रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 54, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( २८ ) रसेंद्रसारसंग्रह । लवणवर्ग। लवणानि च कथ्यन्ते सामुद्रं सैन्धवं विडम् । सौवर्चलं रोमकञ्च चुल्लिका लवणं तथा ॥१०४॥ समुद्रनमक, सैंधवनमक, विडनमक, सौवर्चलनमक, रोमकनमक, चुल्लिकनमक यह लवणवर्ग कहा है ॥ १०४ ॥ मूत्रवर्ग । मूत्राणि हस्तिकरभमहिषीखरवाजिनाम् । गोजावीनां स्त्रियां पुंसां मूत्रवर्ग उदाहृतः ॥ १०५ ॥ हस्तिमूत्र, उष्ट्रमूत्र,महिषीमूत्र,गर्दभमूत्र, अश्वमूत्र, गोमूत्र,बकरीका मूत्र, भेड़्का मूत्र, स्त्रीमूत्र, पुरुषमूत्र यह मूत्रवर्ग कहा है ॥ १०५ ॥ द्रावकवर्ग । गुञ्जाटङ्कणमध्वाज्यगुडा द्रावकपञ्चकाः । सफेद गुंजा (घुंघुची), सुहागा, शहत, घृत, गुड़ ये पांच द्रव्य द्रावक हैं । इनको पञ्चद्रावक कहते हैं । पित्तवर्ग । पित्तं पञ्चविधं मत्स्यगवाश्वरुरुबार्हिजम् ॥ १०६ ॥ पित्तभी पांच प्रकारका होता है-मछलीका, गौका, घोड़ेका, हिरनका और मोरका इनको पित्तपंचक कहते हैं ॥ १०६ ॥ क्षारवर्ग । स्वर्जिका टङ्कणं चैव यवक्षार उदाहृतः ॥ १०७ ॥ सज्जीखार, सुहागाखार, यवक्षार इनको क्षारवर्ग कहते हैं ॥१०७॥ रससेवनविधि । प्रातरेव पुरतो विरेचनं तद्दिनोपवसनं विधाय च । तत्परेऽहनिचपथ्यसेवनंतत्परेऽहिनरसेंद्रसेवनम् १०८