रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 57, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३१ ) अब पहिले गंधककी उत्पत्ति और शोधनको कहते हैं-एक समय श्वेतद्वीपमें खेलती हुई पार्वतीका मासिक रज प्रवृत्त हुआ तदनन्तर उस रजयुक्त वस्त्र सहित पार्वती ने क्षीरसमुद्रमें स्नान किया उस समय वस्त्रके धोनेसे जो रज जलमें गिरा उसका गंधयुक्त जो पदार्थ बना उसको गंधक कहागया ( यहांपर ज्वालामुखी पर्वतसे निकली हुई गंधकयुक्त ज्वाला द्वारा निकला हुवा द्राव प्रतीत होता है ) । वह गंधक चार प्रकारका होता है । जैसे--लाल, पीला, काला, सफेद, इनमें लाल वर्णका गंधक सोना बनानेमें काम आता है, पीला गंधक रसायन कर्ममें लिया जाता है । सफेद गंधक व्रणादिकोंपर लेप करनेमें हित- कारक है । कृष्ण वर्णका गंधक सबमें श्रेष्ठ होता है इसका मिलना अति दुर्लभ है ॥ ११६--११७ ॥ अशुद्ध गंधकके दोष । अशुद्धगन्धः कुरुते तु तापं कुष्ठं भ्रमं पित्तरुज करोति । रूपं बलं वीर्यसुखं निहन्ति तस्मात् सुशुद्धो विनियोजनीयः ॥ ११८ ॥ अशुद्ध गंधकके सेवन करनेसे ताप, कुष्ठ, भ्रम और पित्तके रोग उत्पन्न होते हैं एवं रूप, बल, वीर्य और सुखका नाश होता है इस- लिये गंधकको शुद्ध करकेही प्रयोग करना चाहिये ॥ ११८ ॥ गंधकके पर्यायवाची शब्द । गन्धको गन्धपाषाणः शुकपुच्छः सुगन्धकः । सौगन्धिकः शुल्बारिपुः पामारिर्नवनीतकः ॥११९॥ गंधक, गंधपाषाण, शुकपुच्छ, सुगंधक, सौगंधक, शुल्बारिपु, पामारि और नवनीतक यह गंधकके नाम हैं ॥ ११९ ॥ गंधकशोधन विधि । साज्यं भाण्डे पयः क्षिप्त्वा मुखं वस्त्रेण बन्धयेत् । तत्पृष्ठे गन्धकं क्षिप्त्वा शरावेण पिधापयेत् ॥१२०॥ भाण्डं निःक्षिप्य भूम्यां तदूर्द्धं देयं पुटं लघु । ततः क्षीरे द्रुतं गन्धं शुद्धं योगेषु योजयेत् ॥१२१॥