भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कूष्माण्ड ( काशीफल, लालकद्दू ) ककड़ी, कलिंग ( तरबूज ), करेला, कसुम्भेका शाक, ककोड़ा, कलंबी शाक, काकमाची (मकोह ) का शाक, यह आठ ककारवाले द्रव्य रससेवन करनेवालेको वर्ज देने चाहिये ॥ ११२ ॥ इति रसशोधनविधिः ॥ अथ उपरस । गन्धकं वज्रवैक्रान्तं वज्राभ्रं तालकं शिला । खर्परं शिखितुण्डञ्च विमलं हेममाक्षिकम् ॥११३॥ काशीशं कान्तपाषाणं वराटाञ्जनहिङ्गुलम् । गैरिकं शङ्खभूनागं टङ्कणञ्च शिलाजतु । एते चोपरसाः प्रोक्ताः शोध्या मार्या विधानतः॥११४ गंधक, हीरा, वैक्रांतमणि, वज्राभ्रक, हरिताल, मनसिल, खपरिया, नीलाथोथा, रूपामक्खी, सोना मक्खी, हीरा कसीस, कांतपाषाण ( चुंबक पत्थर ), वराट ( कौड़ियां ), सुरमा, सिंगरफ, गेरू, शंख, भूनाग ( केंचुआ ), सुहागा और शिलाजीत यह सब उपरस कहे हैं इनको विधिपूर्वक शोधन और मारण करना चाहिये ॥ ११३ ॥ ११४ ॥ अथ गंधकप्रकरण । श्वेतद्वीपे पुरा देव्याः क्रीडन्त्याः प्रसृतं रजः । क्षीरार्णवे तु स्नाताया दुकूलं रजसान्वितम् ॥११५॥ धौतं तत्सलिले तस्मिन्गन्धको गन्धवत्स्मृतः ॥ चतुर्धा गन्धकः प्रोक्तो रक्तः पीतोऽसितःसितः॥११६॥ रक्तो हेमक्रियासूक्तः पीतश्चैव रसायने । व्रणादिलेपने श्वेतः श्रेष्ठः कृष्णः सुदुर्लभः॥११७॥