रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
भाषाटीकासहित । ( १९ ) घटीं तां मुखे सचूर्णां खटिकाञ्च दत्त्वा । क्रमाग्निना त्रीणि दिनानि पक्त्वा तां वालुकायन्त्रगतां ततः स्यात् ॥ ६३ ॥ बन्धूकपुष्पारुणमीशजस्य भस्म प्रयोज्यं सकलामयेषु । निजानुपानैर्मरणं जराञ्च हन्त्यस्य वल्लः क्रमसेवनेन ॥ ६४ ॥ एक पल पारा, तीन पल गंधक और एक मासा शीसा इन सब औषधियोंको उत्तम खरलमें खूब घोटे, फिर उस कज्जलीको आतशी शीशीमें डाल ऊपर सात कपड़मिट्टी करे फिर उस शीशीको वालुकायंत्रमें मंद, मध्य, तीव्र अग्नि देवे एक पहर शीशीका मुख खुला रहने दे जब गंधकका धूम निकल लेवे तब उस शीशीके मुख- पर खड़िया मिट्टीका या गुड़ चूनेका डाट लगाकर मुख बंद करदेवे ( कोई लोहेकी सींख शीशीमें डालकर देख लेते हैं जब शीशीके गलेमें लगा हुवा द्रव्य सींखसे लगने लगे तो मुख बंद करते हैं ) फिर २४ पहर अग्नि देनेके अनंतर स्वांग शीतल होनेपर शीशी तोड़कर बीचमें दुपहरियाके फूल समान लाल वर्णके शीशीमें चिपटे हुवे पारदको निकालले इसको संपूर्ण रोगोंमें रोगविशेषोंके अनुपानोंसे देवे तो यह संपूर्ण रोगोंको नष्ट करता है और इसको ३ रत्ती सेवन नित्य करनेसे जरा मृत्यु भी दूर होते हैं ॥ ६२-६४ ॥ [ मेरा अनुभव-मैं कवचीयन्त्र बनाते समय शीशीपर कपड़ा और मिट्टीको न लपेट, केवल खड़िया, मनुष्यके शिरके बाल और रूईको खूब कूटपीस चढा देताहूं, यह कवच इतना दृढ होता है कि चाहे कांचकी शीशी तेज आंचसे पिघल जावे, परन्तु यह मिट्टी कभी नहीं टूटती ॥ अनुवादक. ] पलमात्रं रसं शुद्धं तावन्मात्रं तु गन्धकम् । विधिवत्कज्जलीं कृत्वा न्यग्रोधांकुरवारिभिः ॥६५॥
( २० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । भावनात्रितयं दत्त्वा स्थालीमध्ये निधापयेत् । विरच्य कवचीयन्त्रं वालुकाभिः प्रपूरयेत् ॥६६॥ दद्यात्तदनु मन्दाग्निं भिषग्यामचतुष्टयम् । जायते रससिन्दूरं तरुणादित्यसन्निभम् ॥ अनुपानविशेषेण करोति विविधान् गुणान् ॥६७॥ अन्य प्रकार-शुद्ध पारा ४ तोले, शुद्ध गंधक ४ तोले इन दोनोंको विधिवत् खरल कर कजली बनावे फिर इसमें वटवृक्षके अंकुरोंके रसकी तीन भावना देवे । सूखनेपर अग्निसहनशीला शीशीमें भरकर उस शीशीपर सात वार कपड़मिट्टी करके सुखाले फिर वालुका यंत्रमें रखकर चार पहरकी मंदाग्नि देवे तो प्रातःकालके सूर्य समान वर्णवाला रससिंदूर होजाता है । इसको अनुपान विशेषसे प्रयोग करे तो अनेक रोगोंको दूर करता है ( इसमें मन्द-मध्य-तीक्ष्ण क्रमसे कमसे कम बारह पहरतक तो आंच अवश्य दी जानी चाहिये । थोड़ीमें पाक असंभव हैं ) ॥ ६६-६७ ॥ पृथक् समंसमं कृत्वा पारदं गन्धकं तथा । नवसारं धूमसारं स्फटिकं याममात्रकम् ॥ ६८ ॥ निम्बूरसेन संमर्द्य काचकूप्यां निवेशयेत् । मुखे पाषाणखटिकां दत्त्वा मुद्रां प्रलेपयेत् ॥ ६९ ॥ सप्तभिर्मृत्तिकावस्त्रैः पृथक् संशोध्य वेष्टयेत् । सच्छिद्रायां मृदः स्थाल्यां कूपिकां तां निवेशयेत् ७०. पूरयेत्सिकतापूरैरागल मतिमान् भिषक् । निवेश्य चुल्ल्यां दहनं मन्दं मध्यं खरं क्रमात् ॥ ७१ ॥ प्रज्वाल्य द्वादशं यामं स्वांगशीतं समुद्धरेत् ।
भाषाटीकासहित । (२१) स्फोटयित्वा तु मुक्ताभमूर्द्ध्लग्नं वलिं त्यजेत् । अधःस्थं रससिन्दूरं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ७२ ॥ अन्य प्रकार-पारा, गंधक, नौसादर, गृहधूम, फिटकिरी इन सबको चार चार तोला अलग २ लेकर नींबूके रसमें एक पहर मर्दन करके आतशी शीशीमें भरकर शीशीका मुख ईंट या पत्थरके डाटसे बंद् कर सात कपड़मिट्टी चढ़ाकर सुखाले फिर एक बड़ी चाटी (मिट्टीका पात्र) ले उसके तल भागमें छिद्र कर उस छेदपर शीशी रखकर पात्रको गलपर्यंत वालु (रेत) से भरदे (इसको वालुका यंत्र कहतें हैं ) इस यंत्रको चूल्हे पर चढ़ाकर क्रमसे मंद, मध्य और तीक्ष्ण अग्नि देवे ऐसे बारह (१२) पहर अग्नि देनेके अनंतर आग बुझा दे । स्वांग शीतल होनेपर शीशीको फोड़ कर उसमेंसे मोतीके समान चमकदार शीशीमें लगे हुए पारेको निकाल ले और स्याही तथा पीले वर्णके गंधकको जो ऊपर नलीमें लगा हो अलग निकाल लेवे, शीशीके पेटमें लगे हुए रससिंदूरको लेकर सब रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ६८-७२ ॥ रसकपूरकी विधि । टंकणं मधु लाक्षा च ऊर्णागुञ्जायुतो रसः । मर्दितो भृङ्गजद्रावैर्दिनं सम्पुटमागतम् ॥ ७३ ॥ ध्मातो भस्मत्वमाप्नोति शुद्धकर्पूरसन्निभम् ॥ ७४ ॥ सुहागा, मधु (शहद), लाख, भेडकी ऊन, सफेद घुंघुची (श्वेतगुंजा) और पारा इन सबको भांगरेके रसमें खरलकर एक हांडीमें बंद करके कोयलोंकी तीन या चार पहर आंच देवे और धोंकनीसे मंद २ धोंकता रहे तो शुद्ध कपूरके समान भस्म होकर ऊपरकी ओर उड़कर लग जायगी, इसको रसकपूर कहते हैं (यह भी मूर्च्छित है भस्म नहीं, इसको उपदंशादि रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये) ॥ ७३ ॥ ७४ ॥
( २२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । श्वेतभस्म (रसकपूरकी दूसरी विधि । सुधानिधि रस) । पिष्टं पांसुपटुप्रगाढममलं वज्रच्यम्बुना नैकशः, सूतं धातुगतं खटीकवलितं तं सम्पुटे रोधयेत् । अन्तःस्थं लवणस्य तस्य च तले प्रज्वाल्य वह्निं दृढं घस्रं ग्राह्यमथेन्दुकुन्दधवलं भस्मोपरिस्थं शनैः ॥ तद्वल्लद्वितयं लवङ्गसहितं प्रातः प्रयुक्तं भजे- दूर्ध्वं रेचयति द्वियाममसकृत्पेयं जलं शीतलम् ७५ पांसुनमक और शुद्ध पारा इन दोनोंको थोहरके दूधमें अनेक वार घोटे जब पारा और नमक थोहरके दूधमें मिलजावे तो इसको एक लोहेके पात्रमें डाल उस पात्रको खड़िया मिट्टीसे बंद कर संपुट करे फिर एक बडे मिट्टीके पात्रमें सेंधानमक भरकर उस नमकके मध्यमें यह लोहेका संपुट टिका दे, ऊपरसे नमक डालकर संपुटको नमकके मध्यमें छिपा दे फिर इस नमकवाले मिट्टीके पात्रको चूल्हेपर रख इसके नीचे तीक्ष्ण अग्नि जलावे, ४ पहरकी आंच देनेके अनंतर इसको स्वांग शीतल होने दे । फिर संपुटके ऊपरके भागमें लगे हुए सफेद पदार्थको युक्तिसे निकालले यह पारेकी सफेदभस्म है इसको छः रत्ती लेकर २।। मासे लौंगोंके चूर्णमें मिला प्रातःकाल खिलावे तो दोपहरके बाद दस्त होंगे । इसके ऊपर शितल जल पिलाना चाहिये । इसीको रसमंजरीमें रसकपूर और रसचंद्रिकामें भस्म लिखा है ( यह रक्तगत विष और गर तथा उपदंशादि विकारोंमें प्रयोग करना चाहिये ) इस ग्रंथमें इसीको सुधानिधि रस कहा है ॥ ७५ ॥ सर्वाङ्गसुंदर रस ( पीतभस्म ) मर्दयेद्रसगन्धौ च हस्तिशुण्डीद्रवैर्दृढम् । भूधात्रिकार सैर्वापि पर्यन्तं दिनसप्ततः ॥ ७६ ॥
भाषाटीकासहित । ( २३ ) विघृष्य वालुकायन्त्रे मूषायां सन्निवेशयेत् । दिनमेकं ददेदग्निं मन्दंमन्दं निशावधि ॥ ७७ ॥ एवं निष्पद्यते पीतः शीतः सूतस्तु गृह्यते । पर्णखण्डेन तद्गुञ्जां भक्षयेत् श्रूयतां मम ॥ ७८ ॥ क्षुद्बोधं कुरुते पूर्वमुदराणि विनाशयेत् । ज्वराणां नाशनः श्रेष्ठस्तद्वच्छ्रीसुखकारकः ॥ ७९ ॥ हृदयोत्साहजननः स्वरूपतनयप्रदः । बलप्रदः सदा देहे जरानाशनतत्परः ॥ ८० ॥ अंगभंगादिकं दोषं सर्वं नाशयति क्षणात् । एतस्मान्नापरः सूतो रसात्सर्वाङ्गसुन्दरात् ॥ ८१ ॥ शुद्ध पारा, शुद्ध गंधक दोनों समान भाग लेकर हस्तिशुण्डीके रसमें और भुईआमलेके रसमें सात २ दिन मर्दन करे, फिर मूषामें संपुट कर एक बालूकी भरी हांडीमें धरे एक दिन रात्रि मंद मंद अग्नि देवे इस प्रकार करनेसे पारा पीत वर्णका होजायगा । यह पीत- भस्म १ रत्ती पानमें रख खानेसे क्षुधाकी वृद्धि होती है एवं जठर रोगका नाश होता है तथा ज्वर नष्ट होता है सुन्दर कान्ति होय एवं चित्त प्रसन्न रहे सुन्दर पुत्रोत्पादन करे, बल बढ़े, वृद्धावस्था जाय, थोड़ेही दिनोंमें अंगभंग आदि दोष नष्ट होते हैं । इस सर्वांगसुंदर रसके समान श्रेष्ठ और औषधि नहीं है ॥ ७६-८१ ॥ धान्याभ्रकं रसं तुल्यं मारयेन्मारकद्रवैः । दिनैकं तेन कल्केन वस्त्रं लिप्त्वा तु वर्त्तिकाम्॥८२॥ विलिप्य तैलैर्वर्त्ति तामेरण्डोत्थैः पुनः पुनः । प्रज्वाल्य घृतभाण्डे तद् गृह्णीयात् पतितञ्च यत्८३॥
( २४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कृष्णभस्म । कृष्णभस्म भवेत्तच्च पुनर्मर्म्मद्यं नियामकैः । दिनैकं पातयेद्यन्त्रे कन्दुकाख्ये न संशयः । मृतः सूतो भवेत्सत्यं तत्तद्रोगेषु योजयेत् ॥ ८४ ॥ धान्याभ्रक और पारद दोनों समान भाग ले आगे कही हुई मारक औषधियोंके रसमें एक दिन मर्दन करे फिर इस कल्कको कपड़े- पर लेपन कर बत्ती बनाले उस बत्तीको एरंडके तेलमें भिगोकर जलावै उसमेंसे जो तेलकी बूंदें गिरें उनको चीनीके पात्र वा घृतके चिकने पात्रमें ग्रहण करे, जो नीचे बैठजाय उस कृष्णवर्ण भस्मको नियामक औषधियोंके रसमें एक दिन मर्दन करे फिर कंदुक यंत्रमें पातन करले तो यह उत्तम कृष्णभस्म होजायगी इसको अनुपान भेदसे अनेक रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ८२-८४ ॥ चतुर्विध भस्मकी उत्तरोत्तर श्रेष्ठता । श्वेतं पीतं तथा रक्तं कृष्णञ्चेति चतुर्विधम् । लक्षणं भस्म सूतानां श्रेष्ठं स्यादुत्तरोत्तरम् ॥ ८५ ॥ पारेकी भस्म ४ प्रकारकी होती है-श्वेत, पीत, रक्त, कृष्ण इन चारों प्रकारकी पारदकी भस्ममें उत्तरोत्तर गुण अधिक जानने । यथा श्वेत भस्मकी अपेक्षा पीत भस्म श्रेष्ठ है और पीतभस्मकी अपेक्षा रक्त भस्म श्रेष्ठ है एवं रक्तभस्मकी अपेक्षा कृष्ण भस्मको श्रेष्ठ कहा है॥८५॥ मूषाके बनानेकी श्रेष्ठ विधि । द्वौ भागौ तुषदग्धस्य चैका वल्मीकमृत्तिका । लौहकिट्टस्य भागैकं श्वेतपाषाणभागिकम् ॥८६॥ नरकेशं समं पञ्च च्छागीक्षीरेण पेषयेत् । याममात्रं दृढं पश्चात्तेन मूषां प्रकल्पयेत् ॥ ८७ ॥ शोषयित्वा तु संलिप्य तत्कल्कैः सन्निरोधयेत् । वज्रमूषेयमाख्याता सम्यक् पारदसाधिका ॥८८॥
भाषाटीकासहित । (२५) दो भाग तुषोंकी भस्म, एक भाग बम्बीकी मिट्टी और एक भाग लोहाकेट्ट, एक भाग श्वेत पत्थरका चूर्ण और एक भाग मनुष्यके केश ( बाल ) ये पांचों चीजें लेकर इनको बकरीके दूधमें एक पहर भर खूब घोटे फिर मूषा बनाकर धूपमें सुखा लेवे जब सूख जावे फिर उसीके कल्कसे लेप कर बंद कर देवे इसको वज्रमूषा कहते हैं । इसमें भली प्रकार पारेका संस्कार होता है ॥ ८६-८८ ॥ नियामक गण । सर्पाक्षी वन्यकक्कोटी कंचुकी यमचिंचिका । शतावरी शंखपुष्पी शरपुंखा पुनर्नवा ॥ ८९ ॥ मण्डूकपर्णी मत्स्याक्षी ब्रह्मदण्डी शिखंडिनी । अनन्ता काकजंघा च काकमाची कपोतिका ॥९०॥ विष्णुक्रांता सहचरा सहदेवी महाबला । बला नागबला मूर्वा चक्रमर्दः करञ्जकः ॥ ९१ ॥ पाठा तामलकी नीली जालिनी पद्मचारिणी । घण्टा त्रिकण्टगोजिह्वा कोकिलाक्षघनध्वनिः ॥९२॥ आखुपर्णी क्षीरिणी च त्रिपुषी मेषशृङ्गिका ॥ कृष्णवर्णा च तुलसी सिंहिका गिरिकर्णिका । एता नियामकौषध्यः पुष्पमूलदलान्विताः ॥९३॥ नाकुलीकंद, वांझककौडा, कंचुकी ( शिरीषवृक्ष ), यमचिंचा ( बृहद् इमली ), शतावर, शंखाहुली, सरफोंका, पुनर्नवा ( साँठी ), मंडूकपर्णी ( ब्राह्मी ), मत्स्याक्षी, ब्रह्मदण्डी, शिखंडिनी ( पीले वर्णकी जूही ), शारिवा, काकजंघा, मकोह, कपोतिका ( नलिका ), विष्णुक्रान्ता ( कोयल ), सहचरा ( पीयावासा ), सहदेवीं, महा- बला, बला, नागबला ( खरैटीके भेद ), मूर्वा, चक्रमर्द ( पनवाड़ ), लताकरंज, पाटला, पाठा, भूमि आमला, नीलनी, जालनी ( कड़वी -
( २६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तोरी ), पद्मचारिणी ( गेंदा ), घंटा ( कठपाडर ), गोखरू, गोजिह्वा ( गोजियाघास ), तालमखाना, चौलाई, मूसाकनी, क्षीरिणी दूधली ), त्रपुषी ( खीरा ), मेढ़ासिंगी, काली तुलसी, श्वेत तुलसी, सिंहिका ( बड़ी कटेली ), श्वेत अपराजिता, यह सब पुष्प; मूल और पत्रयुक्त द्रव्य नियामक कहे हैं इनमें मर्दन करनेसे पारा स्थिर होजाता है ॥ ८९-९३ ॥ मारक गण । घनवचाचित्रकगोक्षुरकटुतुम्बीदंतिकाजाति । सर्पाक्षी शरपुंखा कन्या चांडालिनीकन्दम् ॥ ९४ ॥ विषमुष्टिवज्रवल्ल्यौ लज्जा देवदाली लाक्षा । सहदेवी नीपकणा निर्गुण्डी चक्रं लांगलिका ॥ ९५ ॥ माणार्कचन्द्ररेखा रविभक्ता काकमाचिका चार्कः । विष्णुक्रांता वायसतुण्डी वज्रो बला शुण्ठी चैव ॥९६॥ कोषातकी जयन्ती वाराही हस्तिशुण्डिका रम्भा । मत्स्याक्षी यमचिञ्चा हरिद्रे द्वे पुनर्नवाद्वितयम् ॥९७॥ धुस्तूरः काकजङ्घा शतावरी कंचुकी चैव वन्ध्या । तिलभेकपर्णिके दूर्वा मूर्वा हरीतकी तुलसी ॥९८॥ गोकण्टकाखुपण्यौ कर्कटीकन्दवर्गलता च । मूसली हिङ्गु गुडूची शिग्रुगिरिकर्णिका महाराष्ट्री ॥९९॥ मार्कवसैन्धवसरणी सोमलता श्वेतसर्षपासनञ्च । हंसपदीव्याघ्रपदीकिंशुकभल्लातकेन्द्रवारुणिका ॥१००॥ सर्वैश्चार्द्धांशं वा अष्टादशाधिका वापि द्रव्यम् । रसमारणमूर्च्छादौ च युक्तिज्ञैर्विधिबदुपयोज्यम् ॥१०१॥
भाषाटीकासहित । ( २७ )
नागरमोथे, वच, चित्रक, गोखरू, कड़वीतूंबी, दंती, चमेली, नाकुलीकंद, सरफोंका, घीकुमार, चाण्डालनीकंद, विषमुष्टी (कुचला), वज्रवली (हडफोड़ी), लाजवन्ती, बंदाल डोडा, लाख, सहदेवी, नीप (कदंब), पीपल, संभालू, चक्रमर्द (पनवाड़), लांगलीकंद, मानकंद, आक, चंद्ररेखा (बावची), रविभक्ता (हुलहुल), काक- माची, श्वेतार्क, विष्णुक्रांता (कोयल), कौवाथोड़ी, वज्री (थोहर), बला, सोंठ, कडवी तोरी, जयंती, वाराहीकंद, हाथीशुण्डी, केलाकंद, मत्स्याक्षी, यमचिंचा, हलदी, दारुहलदी, लाल पुनर्नवा, श्वेतपुनर्नवा, धतूरा, काकजंघा, शतावर, कंचुकी, वांझककोड़ेकी जड़, तिलपर्णी, मण्डूकपर्णी (ब्राह्मी), दूर्वा, मूर्वा, हरड़, तुलसी, गोखरू, मूषक- पर्णी, कर्कटीकंद, वर्गलता (पाठा), मूसली, हींग, गिलोय, सुहां- जना, गिरिकर्णिका (अपराजिता), महाराष्ट्री (जलपिप्पली), मार्कव (भांगरा), सेंधानमक, सरणी (प्रसारणी, पसरन), सोमलता, पीली सरसों, असन (विजयसार), हंसपदी, व्याघ्रपदी, कंटाई, केशु, भिलावे और इंद्रायण यह मारक वर्ग है। इन सब औषधियोंका चूर्ण पारेसे आधा भाग मिलाकर या इनमेंसे जो मिलसके उनअठारह द्रव्योंका चूर्ण पारेसे आधा भाग ले अथवा प्रत्येक द्रव्यका अठारहवां भाग चूर्ण लेकर पारदको मारण, मूर्छन आदि करनेके लिये प्रयोग करे ॥ ९४-१०१ ॥ अम्लवर्ग । अम्लवेतसजम्बीरलुम्बाम्लचणकाम्लकाः । नागरङ्गं तिन्तिडी च चिञ्चापत्रञ्च निम्बुकम् ॥१०२॥ चाङ्गेरी दाडिमश्चैव करमर्दं तथैव च । एष चाम्लगणः प्रोक्तो वेतसाम्लसमायुतः ॥१०३॥ अम्लवेत, जम्बीरी, बिजौरा, चणेका खार, नारंगी, तिन्तिडीक, इमलीके पत्ते, नींबू, चांगेरी (चुका) दाड़िम (खट्टा अनार), और कमरख यह अम्लवर्ग कहा है ॥ १०२ ॥ १०३ ॥
( २८ ) रसेंद्रसारसंग्रह । लवणवर्ग। लवणानि च कथ्यन्ते सामुद्रं सैन्धवं विडम् । सौवर्चलं रोमकञ्च चुल्लिका लवणं तथा ॥१०४॥ समुद्रनमक, सैंधवनमक, विडनमक, सौवर्चलनमक, रोमकनमक, चुल्लिकनमक यह लवणवर्ग कहा है ॥ १०४ ॥ मूत्रवर्ग । मूत्राणि हस्तिकरभमहिषीखरवाजिनाम् । गोजावीनां स्त्रियां पुंसां मूत्रवर्ग उदाहृतः ॥ १०५ ॥ हस्तिमूत्र, उष्ट्रमूत्र,महिषीमूत्र,गर्दभमूत्र, अश्वमूत्र, गोमूत्र,बकरीका मूत्र, भेड़्का मूत्र, स्त्रीमूत्र, पुरुषमूत्र यह मूत्रवर्ग कहा है ॥ १०५ ॥ द्रावकवर्ग । गुञ्जाटङ्कणमध्वाज्यगुडा द्रावकपञ्चकाः । सफेद गुंजा (घुंघुची), सुहागा, शहत, घृत, गुड़ ये पांच द्रव्य द्रावक हैं । इनको पञ्चद्रावक कहते हैं । पित्तवर्ग । पित्तं पञ्चविधं मत्स्यगवाश्वरुरुबार्हिजम् ॥ १०६ ॥ पित्तभी पांच प्रकारका होता है-मछलीका, गौका, घोड़ेका, हिरनका और मोरका इनको पित्तपंचक कहते हैं ॥ १०६ ॥ क्षारवर्ग । स्वर्जिका टङ्कणं चैव यवक्षार उदाहृतः ॥ १०७ ॥ सज्जीखार, सुहागाखार, यवक्षार इनको क्षारवर्ग कहते हैं ॥१०७॥ रससेवनविधि । प्रातरेव पुरतो विरेचनं तद्दिनोपवसनं विधाय च । तत्परेऽहनिचपथ्यसेवनंतत्परेऽहिनरसेंद्रसेवनम् १०८
भाषाटीकासहित । ( २९ ) प्रथम विधिवत् विरेचन कराकर शुद्ध देह होनेपर विरेचनांतमें पेयादि विधि सेवन कर मनुष्य स्वस्थ होजाय। तदनंतर जब रस सेवन करना चाहे तो प्रथम प्रातःकाल उठकर ईश्वरका स्मरण करे और उस दिन उपवास करे फिर दूसरे दिन मुद्गयूषादि पथ्यका सेवन करे। फिर तीसरे दिन प्रातःकालसे पारेका सेवन करे ॥ १०८ ॥ रससेवनका फल । बुद्धिस्मृतिप्रभाकान्तिबलञ्चैव रसस्तथा । वर्द्धन्ते सर्व एवैते रससेवाविधौ नृणाम् ॥ १०९ ॥ विधिवत् पारेके सेवनसे बुद्धि, स्मृति, प्रभा, शरीरकी कांति, बल और शरीरमें शुद्ध रस इन सबकी वृद्धि होती है ॥ १०९ ॥ रससेवनमें पथ्य । हितं मुद्गाम्बु दुग्धाज्यं शाल्यन्नं च विशेषतः । शाकं पौनर्नवं वास्तु मेघनादंश्च यूथिकाम् ॥ लवणं मागधीं मुस्तं पद्ममूलानि भक्षयेत् ॥११०॥ रससेवन करनेवालेको मूंगका यूष, दूध, घृत, शाली चावल यह सब विशेषरूपसे पथ्य हैं । और पुनर्नवा, बाथू, चौलाई, जूहीका शाक यह शाक। लोनियाशाक, हरी पीपलका शाक, डीलेनागमोथेका शाक और भिसोंका शाक यह सब पथ्य हैं ॥ ११० ॥ अनुपानं तु दातव्यं ज्ञात्वा रोगादिकं भिषक्।१११। वैद्य रोगीके रोगको देखकर उसमें जो हितकारक हो उस अनुपा- नसे पारेका सेवन करावे ॥ १११ ॥ रससेवनमें कुपथ्य । कूष्माण्डं कर्कटीं चैव कलिंगं कारवेल्लकम् । कुसुम्भिका च कर्कोटी कलम्बी काकमाचिका । ककाराष्टकमेतद्धि वर्जयेद्रसभक्षकः ॥ ११२ ॥
( ३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कूष्माण्ड ( काशीफल, लालकद्दू ) ककड़ी, कलिंग ( तरबूज ), करेला, कसुम्भेका शाक, ककोड़ा, कलंबी शाक, काकमाची (मकोह ) का शाक, यह आठ ककारवाले द्रव्य रससेवन करनेवालेको वर्ज देने चाहिये ॥ ११२ ॥ इति रसशोधनविधिः ॥ अथ उपरस । गन्धकं वज्रवैक्रान्तं वज्राभ्रं तालकं शिला । खर्परं शिखितुण्डञ्च विमलं हेममाक्षिकम् ॥११३॥ काशीशं कान्तपाषाणं वराटाञ्जनहिङ्गुलम् । गैरिकं शङ्खभूनागं टङ्कणञ्च शिलाजतु । एते चोपरसाः प्रोक्ताः शोध्या मार्या विधानतः॥११४ गंधक, हीरा, वैक्रांतमणि, वज्राभ्रक, हरिताल, मनसिल, खपरिया, नीलाथोथा, रूपामक्खी, सोना मक्खी, हीरा कसीस, कांतपाषाण ( चुंबक पत्थर ), वराट ( कौड़ियां ), सुरमा, सिंगरफ, गेरू, शंख, भूनाग ( केंचुआ ), सुहागा और शिलाजीत यह सब उपरस कहे हैं इनको विधिपूर्वक शोधन और मारण करना चाहिये ॥ ११३ ॥ ११४ ॥ अथ गंधकप्रकरण । श्वेतद्वीपे पुरा देव्याः क्रीडन्त्याः प्रसृतं रजः । क्षीरार्णवे तु स्नाताया दुकूलं रजसान्वितम् ॥११५॥ धौतं तत्सलिले तस्मिन्गन्धको गन्धवत्स्मृतः ॥ चतुर्धा गन्धकः प्रोक्तो रक्तः पीतोऽसितःसितः॥११६॥ रक्तो हेमक्रियासूक्तः पीतश्चैव रसायने । व्रणादिलेपने श्वेतः श्रेष्ठः कृष्णः सुदुर्लभः॥११७॥
भाषाटीकासहित । ( ३१ ) अब पहिले गंधककी उत्पत्ति और शोधनको कहते हैं-एक समय श्वेतद्वीपमें खेलती हुई पार्वतीका मासिक रज प्रवृत्त हुआ तदनन्तर उस रजयुक्त वस्त्र सहित पार्वती ने क्षीरसमुद्रमें स्नान किया उस समय वस्त्रके धोनेसे जो रज जलमें गिरा उसका गंधयुक्त जो पदार्थ बना उसको गंधक कहागया ( यहांपर ज्वालामुखी पर्वतसे निकली हुई गंधकयुक्त ज्वाला द्वारा निकला हुवा द्राव प्रतीत होता है ) । वह गंधक चार प्रकारका होता है । जैसे--लाल, पीला, काला, सफेद, इनमें लाल वर्णका गंधक सोना बनानेमें काम आता है, पीला गंधक रसायन कर्ममें लिया जाता है । सफेद गंधक व्रणादिकोंपर लेप करनेमें हित- कारक है । कृष्ण वर्णका गंधक सबमें श्रेष्ठ होता है इसका मिलना अति दुर्लभ है ॥ ११६--११७ ॥ अशुद्ध गंधकके दोष । अशुद्धगन्धः कुरुते तु तापं कुष्ठं भ्रमं पित्तरुज करोति । रूपं बलं वीर्यसुखं निहन्ति तस्मात् सुशुद्धो विनियोजनीयः ॥ ११८ ॥ अशुद्ध गंधकके सेवन करनेसे ताप, कुष्ठ, भ्रम और पित्तके रोग उत्पन्न होते हैं एवं रूप, बल, वीर्य और सुखका नाश होता है इस- लिये गंधकको शुद्ध करकेही प्रयोग करना चाहिये ॥ ११८ ॥ गंधकके पर्यायवाची शब्द । गन्धको गन्धपाषाणः शुकपुच्छः सुगन्धकः । सौगन्धिकः शुल्बारिपुः पामारिर्नवनीतकः ॥११९॥ गंधक, गंधपाषाण, शुकपुच्छ, सुगंधक, सौगंधक, शुल्बारिपु, पामारि और नवनीतक यह गंधकके नाम हैं ॥ ११९ ॥ गंधकशोधन विधि । साज्यं भाण्डे पयः क्षिप्त्वा मुखं वस्त्रेण बन्धयेत् । तत्पृष्ठे गन्धकं क्षिप्त्वा शरावेण पिधापयेत् ॥१२०॥ भाण्डं निःक्षिप्य भूम्यां तदूर्द्धं देयं पुटं लघु । ततः क्षीरे द्रुतं गन्धं शुद्धं योगेषु योजयेत् ॥१२१॥
( ३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एक पात्रमें घृत और दूध डालकर उसके मुखपर साफ कपडा बांध देवे उस कपडेपर गंधक डालकर गंधकके ऊपर औंधा करके एक शराव ढक देवे और मिट्टीसे संधी लेप कर देवे । फिर इस पात्रको मुखपर्यन्त जमीनमें गाड देवे केवल शराव मात्र ऊपर दीखता रहना चाहिये इस शरावके ऊपर एरने उपलोंकी लघु पुट देवे तो सब गंधक पिघलकर दूधमें चली जायगी यह शुद्ध गंधक सब कार्योंमें प्रयुक्त करे ॥ १२० ॥ १२१ ॥ लोहपात्रे विनिःक्षिप्य घृतमग्नौ प्रतापयेत् । तप्ते घृते तत्समानं क्षिपेद्गन्धकजं रजः ॥१२२॥ विद्रुतं गन्धकं दृष्ट्वा दुग्धमध्ये विनिःक्षिपेत् । एवं गन्धकशुद्धिः स्यात्सर्वरोगेषु योजयेत् ॥१२३॥ एक लोहेके पात्रमें घी डालकर अग्निपर गरम करे फिर उस पात्रमें गंधकका चूर्ण डाल दे जब घीमें गंधक पिघल जावे तो उसको घी सहित उठाकर दूधमें डाल देवे ( दूधके पात्रके मुखपर बारीक वस्त्र रखना चाहिये जिसमें छनकर निर्दोष गंधक दूधमें गिरे ) जब शीतल होजाय तो गंधकको दूधसे निकालकर कपडेसे पोंछ लेवे । यह शुद्ध गंधक सब कार्योंमें प्रयुक्त करे । यदि ऐसे दो तीन वार करे तो अधिक गुण आजाता है ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ शुद्ध गंधकके गुण । शुद्धगन्धो हरेद्रोगान्कुष्ठमृत्युजरादिकान् । अग्निकारी महानुष्णो वीर्यवृद्धिं करोति च ॥१२४॥ शुद्ध किया हुआ गंधक रसायन है तथा कुष्ठ, मृत्यु और जरा- दिक दोषोंके हरनेवाला है एवं अग्निको दीपन करनेवाला अतिगरम और वीर्यकी वृद्धि करनेवाला है ॥ १२४ ॥ गन्धश्चातिरसायनः सुमधुरः पाके कटूष्णान्वितः, कण्डूकुष्ठविसर्पदर्पदलनो दीप्तानलः पाचनः ।
भाषाटीकासहित । ( ३३ ) आमोन्मन्थनशोधनो विषहरः सूतेन्द्रवीर्यप्रदः, गौरीपुष्पभवस्तथाकृमिहरःस्वर्णाधिकं वीर्यकृत् १२५॥ गंधक-अत्यंत रसायन, मधुर, पाकमें कडुआ और गरम है तथा खाज, कुष्ठ, विसर्प और मदको नष्ट करता है । एवं अग्निको दीप्त करनेवाला, पाचन, आमदोषनाशक, मलशोधक, विषनाशक, पारेको बलके देनेवाला, पार्वतीके पुष्पसे उत्पन्न हुआ व कृमियोंको हरने- वाला और सुवर्णके वीर्यको बढानेवाला या सुवर्णसे भी अधिक वीर्य देनेवाला होता है । यह शुद्ध गंधकके गुण हैं ॥ १२५ ॥ वज्र ( हीरा ) शोधनप्रकरणम् । अशुद्ध हीरेके दोष । पार्श्वपीडां पाण्डुरोगं हृल्लासं दाहसन्ततिम् । रोगानीकं गुरुत्वञ्च धत्ते वज्रमशोधितम् ॥१२६ ॥ अशुद्ध हीरा-पार्श्वपीडा, पांडुरोग, हृल्लास, अत्यंतदाह, शरीरमें अनेक रोगों और भारीपन को उत्पन्न करता है ॥ १२६ ॥ वज्रशोधन । व्याघ्रीकन्दगतं वज्रं डोलायन्त्रे विपाचितम् । सप्ताहं कोद्रवक्वाथे कौलत्थे विमलं भवेत् ॥१२७॥ व्याघ्रीकंदमें हीरेको रखकर कपड़ेमें बांध डोलायंत्रद्वारा कोदोके और कुलथीके क्वाथमें सात दिन पकावे तो हीरा शुद्ध हो जाता है॥१२७ व्याघ्रीकन्दगतं वज्रं डोलायन्त्रे विपाचितम् । अहोरात्रात्समुद्धृत्य हयमूत्रेण सेचयेत् । वज्रीक्षीरेण वा सिञ्चेत्कुलिशं विमलं भवेत्॥१२८॥ अथवा-व्याघ्रीकन्द ( कटेलीकी जड़के पिंड ) में हीरेको रखकर एक दिन रात डोलायंत्र द्वारा कोद्रव या कुलथीके क्वाथमें पकाकर घोडेके मूत्रसे अथवा थोहरके दूधसे सेचन करे तो हीरा शुद्ध होजाता है॥ १२८॥
( ३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वज्रमारण । त्रिवर्षारूढकार्पासमूलमादाय पेषयेत् । त्रिवर्षनागवल्ल्यास्तु निजद्रावैः प्रपेषयेत् ॥१२९॥ तद्गोलके क्षिपेद्वज्रं रुद्धा गजपुटे पचेत् । एवं सप्तपुटेनैव म्रियते कुलिशं ध्रुवम् ॥ १३० ॥ तीन वर्षसे एक स्थानमें उत्पन्न हुई कपासकी जड़को लेकर तीन वर्षसे उत्पन्न हुई नागरवेलके रसमें खरल कर गोला बनावे उसमें हीरेको रखकर संपुट करे इस संपुटको गजपुटमें फूंक दे ऐसे ७ पुट देनेसे हीरेकी भस्म होजाती है ॥ १२९ ॥ १३० ॥ कांस्यपात्रे तु भेकस्य मूत्रे वज्रं तु निक्षिपेत् । त्रिःसप्तकृत्वः सन्तप्तं वज्रमेवं मृतं भवेत् ॥१३१॥ अन्य प्रकार—कांसीके पात्रमें मेढकका मूत्र डालकर उसमें हीरा तपा तपाकर २१ वार बुझावे तो हीरेकी भस्म होजाती है ॥ १३१ ॥ त्रिःसप्तकृत्वः सन्तप्तं खरमूत्रेण सेचयेत् । मुद्गरैस्तालकं पिष्ट्वा तद्गोले कुलिशं क्षिपेत् ॥१३२॥ प्रध्मातं वाजिमूत्रेण सिक्तं पूर्वक्रमेण तु । भस्मीभवति तद्वज्रं वज्रवत्कुरुते तनुम् ॥१३३॥ आयुष्यं सौख्यजननं बलरूपप्रदं तथा । रोगघ्नं मृत्युहरणं वज्रभस्म भवत्यलम् ॥ १३४ ॥ अन्य प्रकार—हीरेको २१वार अग्निमें तपा तपा कर गधेके मूत्रसे सेचन करे । फिर हरितालको पीसकर इस हरितालके गोलेमें हीरेका संपुट कर कोयलोंकी अग्निमें धौंकनीसे धमाकर लाल बनादे फिर इसे घोडेके मूत्रसे सेचन करे ऐसे २१ वार धमा २ कर घोड़ेके मूत्रसे सींचे ( बुझावे ) तो हीरेकी भस्म हो जाती है । इस हीरेकी भस्मके सेवनसे
भाषाटीकासहित । ( ३५ ) मनुष्यका शरीर वज्रके समान दृढ और नीरोग हो जाता है । हीरेकी भस्म-आयुवर्द्धक, सुखकारक, बलदायक, सुंदरताकारक, रोगनाशक और मृत्युकोभी हरनेवाली है अधिकतो क्या कहना है ॥ १३२-१३४॥ इति हीराभस्मगुण समाप्त । अथ वैक्रांतप्रकरण । वैक्रान्तं वज्रवच्छोध्यं ध्मातं तं द्वयमूत्रके । हिमं तद्भस्म संयोज्यं वज्रस्थाने विचक्षणैः ॥१३५॥ वैक्रांत मणिको भी हीरेके समानही शोधन करना चाहिये और उसी प्रकार २१ वार तपा तपा कर घोड़ेके मूत्रमें बुझानेसे वैक्रांत मणिकी भस्म होजाती है । बुद्धिमानोंको चाहिये जहां हीरेकी भस्म न मिल सके वहाँ वैक्रांतकी भस्मका प्रयोग करे ॥ १३५ ॥ वैक्रान्तं वज्रवच्छोध्यं मारणञ्चैवं तस्य तत् । हयमूत्रेण तत्सेच्यं तप्तं तप्तं त्रिसप्तधा ॥ १३६ ॥ ततश्वोत्तरवारुण्याः पञ्चांगे गोलकं क्षिपेत् । रुद्धा मूषापुटे पाच्यमुद्धृत्य गोलकं पुनः ॥१३७॥ क्षिप्त्वा रुद्धा पचेदेवं यावत्तद्भस्मतां व्रजेत् । भस्मीभूतञ्च वैक्रान्तं वज्रस्थाने नियोजयेत् ॥१३८॥ अन्य प्रकार-वैक्रांतका शोधन मारण सब हीरेके समान ही जानना । अथवा वैक्रांतको २१ वार गरम करके घोड़ेके मूत्रमें बुझावे फिर इंद्रायणके पञ्चाङ्गको पीसकर गोला बनावे इस गोलेमें वैक्रांतको रख संपुटकर मूषा पुटमें पकावे फिर निकालकर उसी प्रकार इन्द्रायणके गोलेमें संपुट कर मूषा पुटमें पकावे जबतक भस्म न हो तबतक इसी प्रकार मूषापुटमें (कोयलोंकी अग्निमें रख) पकाता रहे । भस्म होनेपर इस वैक्रांतभस्मका हीरेकी भस्मके अभावमें प्रयोग करे ॥१३६-१३८॥ इति वैक्रांत मारण ।
( ३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ अभ्रकप्रकरण । अभ्रकं गिरिजाबीजममलं गगनाह्वयम् । तत्र कृष्णाभ्रके वज्रं पीतात्मनि तु ग्राहिकम् ॥ सितात्मके तारकं स्याद्भीरुकं रक्तके वरम् ॥१३९ ॥ अभ्रक, गिरिजाबीज, अमल, गगन, गगनाह्वय ( भोड्ल ) यह सब अभ्रकके नाम हैं ( और भी आकाशके वाचक शब्द अभ्रकके पर्याय जानने ) । वह अभ्रक-काला, पीला, सफेद और लाल इन भेदोंसे चार प्रकारका होता है । इनमें काले वर्णके अभ्रकोंमें वज्राभ्रक श्रेष्ठ होता है । पीले अभ्रकोंमें ग्राहिक, सफेदमें तारक और लाल वर्णके अभ्रकोंमें भीरुक नामक अभ्रक श्रेष्ठ होता है ॥ १३९ ॥ वज्राभ्रकके लक्षण । सुप्रशस्तं कठोराङ्गं गुरु कज्जलसन्निभम् ॥ १४० ॥ यन्न शब्दायते वह्नौ नैवोच्छूनं भवेदपि । सदाकरसमुद्भूतं वज्रेति प्रथितं घनम् ॥ १४१ ॥ जो अभ्रक-स्वच्छ, कठोरांग, भारी, कज्जलके समान वर्णवाला हो और अग्निमें डालकर धमानेसे शब्द न करै, फूत्कार न करे, सुन्दर आकारवाला ( कोई ऐसा कहते हैं कि सदाकरका अर्थ अच्छे स्थानसे पैदा होनेवाला ) हो वैसा ही रहे फूले नहीं विकृतं न हो उसको वज्राभ्रक कहते हैं ॥ १४० ॥ १४१ ॥ पिनाकं दर्दुरं नागं वज्रञ्चेति चतुर्विधम् । ध्मातमभ्रं दलचयं पिनाकं विसृजत्यलम् ॥१४२॥ फूत्कारं भुजगः कुर्याद्दर्दुरं भेकशब्दवत् । चतुर्थञ्च वरं ज्ञेयं न वह्नौ विकृतिं व्रजेत् ॥ १४३ ॥ काला अभ्रक-पिनाक, दर्दुर, नाग और वज्र इन भेदोंसे चार प्रकारका होता है । इनमें अग्निमें रखकर ध्मायमान करनेसे जिसके
, comma after रोगनाशक, no space before बुढापेको. * : "हरनेवाला और मृत्युको भी जीतनेवाला है इसलिये संपूर्ण औषधिकर्ममें" -> correct. * : "वज्राभ्रक ही लेना चाहिये ॥ १४५ ॥" -> correct. * : "अशुद्ध अभ्रकके दोष ।" -> correct. * : "अशुद्धाभ्रं निहन्त्यायुर्वर्द्धयेन्मारुतं कफम् ।" -> correct. * : "आहत्याच्छादयेद्गात्रं मंदाग्निकिमिवर्धनम् ॥१४६॥" -> look at "आहत्याच्छादयेद्गात्रं": आ ह त्या च्छा द ये द् गा त्रं. Yes. Look at "मंदाग्निकिमिवर्धनम्": म ं द ा ग ् न ि क ि म ि व र् ध न म्. Yes! And ॥१४६॥. * : "विना शोधन किया अभ्रक आयुको नष्ट करता है और वायुको" -> note in the original "करता है और वायुको" - wait, look at "करता है": is there space? Yes. * : "बढाता है, कफको मूर्छन कर शरीरको जकड देता है । एवं मंदाग्नि-" ->
( ३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । । अभ्रकके शोधनकी विधि । पादांशं शालिसंयुक्तमभ्रकं कम्बलोदरे । त्रिरात्रं स्थापयेन्नीरे तत्क्लिन्नं मर्दयेद्दृढम् ॥ १४७ ॥ कम्बलाद्गलितं श्लक्ष्णं वालुकारहितं च यत् । तद्धान्याभ्रमिति प्रोक्तमभ्रमारणसिद्धये ॥१४८॥ स्वच्छ वज्राभ्रक १ पाव, शालिधान्य १ सेर इन दोनोंको कंबलके टुकडेमें बांधकर जल ( कांजी ) में भिगो देवे तीसरे दिन निकालकर किसी बडी परातमें उस कंबलकी पोटलीको मसले जिससे सब अभ्रक बारीक होकर कंबलसे बाहर छनकर निकल आवे, उस स्वच्छ बारीक अभ्रकको ले लेवे इसमेंसे कोई कंकडी आदि अन्य वस्तु पहिलेही निकाल देना चाहिये । इसे धान्याभ्रक कहते हैं यही मारण आदि सब कर्मोंमें लेना चाहिये ॥ १४७ ॥ १४८ ॥ त्रिफलाक्वाथगोमूत्रक्षीरकासिकसेचितम् । भस्त्राग्नौ सप्तधा व्योम तप्तं तप्तं विशुद्ध्यति॥१४९॥ अन्य प्रकार-वज्राभ्रकको कोयलोंकी तीक्ष्णाग्निमें धोंकनीसे धमाकर लाल होनेपर त्रिफलेके क्वाथसे बुझावे ऐसे ही सात २ वार गरम करके त्रिफलेके क्वाथ, गोमूत्र, दूध और कांजीसे बुझावे तो अभ्रक शुद्ध होजाता है ॥ १४९ ॥ अथवा बदरीक्वाथे ध्मातमभ्रं विनिःक्षिपेत् । मर्दितं पाणिना शुष्कं धान्याभ्रादतिरिच्यते १५०॥ तीसरा प्रकार-अथवा अभ्रकको तीक्ष्णाग्निमें तपा २ कर बेरीके क्वाथमें बुझावे फिर सुखाकर हाथोंसे मलकर बारीक करले यह अभ्रक शुद्ध होता है और धान्याभ्रकसे भी अच्छा होता है ॥ १५० ॥