञ्चैव मूर्च्छनोत्थापनं तथा । पातनं बोधनञ्चैव नियामनमतः परम् । दीपनञ्चेति संस्काराः सूतस्याष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ ५० ॥ स्वेदन, मर्दन, मूर्च्छन, उत्थापन, पातन, बोधन, नियामन और दीपन यह पारेके आठ संस्कार कथन किये हैं । वह इस प्रकार हैं- ( १ ) त्रिफला, त्रिकुटा, चित्रक, घीकुमार और कांजी इन सबको एक घडेमें डालकर चूल्हेपर रक्खे, इस घडेमें किसी अच्छे गाढे वस्त्रको चौलड ( चार तह ) करके उसमें पारेको बांधकर दोलायंत्रके विधानसे लटकावे नीचे आग जलावे इस प्रकार घडेके कांजीवाले पानीमें तीन दिन पकानेको स्वेदन संस्कार कहते हैं । अथवा त्रिकुटा, नमक, राई, मूलीके बीज, त्रिफला, अदरख, महाबला, नागबला, चौलाई, पुनर्नवा, मेढासिंगी, चित्रक और नौसादर इनको धान्याम्ल ( धान्योंकी कांजी ) में रगड़कर एक गाढे वस्त्रपर एक अंगुल मोटा

भाषाटीकासहित । ( १५ ) लेप करे उसमें पारा बांधकर धान्याम्लमें तीन दिन दोलायंत्रमें पकावे यह स्वेदन संस्कार है ॥ ( २ ) घरका धूम, ईंटका चूर्ण, कालाजीरा, जली हुई ऊन, गुड, सेंधानमक और राई यह पारेसे सोलहवें सोलहवें भाग लेकर सबका चूर्णकर पारेमें मिला कांजी डालकर तीन दिन रगडे इसको मर्दन संस्कार कहते हैं ॥ ( ३ ) त्रिफलेका चूर्ण घीकुमार और चित्रक इन तीनोंमें खरल करके सूखनेपर कांजीसे धोडाले इस प्रकार सात बार इन्हीं द्रव्योंमें रगडनेको मूर्च्छन संस्कार कहते हैं ॥ अथवा पहले जो सप्तकंचुकी हरण विधि कह आये हैं उसको मूर्च्छन संस्कार कहते हैं ॥ ( ४ ) घीकुमारके रसमें चौथाई भाग हलदीका चूर्ण मिलाकर घोटकर डमरुयंत्रमें उडाले इसको उत्थापन संस्कार कहते हैं । अथवा नींबूके रसमें खरल कर धूपमें सुखाकर पारा निकाल ले बाकी रहे पारेको उडाकर निकालले यह उत्थापन संस्कार है ॥ ( ५ ) उर्ध्वपातन और तिर्यक्पातन करनेको पातन संस्कार कहते हैं ॥ ( ६ ) ४६ । ४७ के श्लोकमें जो षण्ढत्वनाशन विधि कही है उसको बोधन संस्कार कहते हैं ॥ ( ७ ) नाकुलीकंद, चिंचिका ( इमली या रक्तक ), वांझककौडेका कंद, भांगरा, नागरमोथे और धतूरेके पत्रोंका स्वरस इनमें तीन दिन रगडनेसे पारा स्थिर होजाता है इसको नियामन संस्कार कहते हैं ॥ ( ८ ) कसीस, पांचों लवण, राई, मिर्च, सुहांजनेके बीज और सुहागा इन सबका चूर्ण धान्याम्लजलमें घोलकर इस पानीमें दोला- यंत्रद्वारा पारेको तीन दिन पकानेसे पारेका दीपन संस्कार होता है॥ यद्यपि पारेके १८ संस्कार होते हैं जो वृहद् रसग्रंथोंमें लिखे हैं । यहांपर केवल ८ संस्कार लिखदिये हैं, अठारह संस्कार यहां ग्रंथ बढ-

( १६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । नेके भयसे नहीं लिखे और इस ग्रंथकारने केवल पारेके संक्षेपसे ४ संस्कार लिखे हैं जैसे-शोधन, मूर्च्छन, बंधन और मारण सो यथा- क्रम ग्रंथकारने लिखे हैं ॥ ५० ॥ सिंगरकसे पारा निकालनेमें अन्यमत । दरदं तण्डुलस्थूलं कृत्वा मृत्पात्रके त्रिदिनम् । भाव्यं जंबीररसैश्चांगेय्र्या वा रसैर्बहुधा ॥ ५१ ॥ ततश्च जंबीरवारिणा चांगेर्या रसेन वा परिप्लुतम् । कृत्वा स्थालीमध्ये निधाय तदुपरि कठिनीघृष्टमुत्तानम् ॥ चारु शरावं तत्र त्रिंशद्वारं जलं देयम् । उष्णे देयं तथैव तदूर्ध्वपातनेन निर्मलः शिवजः ॥ ५३ ॥ सिंगरफके छोटे छोटे चावलोंके बराबर टुकडे कर उनमें नींबूका रस डालके सुखावे अथवा चांगेरी ( चौपतिया शाक ) के रसकी अनेक ( सात ) भावना देवे फिर मट्टीके बडे पात्रमें डालकर उसमें इतना नींबूका रस और चांगेरीका रस डाले जिसमें सिंगरफका सब चूरा डूब जावे फिर उस पात्रके मुखपर खडियासे लिपा हुआ एक तौल्ला ( बडाभारी शराव ) सीधा रखकर मिट्टी और कपडेसे खूब संधिलेप करदे इस पात्रको चूल्हेपर रख नीचे नीचे तीन प्रहर अग्नि जलावे और ऊपरवाले पात्रमें जब जल गरम हो तो निकालकर शीतल जल डाले ऐसे तीस बार जल बदले जिससे ऊपरका पात्र गरम न होने पावे । तीन पहरके अनंतर आग निकालकर बुझादे जब यह यन्त्र सर्वांग शीतल हो जाय तो ऊपरके पात्रमें लगे शुद्ध पारेको खडिया सहित निकाल ले, फिर कपड छानकर कांजी और पानीसे धोकर साफकर ले यह शुद्ध पारद है ॥ ५१-५३ ॥ पारिभद्ररसैः पेष्यं हिंगुलं याममात्रकम् । जम्बीराणां रसैर्वाथ पचेत्पातनयन्त्रके ॥ ५४ ॥

भाषाटीकासहित । तं सूतं योजयेद्योगे सप्तकंचुकवर्जितम् । संशुद्धिमन्तरेणापि शुद्धोऽयं रसकर्मणि ॥ ५५ ॥ अथवा-पारिभद्र (पंडयारा या नीम) के रसमें सिंगरफको एक प्रहर खरल करे अथवा जंबीरी नींबूके रसमें खरल करे फिर डमरूयंत्रमें या उपरोक्त पातनयन्त्रमें डाल पूर्ववत् पारा निकाल ले तो यह पारा सप्त कंचुकीरहित होता है और बिना ही आठ संस्कारोंके शुद्ध माना जाता है यह सब रसोंमें डालना चाहिये ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ मूर्च्छनविधि । गन्धकेन रसं प्राज्ञः सुदृढं मर्दयेद्भिषक ! कज्जलाभो यदा सूतो विहाय घनचापलम् ॥ ५६ ॥ दृश्यतेऽसौ तदा ज्ञेयो मूर्च्छितो रसकोविदैः । असौ रोगचयं हन्यादनुपानस्य योगतः ॥५७॥ पारे और गंधकको सम भाग लेकर खरलमें तबतक मर्दन करे जबतक उसकी घनता ( गाढता ) और चपलता दूर होकर सुर्मेके समान कज्जली न होजाय । इस कज्जलीको मूर्च्छित पारा कहते हैं । इस कज्जलीको अनुपान विशेषसे विधिवत् सेवन करावे तो यह अनेक रोगोंके समूहको दूर करे ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ पारदमारण । द्विपलं शुद्धसूतस्य सूतार्धं गन्धकं तथा । कन्यानीरेण संमर्द्य दिनमेकं निरन्तरम् ॥ रुद्ध्वा तद्भूधरे यन्त्रे दिनैकं मारयेत्पुटे ॥ ५८ ॥ शुद्ध पारा दो पल, शुद्ध गंधक एक पल इन दोनोंको घीकुमारके रसमें एक दिन ( बराबर २४ घंटे ) मर्दन करके भूधर यंत्रमें रख एक दिनकी पुट दे तो इस पारेकी भस्म होजायगी ( यह मूर्च्छित पारद है बिना विधि खानेसे अवगुण करता है ) ॥ ५८ ॥

( १८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अन्यप्रकारसे मारणविधि । भुजङ्गवल्लीनीरेण मर्दयेत्पारदं दृढम् । कर्कटीकन्दमूषायां संपुटस्थं पुटेद्गजे ॥ भस्म तद्योगवाहि स्यात्सर्वकर्मसु योजयेत् ॥ ५९ ॥ नागवल्ली ( पान ) के रसमें पारेको खूब दृढ मर्दन करे । फिर इसको कर्कटीकंद ( बांझककौडेकी जड या कंचन लताकी जड ) की मूषा बना उसमें इस पारेको डाल दूसरी मूषासे बंद कर विधि- वत् संधान करे उसके ऊपर कपडमिट्टी कर धूपमें सुखाले फिर इसको गजपुटमें पुट देवे तो पारेकी भस्म होजायगी । यह योगवाही भस्म सर्व कार्योंमें लेनी चाहिये ॥ ५९ ॥ श्वेतांकोठजटानीरैर्मर्त्यः सूतो दिनत्रयम् । पुटेत्तु चान्धमूषायां सूतो भस्मत्वमाप्नुयात् ॥ ६०॥ श्वेत अंकोठ ढेराकी जडके रसमें पारेको तीन दिन खरल कर फिर अंधमूषामें रखकर पुट देवे तो पारेकी भस्म हो जाती है ॥ ६० ॥ देवदाली हंसपदी यमचिञ्चा पुनर्नवा । एभिः सूतो विमृष्टव्यो पुटनान्म्रियते ध्रुवम् ॥ ६१ ॥ अथवा-देवदाली ( वंदाल डोडा ), हंसपदी, यमचिंचा, ( बृहद् इमली ) पुनर्नवा इन सब औषधियोंके साथ पारेको मर्दन कर पुट देनेसे पारेकी भस्म होजाती है ॥ ६१ ॥ रससिन्दूर । भागो रसस्य त्रय एव भागा गन्धस्य माषः पवना- शनस्य । संमर्द्य गाढं सकलं सुभाण्डे तां कज्जलीं काचघटे निदध्यात् ॥ ६२ ॥ संरुध्य मृत्कर्पटके-

भाषाटीकासहित । ( १९ ) घटीं तां मुखे सचूर्णां खटिकाञ्च दत्त्वा । क्रमाग्निना त्रीणि दिनानि पक्त्वा तां वालुकायन्त्रगतां ततः स्यात् ॥ ६३ ॥ बन्धूकपुष्पारुणमीशजस्य भस्म प्रयोज्यं सकलामयेषु । निजानुपानैर्मरणं जराञ्च हन्त्यस्य वल्लः क्रमसेवनेन ॥ ६४ ॥ एक पल पारा, तीन पल गंधक और एक मासा शीसा इन सब औषधियोंको उत्तम खरलमें खूब घोटे, फिर उस कज्जलीको आतशी शीशीमें डाल ऊपर सात कपड़मिट्टी करे फिर उस शीशीको वालुकायंत्रमें मंद, मध्य, तीव्र अग्नि देवे एक पहर शीशीका मुख खुला रहने दे जब गंधकका धूम निकल लेवे तब उस शीशीके मुख- पर खड़िया मिट्टीका या गुड़ चूनेका डाट लगाकर मुख बंद करदेवे ( कोई लोहेकी सींख शीशीमें डालकर देख लेते हैं जब शीशीके गलेमें लगा हुवा द्रव्य सींखसे लगने लगे तो मुख बंद करते हैं ) फिर २४ पहर अग्नि देनेके अनंतर स्वांग शीतल होनेपर शीशी तोड़कर बीचमें दुपहरियाके फूल समान लाल वर्णके शीशीमें चिपटे हुवे पारदको निकालले इसको संपूर्ण रोगोंमें रोगविशेषोंके अनुपानोंसे देवे तो यह संपूर्ण रोगोंको नष्ट करता है और इसको ३ रत्ती सेवन नित्य करनेसे जरा मृत्यु भी दूर होते हैं ॥ ६२-६४ ॥ [ मेरा अनुभव-मैं कवचीयन्त्र बनाते समय शीशीपर कपड़ा और मिट्टीको न लपेट, केवल खड़िया, मनुष्यके शिरके बाल और रूईको खूब कूटपीस चढा देताहूं, यह कवच इतना दृढ होता है कि चाहे कांचकी शीशी तेज आंचसे पिघल जावे, परन्तु यह मिट्टी कभी नहीं टूटती ॥ अनुवादक. ] पलमात्रं रसं शुद्धं तावन्मात्रं तु गन्धकम् । विधिवत्कज्जलीं कृत्वा न्यग्रोधांकुरवारिभिः ॥६५॥

( २० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भावनात्रितयं दत्त्वा स्थालीमध्ये निधापयेत् । विरच्य कवचीयन्त्रं वालुकाभिः प्रपूरयेत् ॥६६॥ दद्यात्तदनु मन्दाग्निं भिषग्यामचतुष्टयम् । जायते रससिन्दूरं तरुणादित्यसन्निभम् ॥ अनुपानविशेषेण करोति विविधान् गुणान् ॥६७॥ अन्य प्रकार-शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गंधक ४ तोले इन दोनोंको विधिवत् खरल कर कजली बनावे फिर इसमें वटवृक्षके अंकुरोंके रसकी तीन भावना देवे । सूखनेपर अग्निसहनशीला शीशीमें भरकर उस शीशीपर सात वार कपड़मिट्टी करके सुखाले फिर वालुका यंत्रमें रखकर चार पहरकी मंदाग्नि देवे तो प्रातःकालके सूर्य समान वर्णवाला रससिंदूर होजाता है । इसको अनुपान विशेषसे प्रयोग करे तो अनेक रोगोंको दूर करता है ( इसमें मन्द-मध्य-तीक्ष्ण क्रमसे कमसे कम बारह पहरतक तो आंच अवश्य दी जानी चाहिये । थोड़ीमें पाक असंभव हैं ) ॥ ६६-६७ ॥ पृथक् समंसमं कृत्वा पारदं गन्धकं तथा । नवसारं धूमसारं स्फटिकं याममात्रकम् ॥ ६८ ॥ निम्बूरसेन संमर्द्य काचकूप्यां निवेशयेत् । मुखे पाषाणखटिकां दत्त्वा मुद्रां प्रलेपयेत् ॥ ६९ ॥ सप्तभिर्मृत्तिकावस्त्रैः पृथक् संशोध्य वेष्टयेत् । सच्छिद्रायां मृदः स्थाल्यां कूपिकां तां निवेशयेत् ७०. पूरयेत्सिकतापूरैरागल मतिमान् भिषक् । निवेश्य चुल्ल्यां दहनं मन्दं मध्यं खरं क्रमात् ॥ ७१ ॥ प्रज्वाल्य द्वादशं यामं स्वांगशीतं समुद्धरेत् ।

भाषाटीकासहित । (२१) स्फोटयित्वा तु मुक्ताभमूर्द्ध्लग्नं वलिं त्यजेत् । अधःस्थं रससिन्दूरं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ७२ ॥ अन्य प्रकार-पारा, गंधक, नौसादर, गृहधूम, फिटकिरी इन सबको चार चार तोला अलग २ लेकर नींबूके रसमें एक पहर मर्दन करके आतशी शीशीमें भरकर शीशीका मुख ईंट या पत्थरके डाटसे बंद् कर सात कपड़मिट्टी चढ़ाकर सुखाले फिर एक बड़ी चाटी (मिट्टीका पात्र) ले उसके तल भागमें छिद्र कर उस छेदपर शीशी रखकर पात्रको गलपर्यंत वालु (रेत) से भरदे (इसको वालुका यंत्र कहतें हैं ) इस यंत्रको चूल्हे पर चढ़ाकर क्रमसे मंद, मध्य और तीक्ष्ण अग्नि देवे ऐसे बारह (१२) पहर अग्नि देनेके अनंतर आग बुझा दे । स्वांग शीतल होनेपर शीशीको फोड़ कर उसमेंसे मोतीके समान चमकदार शीशीमें लगे हुए पारेको निकाल ले और स्याही तथा पीले वर्णके गंधकको जो ऊपर नलीमें लगा हो अलग निकाल लेवे, शीशीके पेटमें लगे हुए रससिंदूरको लेकर सब रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ६८-७२ ॥ रसकपूरकी विधि । टंकणं मधु लाक्षा च ऊर्णागुञ्जायुतो रसः । मर्दितो भृङ्गजद्रावैर्दिनं सम्पुटमागतम् ॥ ७३ ॥ ध्मातो भस्मत्वमाप्नोति शुद्धकर्पूरसन्निभम् ॥ ७४ ॥ सुहागा, मधु (शहद), लाख, भेडकी ऊन, सफेद घुंघुची (श्वेतगुंजा) और पारा इन सबको भांगरेके रसमें खरलकर एक हांडीमें बंद करके कोयलोंकी तीन या चार पहर आंच देवे और धोंकनीसे मंद २ धोंकता रहे तो शुद्ध कपूरके समान भस्म होकर ऊपरकी ओर उड़कर लग जायगी, इसको रसकपूर कहते हैं (यह भी मूर्च्छित है भस्म नहीं, इसको उपदंशादि रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये) ॥ ७३ ॥ ७४ ॥

( २२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । श्वेतभस्म (रसकपूरकी दूसरी विधि । सुधानिधि रस) । पिष्टं पांसुपटुप्रगाढममलं वज्रच्यम्बुना नैकशः, सूतं धातुगतं खटीकवलितं तं सम्पुटे रोधयेत् । अन्तःस्थं लवणस्य तस्य च तले प्रज्वाल्य वह्निं दृढं घस्रं ग्राह्यमथेन्दुकुन्दधवलं भस्मोपरिस्थं शनैः ॥ तद्वल्लद्वितयं लवङ्गसहितं प्रातः प्रयुक्तं भजे- दूर्ध्वं रेचयति द्वियाममसकृत्पेयं जलं शीतलम् ७५ पांसुनमक और शुद्ध पारा इन दोनोंको थोहरके दूधमें अनेक वार घोटे जब पारा और नमक थोहरके दूधमें मिलजावे तो इसको एक लोहेके पात्रमें डाल उस पात्रको खड़िया मिट्टीसे बंद कर संपुट करे फिर एक बडे मिट्टीके पात्रमें सेंधानमक भरकर उस नमकके मध्यमें यह लोहेका संपुट टिका दे, ऊपरसे नमक डालकर संपुटको नमकके मध्यमें छिपा दे फिर इस नमकवाले मिट्टीके पात्रको चूल्हेपर रख इसके नीचे तीक्ष्ण अग्नि जलावे, ४ पहरकी आंच देनेके अनंतर इसको स्वांग शीतल होने दे । फिर संपुटके ऊपरके भागमें लगे हुए सफेद पदार्थको युक्तिसे निकालले यह पारेकी सफेदभस्म है इसको छः रत्ती लेकर २।। मासे लौंगोंके चूर्णमें मिला प्रातःकाल खिलावे तो दोपहरके बाद दस्त होंगे । इसके ऊपर शितल जल पिलाना चाहिये । इसीको रसमंजरीमें रसकपूर और रसचंद्रिकामें भस्म लिखा है ( यह रक्तगत विष और गर तथा उपदंशादि विकारोंमें प्रयोग करना चाहिये ) इस ग्रंथमें इसीको सुधानिधि रस कहा है ॥ ७५ ॥ सर्वाङ्गसुंदर रस ( पीतभस्म ) मर्दयेद्रसगन्धौ च हस्तिशुण्डीद्रवैर्दृढम् । भूधात्रिकार सैर्वापि पर्यन्तं दिनसप्ततः ॥ ७६ ॥

भाषाटीकासहित । ( २३ ) विघृष्य वालुकायन्त्रे मूषायां सन्निवेशयेत् । दिनमेकं ददेदग्निं मन्दंमन्दं निशावधि ॥ ७७ ॥ एवं निष्पद्यते पीतः शीतः सूतस्तु गृह्यते । पर्णखण्डेन तद्गुञ्जां भक्षयेत् श्रूयतां मम ॥ ७८ ॥ क्षुद्बोधं कुरुते पूर्वमुदराणि विनाशयेत् । ज्वराणां नाशनः श्रेष्ठस्तद्वच्छ्रीसुखकारकः ॥ ७९ ॥ हृदयोत्साहजननः स्वरूपतनयप्रदः । बलप्रदः सदा देहे जरानाशनतत्परः ॥ ८० ॥ अंगभंगादिकं दोषं सर्वं नाशयति क्षणात् । एतस्मान्नापरः सूतो रसात्सर्वाङ्गसुन्दरात् ॥ ८१ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक दोनों समान भाग लेकर हस्तिशुण्डीके रसमें और भुईआमलेके रसमें सात २ दिन मर्दन करे, फिर मूषामें संपुट कर एक बालूकी भरी हांडीमें धरे एक दिन रात्रि मंद मंद अग्नि देवे इस प्रकार करनेसे पारा पीत वर्णका होजायगा । यह पीत- भस्म १ रत्ती पानमें रख खानेसे क्षुधाकी वृद्धि होती है एवं जठर रोगका नाश होता है तथा ज्वर नष्ट होता है सुन्दर कान्ति होय एवं चित्त प्रसन्न रहे सुन्दर पुत्रोत्पादन करे, बल बढ़े, वृद्धावस्था जाय, थोड़ेही दिनोंमें अंगभंग आदि दोष नष्ट होते हैं । इस सर्वांगसुंदर रसके समान श्रेष्ठ और औषधि नहीं है ॥ ७६-८१ ॥ धान्याभ्रकं रसं तुल्यं मारयेन्मारकद्रवैः । दिनैकं तेन कल्केन वस्त्रं लिप्त्वा तु वर्त्तिकाम्॥८२॥ विलिप्य तैलैर्वर्त्ति तामेरण्डोत्थैः पुनः पुनः । प्रज्वाल्य घृतभाण्डे तद् गृह्णीयात् पतितञ्च यत्८३॥

( २४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कृष्णभस्म । कृष्णभस्म भवेत्तच्च पुनर्मर्म्मद्यं नियामकैः । दिनैकं पातयेद्यन्त्रे कन्दुकाख्ये न संशयः । मृतः सूतो भवेत्सत्यं तत्तद्रोगेषु योजयेत् ॥ ८४ ॥ धान्याभ्रक और पारद दोनों समान भाग ले आगे कही हुई मारक औषधियोंके रसमें एक दिन मर्दन करे फिर इस कल्कको कपड़े- पर लेपन कर बत्ती बनाले उस बत्तीको एरंडके तेलमें भिगोकर जलावै उसमेंसे जो तेलकी बूंदें गिरें उनको चीनीके पात्र वा घृतके चिकने पात्रमें ग्रहण करे, जो नीचे बैठजाय उस कृष्णवर्ण भस्मको नियामक औषधियोंके रसमें एक दिन मर्दन करे फिर कंदुक यंत्रमें पातन करले तो यह उत्तम कृष्णभस्म होजायगी इसको अनुपान भेदसे अनेक रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ८२-८४ ॥ चतुर्विध भस्मकी उत्तरोत्तर श्रेष्ठता । श्वेतं पीतं तथा रक्तं कृष्णञ्चेति चतुर्विधम् । लक्षणं भस्म सूतानां श्रेष्ठं स्यादुत्तरोत्तरम् ॥ ८५ ॥ पारेकी भस्म ४ प्रकारकी होती है-श्वेत, पीत, रक्त, कृष्ण इन चारों प्रकारकी पारदकी भस्ममें उत्तरोत्तर गुण अधिक जानने । यथा श्वेत भस्मकी अपेक्षा पीत भस्म श्रेष्ठ है और पीतभस्मकी अपेक्षा रक्त भस्म श्रेष्ठ है एवं रक्तभस्मकी अपेक्षा कृष्ण भस्मको श्रेष्ठ कहा है॥८५॥ मूषाके बनानेकी श्रेष्ठ विधि । द्वौ भागौ तुषदग्धस्य चैका वल्मीकमृत्तिका । लौहकिट्टस्य भागैकं श्वेतपाषाणभागिकम् ॥८६॥ नरकेशं समं पञ्च च्छागीक्षीरेण पेषयेत् । याममात्रं दृढं पश्चात्तेन मूषां प्रकल्पयेत् ॥ ८७ ॥ शोषयित्वा तु संलिप्य तत्कल्कैः सन्निरोधयेत् । वज्रमूषेयमाख्याता सम्यक् पारदसाधिका ॥८८॥

भाषाटीकासहित । (२५) दो भाग तुषोंकी भस्म, एक भाग बम्बीकी मिट्टी और एक भाग लोहाकेट्ट, एक भाग श्वेत पत्थरका चूर्ण और एक भाग मनुष्यके केश ( बाल ) ये पांचों चीजें लेकर इनको बकरीके दूधमें एक पहर भर खूब घोटे फिर मूषा बनाकर धूपमें सुखा लेवे जब सूख जावे फिर उसीके कल्कसे लेप कर बंद कर देवे इसको वज्रमूषा कहते हैं । इसमें भली प्रकार पारेका संस्कार होता है ॥ ८६-८८ ॥ नियामक गण । सर्पाक्षी वन्यकक्कोटी कंचुकी यमचिंचिका । शतावरी शंखपुष्पी शरपुंखा पुनर्नवा ॥ ८९ ॥ मण्डूकपर्णी मत्स्याक्षी ब्रह्मदण्डी शिखंडिनी । अनन्ता काकजंघा च काकमाची कपोतिका ॥९०॥ विष्णुक्रांता सहचरा सहदेवी महाबला । बला नागबला मूर्वा चक्रमर्दः करञ्जकः ॥ ९१ ॥ पाठा तामलकी नीली जालिनी पद्मचारिणी । घण्टा त्रिकण्टगोजिह्वा कोकिलाक्षघनध्वनिः ॥९२॥ आखुपर्णी क्षीरिणी च त्रिपुषी मेषशृङ्गिका ॥ कृष्णवर्णा च तुलसी सिंहिका गिरिकर्णिका । एता नियामकौषध्यः पुष्पमूलदलान्विताः ॥९३॥ नाकुलीकंद, वांझककौडा, कंचुकी ( शिरीषवृक्ष ), यमचिंचा ( बृहद् इमली ), शतावर, शंखाहुली, सरफोंका, पुनर्नवा ( साँठी ), मंडूकपर्णी ( ब्राह्मी ), मत्स्याक्षी, ब्रह्मदण्डी, शिखंडिनी ( पीले वर्णकी जूही ), शारिवा, काकजंघा, मकोह, कपोतिका ( नलिका ), विष्णुक्रान्ता ( कोयल ), सहचरा ( पीयावासा ), सहदेवीं, महा- बला, बला, नागबला ( खरैटीके भेद ), मूर्वा, चक्रमर्द ( पनवाड़ ), लताकरंज, पाटला, पाठा, भूमि आमला, नीलनी, जालनी ( कड़वी -

( २६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तोरी ), पद्मचारिणी ( गेंदा ), घंटा ( कठपाडर ), गोखरू, गोजिह्वा ( गोजियाघास ), तालमखाना, चौलाई, मूसाकनी, क्षीरिणी दूधली ), त्रपुषी ( खीरा ), मेढ़ासिंगी, काली तुलसी, श्वेत तुलसी, सिंहिका ( बड़ी कटेली ), श्वेत अपराजिता, यह सब पुष्प; मूल और पत्रयुक्त द्रव्य नियामक कहे हैं इनमें मर्दन करनेसे पारा स्थिर होजाता है ॥ ८९-९३ ॥ मारक गण । घनवचाचित्रकगोक्षुरकटुतुम्बीदंतिकाजाति । सर्पाक्षी शरपुंखा कन्या चांडालिनीकन्दम् ॥ ९४ ॥ विषमुष्टिवज्रवल्ल्यौ लज्जा देवदाली लाक्षा । सहदेवी नीपकणा निर्गुण्डी चक्रं लांगलिका ॥ ९५ ॥ माणार्कचन्द्ररेखा रविभक्ता काकमाचिका चार्कः । विष्णुक्रांता वायसतुण्डी वज्रो बला शुण्ठी चैव ॥९६॥ कोषातकी जयन्ती वाराही हस्तिशुण्डिका रम्भा । मत्स्याक्षी यमचिञ्चा हरिद्रे द्वे पुनर्नवाद्वितयम् ॥९७॥ धुस्तूरः काकजङ्घा शतावरी कंचुकी चैव वन्ध्या । तिलभेकपर्णिके दूर्वा मूर्वा हरीतकी तुलसी ॥९८॥ गोकण्टकाखुपण्यौ कर्कटीकन्दवर्गलता च । मूसली हिङ्गु गुडूची शिग्रुगिरिकर्णिका महाराष्ट्री ॥९९॥ मार्कवसैन्धवसरणी सोमलता श्वेतसर्षपासनञ्च । हंसपदीव्याघ्रपदीकिंशुकभल्लातकेन्द्रवारुणिका ॥१००॥ सर्वैश्चार्द्धांशं वा अष्टादशाधिका वापि द्रव्यम् । रसमारणमूर्च्छादौ च युक्तिज्ञैर्विधिबदुपयोज्यम् ॥१०१॥

भाषाटीकासहित । ( २७ )

नागरमोथे, वच, चित्रक, गोखरू, कड़वीतूंबी, दंती, चमेली, नाकुलीकंद, सरफोंका, घीकुमार, चाण्डालनीकंद, विषमुष्टी (कुचला), वज्रवली (हडफोड़ी), लाजवन्ती, बंदाल डोडा, लाख, सहदेवी, नीप (कदंब), पीपल, संभालू, चक्रमर्द (पनवाड़), लांगलीकंद, मानकंद, आक, चंद्ररेखा (बावची), रविभक्ता (हुलहुल), काक- माची, श्वेतार्क, विष्णुक्रांता (कोयल), कौवाथोड़ी, वज्री (थोहर), बला, सोंठ, कडवी तोरी, जयंती, वाराहीकंद, हाथीशुण्डी, केलाकंद, मत्स्याक्षी, यमचिंचा, हलदी, दारुहलदी, लाल पुनर्नवा, श्वेतपुनर्नवा, धतूरा, काकजंघा, शतावर, कंचुकी, वांझककोड़ेकी जड़, तिलपर्णी, मण्डूकपर्णी (ब्राह्मी), दूर्वा, मूर्वा, हरड़, तुलसी, गोखरू, मूषक- पर्णी, कर्कटीकंद, वर्गलता (पाठा), मूसली, हींग, गिलोय, सुहां- जना, गिरिकर्णिका (अपराजिता), महाराष्ट्री (जलपिप्पली), मार्कव (भांगरा), सेंधानमक, सरणी (प्रसारणी, पसरन), सोमलता, पीली सरसों, असन (विजयसार), हंसपदी, व्याघ्रपदी, कंटाई, केशु, भिलावे और इंद्रायण यह मारक वर्ग है। इन सब औषधियोंका चूर्ण पारेसे आधा भाग मिलाकर या इनमेंसे जो मिलसके उनअठारह द्रव्योंका चूर्ण पारेसे आधा भाग ले अथवा प्रत्येक द्रव्यका अठारहवां भाग चूर्ण लेकर पारदको मारण, मूर्छन आदि करनेके लिये प्रयोग करे ॥ ९४-१०१ ॥ अम्लवर्ग । अम्लवेतसजम्बीरलुम्बाम्लचणकाम्लकाः । नागरङ्गं तिन्तिडी च चिञ्चापत्रञ्च निम्बुकम् ॥१०२॥ चाङ्गेरी दाडिमश्चैव करमर्दं तथैव च । एष चाम्लगणः प्रोक्तो वेतसाम्लसमायुतः ॥१०३॥ अम्लवेत, जम्बीरी, बिजौरा, चणेका खार, नारंगी, तिन्तिडीक, इमलीके पत्ते, नींबू, चांगेरी (चुका) दाड़िम (खट्टा अनार), और कमरख यह अम्लवर्ग कहा है ॥ १०२ ॥ १०३ ॥

( २८ ) रसेंद्रसारसंग्रह । लवणवर्ग। लवणानि च कथ्यन्ते सामुद्रं सैन्धवं विडम् । सौवर्चलं रोमकञ्च चुल्लिका लवणं तथा ॥१०४॥ समुद्रनमक, सैंधवनमक, विडनमक, सौवर्चलनमक, रोमकनमक, चुल्लिकनमक यह लवणवर्ग कहा है ॥ १०४ ॥ मूत्रवर्ग । मूत्राणि हस्तिकरभमहिषीखरवाजिनाम् । गोजावीनां स्त्रियां पुंसां मूत्रवर्ग उदाहृतः ॥ १०५ ॥ हस्तिमूत्र, उष्ट्रमूत्र,महिषीमूत्र,गर्दभमूत्र, अश्वमूत्र, गोमूत्र,बकरीका मूत्र, भेड़्का मूत्र, स्त्रीमूत्र, पुरुषमूत्र यह मूत्रवर्ग कहा है ॥ १०५ ॥ द्रावकवर्ग । गुञ्जाटङ्कणमध्वाज्यगुडा द्रावकपञ्चकाः । सफेद गुंजा (घुंघुची), सुहागा, शहत, घृत, गुड़ ये पांच द्रव्य द्रावक हैं । इनको पञ्चद्रावक कहते हैं । पित्तवर्ग । पित्तं पञ्चविधं मत्स्यगवाश्वरुरुबार्हिजम् ॥ १०६ ॥ पित्तभी पांच प्रकारका होता है-मछलीका, गौका, घोड़ेका, हिरनका और मोरका इनको पित्तपंचक कहते हैं ॥ १०६ ॥ क्षारवर्ग । स्वर्जिका टङ्कणं चैव यवक्षार उदाहृतः ॥ १०७ ॥ सज्जीखार, सुहागाखार, यवक्षार इनको क्षारवर्ग कहते हैं ॥१०७॥ रससेवनविधि । प्रातरेव पुरतो विरेचनं तद्दिनोपवसनं विधाय च । तत्परेऽहनिचपथ्यसेवनंतत्परेऽहिनरसेंद्रसेवनम् १०८

भाषाटीकासहित । ( २९ ) प्रथम विधिवत् विरेचन कराकर शुद्ध देह होनेपर विरेचनांतमें पेयादि विधि सेवन कर मनुष्य स्वस्थ होजाय। तदनंतर जब रस सेवन करना चाहे तो प्रथम प्रातःकाल उठकर ईश्वरका स्मरण करे और उस दिन उपवास करे फिर दूसरे दिन मुद्गयूषादि पथ्यका सेवन करे। फिर तीसरे दिन प्रातःकालसे पारेका सेवन करे ॥ १०८ ॥ रससेवनका फल । बुद्धिस्मृतिप्रभाकान्तिबलञ्चैव रसस्तथा । वर्द्धन्ते सर्व एवैते रससेवाविधौ नृणाम् ॥ १०९ ॥ विधिवत् पारेके सेवनसे बुद्धि, स्मृति, प्रभा, शरीरकी कांति, बल और शरीरमें शुद्ध रस इन सबकी वृद्धि होती है ॥ १०९ ॥ रससेवनमें पथ्य । हितं मुद्गाम्बु दुग्धाज्यं शाल्यन्नं च विशेषतः । शाकं पौनर्नवं वास्तु मेघनादंश्च यूथिकाम् ॥ लवणं मागधीं मुस्तं पद्ममूलानि भक्षयेत् ॥११०॥ रससेवन करनेवालेको मूंगका यूष, दूध, घृत, शाली चावल यह सब विशेषरूपसे पथ्य हैं । और पुनर्नवा, बाथू, चौलाई, जूहीका शाक यह शाक। लोनियाशाक, हरी पीपलका शाक, डीलेनागमोथेका शाक और भिसोंका शाक यह सब पथ्य हैं ॥ ११० ॥ अनुपानं तु दातव्यं ज्ञात्वा रोगादिकं भिषक्।१११। वैद्य रोगीके रोगको देखकर उसमें जो हितकारक हो उस अनुपा- नसे पारेका सेवन करावे ॥ १११ ॥ रससेवनमें कुपथ्य । कूष्माण्डं कर्कटीं चैव कलिंगं कारवेल्लकम् । कुसुम्भिका च कर्कोटी कलम्बी काकमाचिका । ककाराष्टकमेतद्धि वर्जयेद्रसभक्षकः ॥ ११२ ॥