रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अन्यप्रकारसे मारणविधि । भुजङ्गवल्लीनीरेण मर्दयेत्पारदं दृढम् । कर्कटीकन्दमूषायां संपुटस्थं पुटेद्गजे ॥ भस्म तद्योगवाहि स्यात्सर्वकर्मसु योजयेत् ॥ ५९ ॥ नागवल्ली ( पान ) के रसमें पारेको खूब दृढ मर्दन करे । फिर इसको कर्कटीकंद ( बांझककौडेकी जड या कंचन लताकी जड ) की मूषा बना उसमें इस पारेको डाल दूसरी मूषासे बंद कर विधि- वत् संधान करे उसके ऊपर कपडमिट्टी कर धूपमें सुखाले फिर इसको गजपुटमें पुट देवे तो पारेकी भस्म होजायगी । यह योगवाही भस्म सर्व कार्योंमें लेनी चाहिये ॥ ५९ ॥ श्वेतांकोठजटानीरैर्मर्त्यः सूतो दिनत्रयम् । पुटेत्तु चान्धमूषायां सूतो भस्मत्वमाप्नुयात् ॥ ६०॥ श्वेत अंकोठ ढेराकी जडके रसमें पारेको तीन दिन खरल कर फिर अंधमूषामें रखकर पुट देवे तो पारेकी भस्म हो जाती है ॥ ६० ॥ देवदाली हंसपदी यमचिञ्चा पुनर्नवा । एभिः सूतो विमृष्टव्यो पुटनान्म्रियते ध्रुवम् ॥ ६१ ॥ अथवा-देवदाली ( वंदाल डोडा ), हंसपदी, यमचिंचा, ( बृहद् इमली ) पुनर्नवा इन सब औषधियोंके साथ पारेको मर्दन कर पुट देनेसे पारेकी भस्म होजाती है ॥ ६१ ॥ रससिन्दूर । भागो रसस्य त्रय एव भागा गन्धस्य माषः पवना- शनस्य । संमर्द्य गाढं सकलं सुभाण्डे तां कज्जलीं काचघटे निदध्यात् ॥ ६२ ॥ संरुध्य मृत्कर्पटके-