भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । तं सूतं योजयेद्योगे सप्तकंचुकवर्जितम् । संशुद्धिमन्तरेणापि शुद्धोऽयं रसकर्मणि ॥ ५५ ॥ अथवा-पारिभद्र (पंडयारा या नीम) के रसमें सिंगरफको एक प्रहर खरल करे अथवा जंबीरी नींबूके रसमें खरल करे फिर डमरूयंत्रमें या उपरोक्त पातनयन्त्रमें डाल पूर्ववत् पारा निकाल ले तो यह पारा सप्त कंचुकीरहित होता है और बिना ही आठ संस्कारोंके शुद्ध माना जाता है यह सब रसोंमें डालना चाहिये ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ मूर्च्छनविधि । गन्धकेन रसं प्राज्ञः सुदृढं मर्दयेद्भिषक ! कज्जलाभो यदा सूतो विहाय घनचापलम् ॥ ५६ ॥ दृश्यतेऽसौ तदा ज्ञेयो मूर्च्छितो रसकोविदैः । असौ रोगचयं हन्यादनुपानस्य योगतः ॥५७॥ पारे और गंधकको सम भाग लेकर खरलमें तबतक मर्दन करे जबतक उसकी घनता ( गाढता ) और चपलता दूर होकर सुर्मेके समान कज्जली न होजाय । इस कज्जलीको मूर्च्छित पारा कहते हैं । इस कज्जलीको अनुपान विशेषसे विधिवत् सेवन करावे तो यह अनेक रोगोंके समूहको दूर करे ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ पारदमारण । द्विपलं शुद्धसूतस्य सूतार्धं गन्धकं तथा । कन्यानीरेण संमर्द्य दिनमेकं निरन्तरम् ॥ रुद्ध्वा तद्भूधरे यन्त्रे दिनैकं मारयेत्पुटे ॥ ५८ ॥ शुद्ध पारा दो पल, शुद्ध गंधक एक पल इन दोनोंको घीकुमारके रसमें एक दिन ( बराबर २४ घंटे ) मर्दन करके भूधर यंत्रमें रख एक दिनकी पुट दे तो इस पारेकी भस्म होजायगी ( यह मूर्च्छित पारद है बिना विधि खानेसे अवगुण करता है ) ॥ ५८ ॥