भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एक पात्रमें घृत और दूध डालकर उसके मुखपर साफ कपडा बांध देवे उस कपडेपर गंधक डालकर गंधकके ऊपर औंधा करके एक शराव ढक देवे और मिट्टीसे संधी लेप कर देवे । फिर इस पात्रको मुखपर्यन्त जमीनमें गाड देवे केवल शराव मात्र ऊपर दीखता रहना चाहिये इस शरावके ऊपर एरने उपलोंकी लघु पुट देवे तो सब गंधक पिघलकर दूधमें चली जायगी यह शुद्ध गंधक सब कार्योंमें प्रयुक्त करे ॥ १२० ॥ १२१ ॥ लोहपात्रे विनिःक्षिप्य घृतमग्नौ प्रतापयेत् । तप्ते घृते तत्समानं क्षिपेद्गन्धकजं रजः ॥१२२॥ विद्रुतं गन्धकं दृष्ट्वा दुग्धमध्ये विनिःक्षिपेत् । एवं गन्धकशुद्धिः स्यात्सर्वरोगेषु योजयेत् ॥१२३॥ एक लोहेके पात्रमें घी डालकर अग्निपर गरम करे फिर उस पात्रमें गंधकका चूर्ण डाल दे जब घीमें गंधक पिघल जावे तो उसको घी सहित उठाकर दूधमें डाल देवे ( दूधके पात्रके मुखपर बारीक वस्त्र रखना चाहिये जिसमें छनकर निर्दोष गंधक दूधमें गिरे ) जब शीतल होजाय तो गंधकको दूधसे निकालकर कपडेसे पोंछ लेवे । यह शुद्ध गंधक सब कार्योंमें प्रयुक्त करे । यदि ऐसे दो तीन वार करे तो अधिक गुण आजाता है ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ शुद्ध गंधकके गुण । शुद्धगन्धो हरेद्रोगान्कुष्ठमृत्युजरादिकान् । अग्निकारी महानुष्णो वीर्यवृद्धिं करोति च ॥१२४॥ शुद्ध किया हुआ गंधक रसायन है तथा कुष्ठ, मृत्यु और जरा- दिक दोषोंके हरनेवाला है एवं अग्निको दीपन करनेवाला अतिगरम और वीर्यकी वृद्धि करनेवाला है ॥ १२४ ॥ गन्धश्चातिरसायनः सुमधुरः पाके कटूष्णान्वितः, कण्डूकुष्ठविसर्पदर्पदलनो दीप्तानलः पाचनः ।