रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( २९ ) प्रथम विधिवत् विरेचन कराकर शुद्ध देह होनेपर विरेचनांतमें पेयादि विधि सेवन कर मनुष्य स्वस्थ होजाय। तदनंतर जब रस सेवन करना चाहे तो प्रथम प्रातःकाल उठकर ईश्वरका स्मरण करे और उस दिन उपवास करे फिर दूसरे दिन मुद्गयूषादि पथ्यका सेवन करे। फिर तीसरे दिन प्रातःकालसे पारेका सेवन करे ॥ १०८ ॥ रससेवनका फल । बुद्धिस्मृतिप्रभाकान्तिबलञ्चैव रसस्तथा । वर्द्धन्ते सर्व एवैते रससेवाविधौ नृणाम् ॥ १०९ ॥ विधिवत् पारेके सेवनसे बुद्धि, स्मृति, प्रभा, शरीरकी कांति, बल और शरीरमें शुद्ध रस इन सबकी वृद्धि होती है ॥ १०९ ॥ रससेवनमें पथ्य । हितं मुद्गाम्बु दुग्धाज्यं शाल्यन्नं च विशेषतः । शाकं पौनर्नवं वास्तु मेघनादंश्च यूथिकाम् ॥ लवणं मागधीं मुस्तं पद्ममूलानि भक्षयेत् ॥११०॥ रससेवन करनेवालेको मूंगका यूष, दूध, घृत, शाली चावल यह सब विशेषरूपसे पथ्य हैं । और पुनर्नवा, बाथू, चौलाई, जूहीका शाक यह शाक। लोनियाशाक, हरी पीपलका शाक, डीलेनागमोथेका शाक और भिसोंका शाक यह सब पथ्य हैं ॥ ११० ॥ अनुपानं तु दातव्यं ज्ञात्वा रोगादिकं भिषक्।१११। वैद्य रोगीके रोगको देखकर उसमें जो हितकारक हो उस अनुपा- नसे पारेका सेवन करावे ॥ १११ ॥ रससेवनमें कुपथ्य । कूष्माण्डं कर्कटीं चैव कलिंगं कारवेल्लकम् । कुसुम्भिका च कर्कोटी कलम्बी काकमाचिका । ककाराष्टकमेतद्धि वर्जयेद्रसभक्षकः ॥ ११२ ॥