भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( १९ ) घटीं तां मुखे सचूर्णां खटिकाञ्च दत्त्वा । क्रमाग्निना त्रीणि दिनानि पक्त्वा तां वालुकायन्त्रगतां ततः स्यात् ॥ ६३ ॥ बन्धूकपुष्पारुणमीशजस्य भस्म प्रयोज्यं सकलामयेषु । निजानुपानैर्मरणं जराञ्च हन्त्यस्य वल्लः क्रमसेवनेन ॥ ६४ ॥ एक पल पारा, तीन पल गंधक और एक मासा शीसा इन सब औषधियोंको उत्तम खरलमें खूब घोटे, फिर उस कज्जलीको आतशी शीशीमें डाल ऊपर सात कपड़मिट्टी करे फिर उस शीशीको वालुकायंत्रमें मंद, मध्य, तीव्र अग्नि देवे एक पहर शीशीका मुख खुला रहने दे जब गंधकका धूम निकल लेवे तब उस शीशीके मुख- पर खड़िया मिट्टीका या गुड़ चूनेका डाट लगाकर मुख बंद करदेवे ( कोई लोहेकी सींख शीशीमें डालकर देख लेते हैं जब शीशीके गलेमें लगा हुवा द्रव्य सींखसे लगने लगे तो मुख बंद करते हैं ) फिर २४ पहर अग्नि देनेके अनंतर स्वांग शीतल होनेपर शीशी तोड़कर बीचमें दुपहरियाके फूल समान लाल वर्णके शीशीमें चिपटे हुवे पारदको निकालले इसको संपूर्ण रोगोंमें रोगविशेषोंके अनुपानोंसे देवे तो यह संपूर्ण रोगोंको नष्ट करता है और इसको ३ रत्ती सेवन नित्य करनेसे जरा मृत्यु भी दूर होते हैं ॥ ६२-६४ ॥ [ मेरा अनुभव-मैं कवचीयन्त्र बनाते समय शीशीपर कपड़ा और मिट्टीको न लपेट, केवल खड़िया, मनुष्यके शिरके बाल और रूईको खूब कूटपीस चढा देताहूं, यह कवच इतना दृढ होता है कि चाहे कांचकी शीशी तेज आंचसे पिघल जावे, परन्तु यह मिट्टी कभी नहीं टूटती ॥ अनुवादक. ] पलमात्रं रसं शुद्धं तावन्मात्रं तु गन्धकम् । विधिवत्कज्जलीं कृत्वा न्यग्रोधांकुरवारिभिः ॥६५॥

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