रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ३३ ) आमोन्मन्थनशोधनो विषहरः सूतेन्द्रवीर्यप्रदः, गौरीपुष्पभवस्तथाकृमिहरःस्वर्णाधिकं वीर्यकृत् १२५॥ गंधक-अत्यंत रसायन, मधुर, पाकमें कडुआ और गरम है तथा खाज, कुष्ठ, विसर्प और मदको नष्ट करता है । एवं अग्निको दीप्त करनेवाला, पाचन, आमदोषनाशक, मलशोधक, विषनाशक, पारेको बलके देनेवाला, पार्वतीके पुष्पसे उत्पन्न हुआ व कृमियोंको हरने- वाला और सुवर्णके वीर्यको बढानेवाला या सुवर्णसे भी अधिक वीर्य देनेवाला होता है । यह शुद्ध गंधकके गुण हैं ॥ १२५ ॥ वज्र ( हीरा ) शोधनप्रकरणम् । अशुद्ध हीरेके दोष । पार्श्वपीडां पाण्डुरोगं हृल्लासं दाहसन्ततिम् । रोगानीकं गुरुत्वञ्च धत्ते वज्रमशोधितम् ॥१२६ ॥ अशुद्ध हीरा-पार्श्वपीडा, पांडुरोग, हृल्लास, अत्यंतदाह, शरीरमें अनेक रोगों और भारीपन को उत्पन्न करता है ॥ १२६ ॥ वज्रशोधन । व्याघ्रीकन्दगतं वज्रं डोलायन्त्रे विपाचितम् । सप्ताहं कोद्रवक्वाथे कौलत्थे विमलं भवेत् ॥१२७॥ व्याघ्रीकंदमें हीरेको रखकर कपड़ेमें बांध डोलायंत्रद्वारा कोदोके और कुलथीके क्वाथमें सात दिन पकावे तो हीरा शुद्ध हो जाता है॥१२७ व्याघ्रीकन्दगतं वज्रं डोलायन्त्रे विपाचितम् । अहोरात्रात्समुद्धृत्य हयमूत्रेण सेचयेत् । वज्रीक्षीरेण वा सिञ्चेत्कुलिशं विमलं भवेत्॥१२८॥ अथवा-व्याघ्रीकन्द ( कटेलीकी जड़के पिंड ) में हीरेको रखकर एक दिन रात डोलायंत्र द्वारा कोद्रव या कुलथीके क्वाथमें पकाकर घोडेके मूत्रसे अथवा थोहरके दूधसे सेचन करे तो हीरा शुद्ध होजाता है॥ १२८॥