रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । नेके भयसे नहीं लिखे और इस ग्रंथकारने केवल पारेके संक्षेपसे ४ संस्कार लिखे हैं जैसे-शोधन, मूर्च्छन, बंधन और मारण सो यथा- क्रम ग्रंथकारने लिखे हैं ॥ ५० ॥ सिंगरकसे पारा निकालनेमें अन्यमत । दरदं तण्डुलस्थूलं कृत्वा मृत्पात्रके त्रिदिनम् । भाव्यं जंबीररसैश्चांगेय्र्या वा रसैर्बहुधा ॥ ५१ ॥ ततश्च जंबीरवारिणा चांगेर्या रसेन वा परिप्लुतम् । कृत्वा स्थालीमध्ये निधाय तदुपरि कठिनीघृष्टमुत्तानम् ॥ चारु शरावं तत्र त्रिंशद्वारं जलं देयम् । उष्णे देयं तथैव तदूर्ध्वपातनेन निर्मलः शिवजः ॥ ५३ ॥ सिंगरफके छोटे छोटे चावलोंके बराबर टुकडे कर उनमें नींबूका रस डालके सुखावे अथवा चांगेरी ( चौपतिया शाक ) के रसकी अनेक ( सात ) भावना देवे फिर मट्टीके बडे पात्रमें डालकर उसमें इतना नींबूका रस और चांगेरीका रस डाले जिसमें सिंगरफका सब चूरा डूब जावे फिर उस पात्रके मुखपर खडियासे लिपा हुआ एक तौल्ला ( बडाभारी शराव ) सीधा रखकर मिट्टी और कपडेसे खूब संधिलेप करदे इस पात्रको चूल्हेपर रख नीचे नीचे तीन प्रहर अग्नि जलावे और ऊपरवाले पात्रमें जब जल गरम हो तो निकालकर शीतल जल डाले ऐसे तीस बार जल बदले जिससे ऊपरका पात्र गरम न होने पावे । तीन पहरके अनंतर आग निकालकर बुझादे जब यह यन्त्र सर्वांग शीतल हो जाय तो ऊपरके पात्रमें लगे शुद्ध पारेको खडिया सहित निकाल ले, फिर कपड छानकर कांजी और पानीसे धोकर साफकर ले यह शुद्ध पारद है ॥ ५१-५३ ॥ पारिभद्ररसैः पेष्यं हिंगुलं याममात्रकम् । जम्बीराणां रसैर्वाथ पचेत्पातनयन्त्रके ॥ ५४ ॥