रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
( २८ ) रसेंद्रसारसंग्रह । लवणवर्ग। लवणानि च कथ्यन्ते सामुद्रं सैन्धवं विडम् । सौवर्चलं रोमकञ्च चुल्लिका लवणं तथा ॥१०४॥ समुद्रनमक, सैंधवनमक, विडनमक, सौवर्चलनमक, रोमकनमक, चुल्लिकनमक यह लवणवर्ग कहा है ॥ १०४ ॥ मूत्रवर्ग । मूत्राणि हस्तिकरभमहिषीखरवाजिनाम् । गोजावीनां स्त्रियां पुंसां मूत्रवर्ग उदाहृतः ॥ १०५ ॥ हस्तिमूत्र, उष्ट्रमूत्र,महिषीमूत्र,गर्दभमूत्र, अश्वमूत्र, गोमूत्र,बकरीका मूत्र, भेड़्का मूत्र, स्त्रीमूत्र, पुरुषमूत्र यह मूत्रवर्ग कहा है ॥ १०५ ॥ द्रावकवर्ग । गुञ्जाटङ्कणमध्वाज्यगुडा द्रावकपञ्चकाः । सफेद गुंजा (घुंघुची), सुहागा, शहत, घृत, गुड़ ये पांच द्रव्य द्रावक हैं । इनको पञ्चद्रावक कहते हैं । पित्तवर्ग । पित्तं पञ्चविधं मत्स्यगवाश्वरुरुबार्हिजम् ॥ १०६ ॥ पित्तभी पांच प्रकारका होता है-मछलीका, गौका, घोड़ेका, हिरनका और मोरका इनको पित्तपंचक कहते हैं ॥ १०६ ॥ क्षारवर्ग । स्वर्जिका टङ्कणं चैव यवक्षार उदाहृतः ॥ १०७ ॥ सज्जीखार, सुहागाखार, यवक्षार इनको क्षारवर्ग कहते हैं ॥१०७॥ रससेवनविधि । प्रातरेव पुरतो विरेचनं तद्दिनोपवसनं विधाय च । तत्परेऽहनिचपथ्यसेवनंतत्परेऽहिनरसेंद्रसेवनम् १०८
भाषाटीकासहित । ( २९ ) प्रथम विधिवत् विरेचन कराकर शुद्ध देह होनेपर विरेचनांतमें पेयादि विधि सेवन कर मनुष्य स्वस्थ होजाय। तदनंतर जब रस सेवन करना चाहे तो प्रथम प्रातःकाल उठकर ईश्वरका स्मरण करे और उस दिन उपवास करे फिर दूसरे दिन मुद्गयूषादि पथ्यका सेवन करे। फिर तीसरे दिन प्रातःकालसे पारेका सेवन करे ॥ १०८ ॥ रससेवनका फल । बुद्धिस्मृतिप्रभाकान्तिबलञ्चैव रसस्तथा । वर्द्धन्ते सर्व एवैते रससेवाविधौ नृणाम् ॥ १०९ ॥ विधिवत् पारेके सेवनसे बुद्धि, स्मृति, प्रभा, शरीरकी कांति, बल और शरीरमें शुद्ध रस इन सबकी वृद्धि होती है ॥ १०९ ॥ रससेवनमें पथ्य । हितं मुद्गाम्बु दुग्धाज्यं शाल्यन्नं च विशेषतः । शाकं पौनर्नवं वास्तु मेघनादंश्च यूथिकाम् ॥ लवणं मागधीं मुस्तं पद्ममूलानि भक्षयेत् ॥११०॥ रससेवन करनेवालेको मूंगका यूष, दूध, घृत, शाली चावल यह सब विशेषरूपसे पथ्य हैं । और पुनर्नवा, बाथू, चौलाई, जूहीका शाक यह शाक। लोनियाशाक, हरी पीपलका शाक, डीलेनागमोथेका शाक और भिसोंका शाक यह सब पथ्य हैं ॥ ११० ॥ अनुपानं तु दातव्यं ज्ञात्वा रोगादिकं भिषक्।१११। वैद्य रोगीके रोगको देखकर उसमें जो हितकारक हो उस अनुपा- नसे पारेका सेवन करावे ॥ १११ ॥ रससेवनमें कुपथ्य । कूष्माण्डं कर्कटीं चैव कलिंगं कारवेल्लकम् । कुसुम्भिका च कर्कोटी कलम्बी काकमाचिका । ककाराष्टकमेतद्धि वर्जयेद्रसभक्षकः ॥ ११२ ॥
( ३० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कूष्माण्ड ( काशीफल, लालकद्दू ) ककड़ी, कलिंग ( तरबूज ), करेला, कसुम्भेका शाक, ककोड़ा, कलंबी शाक, काकमाची (मकोह ) का शाक, यह आठ ककारवाले द्रव्य रससेवन करनेवालेको वर्ज देने चाहिये ॥ ११२ ॥ इति रसशोधनविधिः ॥ अथ उपरस । गन्धकं वज्रवैक्रान्तं वज्राभ्रं तालकं शिला । खर्परं शिखितुण्डञ्च विमलं हेममाक्षिकम् ॥११३॥ काशीशं कान्तपाषाणं वराटाञ्जनहिङ्गुलम् । गैरिकं शङ्खभूनागं टङ्कणञ्च शिलाजतु । एते चोपरसाः प्रोक्ताः शोध्या मार्या विधानतः॥११४ गंधक, हीरा, वैक्रांतमणि, वज्राभ्रक, हरिताल, मनसिल, खपरिया, नीलाथोथा, रूपामक्खी, सोना मक्खी, हीरा कसीस, कांतपाषाण ( चुंबक पत्थर ), वराट ( कौड़ियां ), सुरमा, सिंगरफ, गेरू, शंख, भूनाग ( केंचुआ ), सुहागा और शिलाजीत यह सब उपरस कहे हैं इनको विधिपूर्वक शोधन और मारण करना चाहिये ॥ ११३ ॥ ११४ ॥ अथ गंधकप्रकरण । श्वेतद्वीपे पुरा देव्याः क्रीडन्त्याः प्रसृतं रजः । क्षीरार्णवे तु स्नाताया दुकूलं रजसान्वितम् ॥११५॥ धौतं तत्सलिले तस्मिन्गन्धको गन्धवत्स्मृतः ॥ चतुर्धा गन्धकः प्रोक्तो रक्तः पीतोऽसितःसितः॥११६॥ रक्तो हेमक्रियासूक्तः पीतश्चैव रसायने । व्रणादिलेपने श्वेतः श्रेष्ठः कृष्णः सुदुर्लभः॥११७॥
भाषाटीकासहित । ( ३१ ) अब पहिले गंधककी उत्पत्ति और शोधनको कहते हैं-एक समय श्वेतद्वीपमें खेलती हुई पार्वतीका मासिक रज प्रवृत्त हुआ तदनन्तर उस रजयुक्त वस्त्र सहित पार्वती ने क्षीरसमुद्रमें स्नान किया उस समय वस्त्रके धोनेसे जो रज जलमें गिरा उसका गंधयुक्त जो पदार्थ बना उसको गंधक कहागया ( यहांपर ज्वालामुखी पर्वतसे निकली हुई गंधकयुक्त ज्वाला द्वारा निकला हुवा द्राव प्रतीत होता है ) । वह गंधक चार प्रकारका होता है । जैसे--लाल, पीला, काला, सफेद, इनमें लाल वर्णका गंधक सोना बनानेमें काम आता है, पीला गंधक रसायन कर्ममें लिया जाता है । सफेद गंधक व्रणादिकोंपर लेप करनेमें हित- कारक है । कृष्ण वर्णका गंधक सबमें श्रेष्ठ होता है इसका मिलना अति दुर्लभ है ॥ ११६--११७ ॥ अशुद्ध गंधकके दोष । अशुद्धगन्धः कुरुते तु तापं कुष्ठं भ्रमं पित्तरुज करोति । रूपं बलं वीर्यसुखं निहन्ति तस्मात् सुशुद्धो विनियोजनीयः ॥ ११८ ॥ अशुद्ध गंधकके सेवन करनेसे ताप, कुष्ठ, भ्रम और पित्तके रोग उत्पन्न होते हैं एवं रूप, बल, वीर्य और सुखका नाश होता है इस- लिये गंधकको शुद्ध करकेही प्रयोग करना चाहिये ॥ ११८ ॥ गंधकके पर्यायवाची शब्द । गन्धको गन्धपाषाणः शुकपुच्छः सुगन्धकः । सौगन्धिकः शुल्बारिपुः पामारिर्नवनीतकः ॥११९॥ गंधक, गंधपाषाण, शुकपुच्छ, सुगंधक, सौगंधक, शुल्बारिपु, पामारि और नवनीतक यह गंधकके नाम हैं ॥ ११९ ॥ गंधकशोधन विधि । साज्यं भाण्डे पयः क्षिप्त्वा मुखं वस्त्रेण बन्धयेत् । तत्पृष्ठे गन्धकं क्षिप्त्वा शरावेण पिधापयेत् ॥१२०॥ भाण्डं निःक्षिप्य भूम्यां तदूर्द्धं देयं पुटं लघु । ततः क्षीरे द्रुतं गन्धं शुद्धं योगेषु योजयेत् ॥१२१॥
( ३२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । एक पात्रमें घृत और दूध डालकर उसके मुखपर साफ कपडा बांध देवे उस कपडेपर गंधक डालकर गंधकके ऊपर औंधा करके एक शराव ढक देवे और मिट्टीसे संधी लेप कर देवे । फिर इस पात्रको मुखपर्यन्त जमीनमें गाड देवे केवल शराव मात्र ऊपर दीखता रहना चाहिये इस शरावके ऊपर एरने उपलोंकी लघु पुट देवे तो सब गंधक पिघलकर दूधमें चली जायगी यह शुद्ध गंधक सब कार्योंमें प्रयुक्त करे ॥ १२० ॥ १२१ ॥ लोहपात्रे विनिःक्षिप्य घृतमग्नौ प्रतापयेत् । तप्ते घृते तत्समानं क्षिपेद्गन्धकजं रजः ॥१२२॥ विद्रुतं गन्धकं दृष्ट्वा दुग्धमध्ये विनिःक्षिपेत् । एवं गन्धकशुद्धिः स्यात्सर्वरोगेषु योजयेत् ॥१२३॥ एक लोहेके पात्रमें घी डालकर अग्निपर गरम करे फिर उस पात्रमें गंधकका चूर्ण डाल दे जब घीमें गंधक पिघल जावे तो उसको घी सहित उठाकर दूधमें डाल देवे ( दूधके पात्रके मुखपर बारीक वस्त्र रखना चाहिये जिसमें छनकर निर्दोष गंधक दूधमें गिरे ) जब शीतल होजाय तो गंधकको दूधसे निकालकर कपडेसे पोंछ लेवे । यह शुद्ध गंधक सब कार्योंमें प्रयुक्त करे । यदि ऐसे दो तीन वार करे तो अधिक गुण आजाता है ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ शुद्ध गंधकके गुण । शुद्धगन्धो हरेद्रोगान्कुष्ठमृत्युजरादिकान् । अग्निकारी महानुष्णो वीर्यवृद्धिं करोति च ॥१२४॥ शुद्ध किया हुआ गंधक रसायन है तथा कुष्ठ, मृत्यु और जरा- दिक दोषोंके हरनेवाला है एवं अग्निको दीपन करनेवाला अतिगरम और वीर्यकी वृद्धि करनेवाला है ॥ १२४ ॥ गन्धश्चातिरसायनः सुमधुरः पाके कटूष्णान्वितः, कण्डूकुष्ठविसर्पदर्पदलनो दीप्तानलः पाचनः ।
भाषाटीकासहित । ( ३३ ) आमोन्मन्थनशोधनो विषहरः सूतेन्द्रवीर्यप्रदः, गौरीपुष्पभवस्तथाकृमिहरःस्वर्णाधिकं वीर्यकृत् १२५॥ गंधक-अत्यंत रसायन, मधुर, पाकमें कडुआ और गरम है तथा खाज, कुष्ठ, विसर्प और मदको नष्ट करता है । एवं अग्निको दीप्त करनेवाला, पाचन, आमदोषनाशक, मलशोधक, विषनाशक, पारेको बलके देनेवाला, पार्वतीके पुष्पसे उत्पन्न हुआ व कृमियोंको हरने- वाला और सुवर्णके वीर्यको बढानेवाला या सुवर्णसे भी अधिक वीर्य देनेवाला होता है । यह शुद्ध गंधकके गुण हैं ॥ १२५ ॥ वज्र ( हीरा ) शोधनप्रकरणम् । अशुद्ध हीरेके दोष । पार्श्वपीडां पाण्डुरोगं हृल्लासं दाहसन्ततिम् । रोगानीकं गुरुत्वञ्च धत्ते वज्रमशोधितम् ॥१२६ ॥ अशुद्ध हीरा-पार्श्वपीडा, पांडुरोग, हृल्लास, अत्यंतदाह, शरीरमें अनेक रोगों और भारीपन को उत्पन्न करता है ॥ १२६ ॥ वज्रशोधन । व्याघ्रीकन्दगतं वज्रं डोलायन्त्रे विपाचितम् । सप्ताहं कोद्रवक्वाथे कौलत्थे विमलं भवेत् ॥१२७॥ व्याघ्रीकंदमें हीरेको रखकर कपड़ेमें बांध डोलायंत्रद्वारा कोदोके और कुलथीके क्वाथमें सात दिन पकावे तो हीरा शुद्ध हो जाता है॥१२७ व्याघ्रीकन्दगतं वज्रं डोलायन्त्रे विपाचितम् । अहोरात्रात्समुद्धृत्य हयमूत्रेण सेचयेत् । वज्रीक्षीरेण वा सिञ्चेत्कुलिशं विमलं भवेत्॥१२८॥ अथवा-व्याघ्रीकन्द ( कटेलीकी जड़के पिंड ) में हीरेको रखकर एक दिन रात डोलायंत्र द्वारा कोद्रव या कुलथीके क्वाथमें पकाकर घोडेके मूत्रसे अथवा थोहरके दूधसे सेचन करे तो हीरा शुद्ध होजाता है॥ १२८॥
( ३४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । वज्रमारण । त्रिवर्षारूढकार्पासमूलमादाय पेषयेत् । त्रिवर्षनागवल्ल्यास्तु निजद्रावैः प्रपेषयेत् ॥१२९॥ तद्गोलके क्षिपेद्वज्रं रुद्धा गजपुटे पचेत् । एवं सप्तपुटेनैव म्रियते कुलिशं ध्रुवम् ॥ १३० ॥ तीन वर्षसे एक स्थानमें उत्पन्न हुई कपासकी जड़को लेकर तीन वर्षसे उत्पन्न हुई नागरवेलके रसमें खरल कर गोला बनावे उसमें हीरेको रखकर संपुट करे इस संपुटको गजपुटमें फूंक दे ऐसे ७ पुट देनेसे हीरेकी भस्म होजाती है ॥ १२९ ॥ १३० ॥ कांस्यपात्रे तु भेकस्य मूत्रे वज्रं तु निक्षिपेत् । त्रिःसप्तकृत्वः सन्तप्तं वज्रमेवं मृतं भवेत् ॥१३१॥ अन्य प्रकार—कांसीके पात्रमें मेढकका मूत्र डालकर उसमें हीरा तपा तपाकर २१ वार बुझावे तो हीरेकी भस्म होजाती है ॥ १३१ ॥ त्रिःसप्तकृत्वः सन्तप्तं खरमूत्रेण सेचयेत् । मुद्गरैस्तालकं पिष्ट्वा तद्गोले कुलिशं क्षिपेत् ॥१३२॥ प्रध्मातं वाजिमूत्रेण सिक्तं पूर्वक्रमेण तु । भस्मीभवति तद्वज्रं वज्रवत्कुरुते तनुम् ॥१३३॥ आयुष्यं सौख्यजननं बलरूपप्रदं तथा । रोगघ्नं मृत्युहरणं वज्रभस्म भवत्यलम् ॥ १३४ ॥ अन्य प्रकार—हीरेको २१वार अग्निमें तपा तपा कर गधेके मूत्रसे सेचन करे । फिर हरितालको पीसकर इस हरितालके गोलेमें हीरेका संपुट कर कोयलोंकी अग्निमें धौंकनीसे धमाकर लाल बनादे फिर इसे घोडेके मूत्रसे सेचन करे ऐसे २१ वार धमा २ कर घोड़ेके मूत्रसे सींचे ( बुझावे ) तो हीरेकी भस्म हो जाती है । इस हीरेकी भस्मके सेवनसे
भाषाटीकासहित । ( ३५ ) मनुष्यका शरीर वज्रके समान दृढ और नीरोग हो जाता है । हीरेकी भस्म-आयुवर्द्धक, सुखकारक, बलदायक, सुंदरताकारक, रोगनाशक और मृत्युकोभी हरनेवाली है अधिकतो क्या कहना है ॥ १३२-१३४॥ इति हीराभस्मगुण समाप्त । अथ वैक्रांतप्रकरण । वैक्रान्तं वज्रवच्छोध्यं ध्मातं तं द्वयमूत्रके । हिमं तद्भस्म संयोज्यं वज्रस्थाने विचक्षणैः ॥१३५॥ वैक्रांत मणिको भी हीरेके समानही शोधन करना चाहिये और उसी प्रकार २१ वार तपा तपा कर घोड़ेके मूत्रमें बुझानेसे वैक्रांत मणिकी भस्म होजाती है । बुद्धिमानोंको चाहिये जहां हीरेकी भस्म न मिल सके वहाँ वैक्रांतकी भस्मका प्रयोग करे ॥ १३५ ॥ वैक्रान्तं वज्रवच्छोध्यं मारणञ्चैवं तस्य तत् । हयमूत्रेण तत्सेच्यं तप्तं तप्तं त्रिसप्तधा ॥ १३६ ॥ ततश्वोत्तरवारुण्याः पञ्चांगे गोलकं क्षिपेत् । रुद्धा मूषापुटे पाच्यमुद्धृत्य गोलकं पुनः ॥१३७॥ क्षिप्त्वा रुद्धा पचेदेवं यावत्तद्भस्मतां व्रजेत् । भस्मीभूतञ्च वैक्रान्तं वज्रस्थाने नियोजयेत् ॥१३८॥ अन्य प्रकार-वैक्रांतका शोधन मारण सब हीरेके समान ही जानना । अथवा वैक्रांतको २१ वार गरम करके घोड़ेके मूत्रमें बुझावे फिर इंद्रायणके पञ्चाङ्गको पीसकर गोला बनावे इस गोलेमें वैक्रांतको रख संपुटकर मूषा पुटमें पकावे फिर निकालकर उसी प्रकार इन्द्रायणके गोलेमें संपुट कर मूषा पुटमें पकावे जबतक भस्म न हो तबतक इसी प्रकार मूषापुटमें (कोयलोंकी अग्निमें रख) पकाता रहे । भस्म होनेपर इस वैक्रांतभस्मका हीरेकी भस्मके अभावमें प्रयोग करे ॥१३६-१३८॥ इति वैक्रांत मारण ।
( ३६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अथ अभ्रकप्रकरण । अभ्रकं गिरिजाबीजममलं गगनाह्वयम् । तत्र कृष्णाभ्रके वज्रं पीतात्मनि तु ग्राहिकम् ॥ सितात्मके तारकं स्याद्भीरुकं रक्तके वरम् ॥१३९ ॥ अभ्रक, गिरिजाबीज, अमल, गगन, गगनाह्वय ( भोड्ल ) यह सब अभ्रकके नाम हैं ( और भी आकाशके वाचक शब्द अभ्रकके पर्याय जानने ) । वह अभ्रक-काला, पीला, सफेद और लाल इन भेदोंसे चार प्रकारका होता है । इनमें काले वर्णके अभ्रकोंमें वज्राभ्रक श्रेष्ठ होता है । पीले अभ्रकोंमें ग्राहिक, सफेदमें तारक और लाल वर्णके अभ्रकोंमें भीरुक नामक अभ्रक श्रेष्ठ होता है ॥ १३९ ॥ वज्राभ्रकके लक्षण । सुप्रशस्तं कठोराङ्गं गुरु कज्जलसन्निभम् ॥ १४० ॥ यन्न शब्दायते वह्नौ नैवोच्छूनं भवेदपि । सदाकरसमुद्भूतं वज्रेति प्रथितं घनम् ॥ १४१ ॥ जो अभ्रक-स्वच्छ, कठोरांग, भारी, कज्जलके समान वर्णवाला हो और अग्निमें डालकर धमानेसे शब्द न करै, फूत्कार न करे, सुन्दर आकारवाला ( कोई ऐसा कहते हैं कि सदाकरका अर्थ अच्छे स्थानसे पैदा होनेवाला ) हो वैसा ही रहे फूले नहीं विकृतं न हो उसको वज्राभ्रक कहते हैं ॥ १४० ॥ १४१ ॥ पिनाकं दर्दुरं नागं वज्रञ्चेति चतुर्विधम् । ध्मातमभ्रं दलचयं पिनाकं विसृजत्यलम् ॥१४२॥ फूत्कारं भुजगः कुर्याद्दर्दुरं भेकशब्दवत् । चतुर्थञ्च वरं ज्ञेयं न वह्नौ विकृतिं व्रजेत् ॥ १४३ ॥ काला अभ्रक-पिनाक, दर्दुर, नाग और वज्र इन भेदोंसे चार प्रकारका होता है । इनमें अग्निमें रखकर ध्मायमान करनेसे जिसके
, comma after रोगनाशक, no space before बुढापेको. * : "हरनेवाला और मृत्युको भी जीतनेवाला है इसलिये संपूर्ण औषधिकर्ममें" -> correct. * : "वज्राभ्रक ही लेना चाहिये ॥ १४५ ॥" -> correct. * : "अशुद्ध अभ्रकके दोष ।" -> correct. * : "अशुद्धाभ्रं निहन्त्यायुर्वर्द्धयेन्मारुतं कफम् ।" -> correct. * : "आहत्याच्छादयेद्गात्रं मंदाग्निकिमिवर्धनम् ॥१४६॥" -> look at "आहत्याच्छादयेद्गात्रं": आ ह त्या च्छा द ये द् गा त्रं. Yes. Look at "मंदाग्निकिमिवर्धनम्": म ं द ा ग ् न ि क ि म ि व र् ध न म्. Yes! And ॥१४६॥. * : "विना शोधन किया अभ्रक आयुको नष्ट करता है और वायुको" -> note in the original "करता है और वायुको" - wait, look at "करता है": is there space? Yes. * : "बढाता है, कफको मूर्छन कर शरीरको जकड देता है । एवं मंदाग्नि-" ->
( ३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । । अभ्रकके शोधनकी विधि । पादांशं शालिसंयुक्तमभ्रकं कम्बलोदरे । त्रिरात्रं स्थापयेन्नीरे तत्क्लिन्नं मर्दयेद्दृढम् ॥ १४७ ॥ कम्बलाद्गलितं श्लक्ष्णं वालुकारहितं च यत् । तद्धान्याभ्रमिति प्रोक्तमभ्रमारणसिद्धये ॥१४८॥ स्वच्छ वज्राभ्रक १ पाव, शालिधान्य १ सेर इन दोनोंको कंबलके टुकडेमें बांधकर जल ( कांजी ) में भिगो देवे तीसरे दिन निकालकर किसी बडी परातमें उस कंबलकी पोटलीको मसले जिससे सब अभ्रक बारीक होकर कंबलसे बाहर छनकर निकल आवे, उस स्वच्छ बारीक अभ्रकको ले लेवे इसमेंसे कोई कंकडी आदि अन्य वस्तु पहिलेही निकाल देना चाहिये । इसे धान्याभ्रक कहते हैं यही मारण आदि सब कर्मोंमें लेना चाहिये ॥ १४७ ॥ १४८ ॥ त्रिफलाक्वाथगोमूत्रक्षीरकासिकसेचितम् । भस्त्राग्नौ सप्तधा व्योम तप्तं तप्तं विशुद्ध्यति॥१४९॥ अन्य प्रकार-वज्राभ्रकको कोयलोंकी तीक्ष्णाग्निमें धोंकनीसे धमाकर लाल होनेपर त्रिफलेके क्वाथसे बुझावे ऐसे ही सात २ वार गरम करके त्रिफलेके क्वाथ, गोमूत्र, दूध और कांजीसे बुझावे तो अभ्रक शुद्ध होजाता है ॥ १४९ ॥ अथवा बदरीक्वाथे ध्मातमभ्रं विनिःक्षिपेत् । मर्दितं पाणिना शुष्कं धान्याभ्रादतिरिच्यते १५०॥ तीसरा प्रकार-अथवा अभ्रकको तीक्ष्णाग्निमें तपा २ कर बेरीके क्वाथमें बुझावे फिर सुखाकर हाथोंसे मलकर बारीक करले यह अभ्रक शुद्ध होता है और धान्याभ्रकसे भी अच्छा होता है ॥ १५० ॥
भाषाटीकासहित । ( ३९ ) । अगस्त्यपुष्पतोयेन पिष्टं शूरणकन्दगम् । गोष्ठभूमिगतं मासं जायते रससन्निभम् ॥ १६१ ॥ अन्य विधि-अभ्रकको अगस्त्यपुष्पों ( बकपुष्पों ) के रसमें रगड़कर जिमीकंदके बीचमें भरकर जिमीकंदके टुकड़ेसे बंदकर गौओंके रहनेके स्थानमें पृथ्वीमें गाड़देवे, एक महीनेके अनंतर निकाले तो यह अभ्रक शुद्ध और रसके समान गुणकारी होजायगा । इसको मारणादि कर्ममें लेवे ॥ १६१ ॥ इति अभ्रक शोधन समाप्त । अभ्रकमारणविधि । वज्राभ्रकं समादाय निक्षिप्य स्थालिकोदरे । रम्भादिक्षारतोयेन पचेद्गोमयवह्निना ॥१६२॥ यावत्सिन्दूरसंकाशं न भवेत्स्थालिकाबहिः । सेचनीयं ततः क्षीरैस्ततः सूक्ष्मं विचूर्णयेत् ॥१६३॥ शुद्ध वज्राभ्रकको आगे कहे हुए केले आदिके खार ( खारके पानी ) में खूब घोटकर एक मिट्टीके पात्रमें डाले इस पात्रको गोवरी ( उपलों ) की आगमें रख तबतक तीक्ष्ण आंच देता रहे जबतक अभ्रकवाले पात्रका वर्ण अग्निके तापसे सिंदूरके समान लाल न होजाय फिर अग्निसे निकाल दूधसे बुझांकर चूर्ण करे ( निश्चंद्र होने पर्यन्त ऐसा ही करे ) तो अभ्रककी भस्म होजाती है ॥ १६२ ॥ १६३ ॥ धान्याभ्रकं समादाय मुस्तक्वाथैः पुटत्रयम् । तद्वत्पुनर्नवानीरैः कासमर्दरसैस्तथा ॥ १६४ ॥
( ४० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । नागवल्लीरसैः सूर्य्यक्षीरैर्देयं पृथक् पृथक् । दिनं दिनं मर्दयित्वा काथैर्वटजटोद्भवैः ॥ १५५ ॥ दत्त्वा पुटत्रयं पश्चात्रिः पुटेन्मुसलीजलैः । त्रिर्गोक्षुरकषायेण त्रिः पुटेद्धानरीरसैः ॥ १५६ ॥ मोचाकन्दरसैः पाच्यं त्रिरात्रं कोकिलाक्षजैः । रसैः पुटेल्लोध्रकैस्तु क्षीरादेकपुटं पुनः ॥ १५७ ॥ दध्ना घृतेन मधुना स्वच्छया सितया तथा । एकमेकं पुटं दद्यादभ्रस्यैव मृतिर्भवेत् ॥१५८॥ सर्वरोगहरं व्योम जायते योगवाहिकम् । कामिनीमददर्पघ्नं शस्तं पुंस्त्वोपघातिनाम् । वृष्यमायुष्करं शुक्रवृद्धिसंतानकारकम् ॥१५९॥ दूसरी विधि—धान्याभ्रकको लेकर नागरमोथेके काथमें खरल कर टिकिया बनावे फिर संपुटकर गजपुटमें फूंकदे स्वांगशीतल होनेपर फिर नागरमोथेके काथमें खरल करके गजपुट दे । ऐसे तीन पुटें देवे । फिर इसी प्रकार पुनर्नवाका रस, कसौंदीका रस,पानका रस, आकका दूध, वटकी जटाका काथ, काली मुसलीका काथ, गोखरूका काथ, कौंचका रस, मोचाकंदका रस, तालमखानेका रस और पठानीलोधका काथ इनमेंसे प्रत्येककी अलग २ तीन २ पुटें देवे । फिर गायके दूधकी एक पुट देवे ( कहीं “क्षीरादष्टपुटेन्मुहुः” ऐसा पाठ है, जिसमें गोदू- धकी आठ पुटें दे ) फिर दही, घी, शहद और मिश्री इनकी अलग २ एक एक पुट देवे तो अभ्रककी उत्तम भस्म होजायगी । यह भस्म संपूर्ण रोगोंको हरनेवाली और योगवाही होजाती है । तथा स्त्रियोंके मदको हरण करे, नपुसंकताको दूर करे, शरीरको पुष्ट करे और आयुको बढावे एवं वीर्यवर्द्धक और संतानकारक है ॥ १५४-१५९ ॥
भाषाटीकासहित । (४१) मारक गण (१३ मारण) । तण्डुलीयक-बृहती-नागवल्ली पिण्डतगरपुनर्नवा- हिलमोचिकामण्डूकपर्णी । तिक्ताखुपर्णिकामद्- नार्कावपिलक्षसुतमातृकाभिः ॥ १६० ॥ चौलाई, कटेली, नागरवेल (पान), सिलहक, तगर, पुनर्नवा, हुलहुल, मण्डूकपर्णी (ब्राह्मी), कुटकी, मूषकपर्णी (दंती), मैनफल, आक और शतावर यह १३ द्रव्य अभ्रकको मारनेवाले हैं (शुद्ध अभ्रकको अलग २ इनके रसमें रगड़कर गजपुटमें फूंक देनेसे भस्म होजाता है) ॥ १६० ॥ चौथी विधि । रम्भादिनाभ्रं लवणेन पिष्ट्वा चक्रीकृतं तद्दलमध्य- वर्ति । दग्धेन्धनेषु व्यजनानिलेन स्नुह्यर्कमूला- म्बुपुटेन सिद्धम् ॥ १६१ ॥ रंभादिगणके रसमें अथवा केलाखार, सज्जीखार, चनाखार और नमक इनके जलोंमें शुद्ध अभ्रकको खूब घोटकर टिकिया बनाले इन टिकियोंको केलेके पत्रोंमें रख पंखेकी पवनसे चैतन्यकी हुई कोयलोंकी अग्निमें फूंके । फिर निकालकर थोहरके दूधमें घोटकर टिकिया बना संपुट करे और गजपुटमें फूंकदे । ऐसेही आकके दूधमें घोटकर टिकिया बना संपुट कर गजपुटमें फूंके तो अभ्रककी भस्म होजाती है ॥१६१॥ पांचवीं विधि । धान्याभ्रकस्य भागैकं भागौ द्वौ टङ्कणस्य च । पिष्ट्वा तदन्धमूषायां रुद्ध्वा तीव्राग्निना पचेत्॥१६२॥ स्वभावशीतलं चूर्णं सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ १६३ ॥ धान्याभ्रक एक भाग, सुहागा दो भाग इन दोनोंको इकट्ठेही घोट- कर अंधमूषामें बंदकर कोयलेकी तीव्र अग्निमें फूंक दे (अथवा गज-
( ४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पुटमें फूंकदे ) जब स्वांगशीतल होजाय तो निकालकर पीसले(निश्चन्द्र भस्म न हो तो फिर इसी प्रकार फूंके ) निश्चन्द्र होनेपर इस भस्मका सब योगोंमें प्रयोग करना न्याहिये ॥ १६२ ॥ १६३ ॥ छठी विधि १० पुटी भस्म । धान्याभ्रकं दृढं मर्द्यमर्कक्षीरैर्दिनावधि । वेष्टयेदर्कपत्रेण चक्राकारं तु कारयेत् ॥ १६४ ॥ कुञ्जराख्ये पुटे दग्ध्वा सप्तवारान् पुनः पुनः । ततो वटजटाक्वाथैस्तद्वद्देयं पुटत्रयम् । म्रियते नात्र सन्देहः सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ १६५ ॥ धान्याभ्रकको २४ घंटे आकके दूधमें खूब रगडे फिर गोल गोल टिकिया बनाकर आकके पत्रोंमें लपेट संपुट करे और गजपुटमें फूंक दे शीतल होनेपर निकालकर फिर आकके दूधमें उसी प्रकार रगड कर टिकिया बना गजपुटमें फूंके । ऐसे सात पुट आकके दूधकी देवे तदनंतर तीन पुट बड़की जटाके क्वाथकी देवे तो अवश्य अभ्रककी उत्तम भस्म हो जायगी; इसका संपूर्ण योगोंमें प्रयोग करे ॥ १६४ ॥ १६५ ॥ सातवीं विधि । १०० पुटी भस्म । दुग्धत्रयं कुमार्यम्बुगङ्गापत्रं नृमूत्रकम् । वटशुङ्गमजारक्तमेभिरभ्रं विमर्दयेत् ॥ १६६ ॥ शतधापुटितं भस्म जायते पद्मरागवत् । निश्चन्द्रकं भवेद्व्योम शुद्धदेहे रसायनम् ॥ १६७ ॥ आकका दूध, बड़का दूध, थोहरका दूध, घीकुमारका रस, गंगापत्री ( गंगतितिरी घास ), मनुष्यका मूत्र, बड़के अंकुर, बक- रीका रक्त इनमें पृथक् २ रगड कर टिकिया बना गजपुटमें फूंक दे ऐसे सौ १०० बार पुटें देनेसे अभ्रककी उत्तम लाल वर्णकी भस्म
भाषाटीकासहित । ( ५३ ) बन जाती है । यह निश्चन्द्र अभ्रक भस्म शुद्ध शरीरवाला मनुष्य सेवन करे तो रसायन है ॥ १६६ ॥ १६७ ॥ अभ्रक भस्मके गुण । निश्चन्द्रमारितं व्योम रूपवीर्यं दृढं तनुम् । कुरुते नाशयेन्मृत्युं जरारोगकदंबकम् ॥ १६८ ॥ निश्चंद्र शुद्ध अभ्रक भस्म मनुष्य सेवन करे तो आयुकी वृद्धि हो, रूप और वीर्य बढे शरीर दृढ होजाय, निश्चन्द्र अभ्रक भस्म जरा और मृत्यु तथा रोगोंके समूहको नष्ट करती है ॥ १६८ ॥ इति अभ्रकमारण । हरिताल ( हडताल ) प्रकरण । हरितालके पर्याय । हरितालं तालमालं मालं शैलूषभूषणम् । पिञ्जकं रोमहरणं तालकं पीतमित्यपि ॥ १६९ ॥ हरिताल, ताल, आल, माल, शैलूषभूषण, पिञ्जक, रोमहरण, तालक और पीत ( ताल, मनोज्ञ, पीतक, पिंग, कांचनक, हरिबीज, पीत, चित्रांग, वंशपत्रक, गौरीललित ) यह हरितालके पर्यायवाचक शब्द ( नाम ) हैं ॥ १६९ ॥ हरितालके भेद । तालकं पटलं पिण्डं द्विधा तत्राद्यमुत्तमम् ॥ १७०॥ हरिताल दो प्रकारकी होती है, एक पटल ( वर्की ), दूसरी पिण्ड, इनमें पटल अर्थात् वर्की हरिताल उत्तम होती है ॥ १७० ॥ अशुद्ध हरितालके दोष । अशुद्धतालमायुर्घ्नं कफमारुतमेहकृत् । तापस्फोटाङ्गसङ्कोचान् कुरुते तेन शोधयेत् ॥ १७१॥
( ४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अशुद्ध हरिताल आयुका नाश करती है, कफ वायु और प्रमेहको उत्पन्न करती है । एवं ताप, फोडे और अंगोंका संकोच करती है इसलिये हरितालका शोधन कर लेना चाहिये ॥ १७१ ॥ हरितालशोधन विधि । शुद्धं स्यात्तालकं स्विन्नं कूष्माण्डसलिले ततः । चूर्णोदके पृथक् तैले तस्मिन् पूते न दोषकृत् ॥१७२॥ हरितालको लेकर वस्त्रमें पोटली बांध दोलायंत्रद्वारा पेठेके रसमें १ प्रहर स्वेदन करे फिर चूनेके पानीमें इसी प्रकार स्वेदन करे एवं तिलोंके तेलमें मंद अग्निसे १ प्रहर स्वेदन करे तो हरिताल शुद्ध होजाती है और कोई दोष नहीं करती ॥ १७२ ॥ शोधनेकी दूसरी विधि । तालकं कणशः कृत्वा दशांशेन च टङ्कणम् । जम्बीरोत्थैर्द्रवैः क्षाल्यं काञ्जिकैः क्षालयेत्पुनः ॥१७३॥ वस्त्रे चतुर्गुणे बद्ध्वा दोलायन्त्रे दिनं पचेत् । तच्चूर्ण्य आरनालेन दिनं कूष्माण्डजै रसैः । वेद्यं वा शाल्मलीतोयैस्तालकं शुद्धिमाप्नुयात् ॥१७४॥ हरितालको दश भाग ले सुहागेका चूर्ण एक भाग मिलावे इन दोनोंको नींबूके रसमें खूब धोवे, फिर कांजीमें धोवे फिर हरि- तालका चूर्ण कर इसकी चौतहे वस्त्रमें पोटली बांध दोलायन्त्रद्वारा कांजीमें १२ घंटे स्वेदन करे । फिर पेठेके रसमें इसी प्रकार १२ घंटे दोलायन्त्रमें स्वेदन करे अथवा सेमलके रस ( क्वाथ ) में १२ घंटे स्वेदन करे तो हरिताल शुद्ध होजाती है ॥ १७३ ॥ १७४ ॥ तीसरी विधि । तालकं पोटलीं बद्ध्वा सचूर्णे काञ्जिके पचेत् । दोलयन्त्रेण यामैकं ततः कूष्माण्डजे रसे ॥१७५॥
भाषाटीकासहित । (४५) तिलतैले पचेद्यामं यामं तत्रैफले जले । दोलायन्त्रे चतुर्यामं पाच्यं शुद्ध्यति तालकम् ॥ १७६॥ हरितालको एक पोटलीमें बांध सीपीके चूनेयुक्त कांजीमें दोलायंत्र- द्वारा एक प्रहर पकावे, फिर पेठेके रसमें एक प्रहर पकावे। एवं तिलोंके तेलमें और त्रिफलेके काथमें एक एक प्रहर पकावे इस प्रकार इन चारों द्रव्योंमें चार प्रहर अर्थात् प्रत्येक द्रव्यमें एक एक प्रहर पकानेसे हरि- ताल शुद्ध होजाती है ॥ १७५ ॥ १७६ ॥ इति हरितालशोधनविधि ॥ १ हरितालमारण विधि । तालकं कणशः कृत्वा सुशुद्धं हण्डिकान्तरे । चूर्णोदकेन सम्पिष्टमपामार्गजतोद्भवैः ॥ १७७ ॥ क्षारोदकैश्च संपिष्टमूर्ध्वाधो यावशूकजम् । चूर्णं दत्त्वा निरुध्याथ कूष्माण्डैश्च प्रपूरयेत् ॥ १७८॥ पुनर्मुखं निरुध्याथ चतुर्यामं क्रमाग्निना । पचेदेवं हि तच्चूर्णं कुष्ठादौ परियोजयेत् ॥ १७९॥ विशुद्ध हरितालके टुकडोंको चूनेके पानीमें घोटना, सूखनेपर उसे फिर अपामार्ग ( ओंगा वा चिरचिटा ) के मूलकाष्ठसे बनाये गये क्षारसे मिले हुए पानीमें मर्दन करना । फिर इस पिष्टीका एक गोल चक्राकार चपटा पिण्ड बना उत्तम हांडीमें रखना, हरितालके ऊपर और नीचे शुद्ध यवक्षारका चूर्ण बिछा एक शरावसे हांडीके मध्य स्थित हरता- लको ढांककर उत्तम रीतिसे बन्द करना, बदरी पल्लवकल्क आदिसे संधि- रोध करना अन्यथा उड़ जानेका भय है । इसके अनन्तर कूष्माण्ड ( पेठा वा कोहला ) के खण्डोंसे उस हांडीको पूर्ण कर देना और हांडीके मुखको शरावसे ढककर कपड़मिट्टी कर सुखा लेना और चार प्रहर तक मन्द, मध्य एवं तीक्ष्ण अग्निका आंच देना । इससे हरताल ३
( ४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हांडीके मध्य स्थित शरावपर जो लगेगा इस शरावसंलग्न कुन्द पुष्पके समान प्रकाशमान श्वेत चूर्णको युक्तिसे लेना, यही श्वेतवर्ण हरिताल भस्म है। इसे कुष्ठादि महाव्याधियोंमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ १७७-१७९॥ २ प्रकारान्तरसे मारण । पलमेकं शुद्धतालं कुमारीरसमर्दितम् । शरावसम्पुटे रुद्धं यामद्वादशकं पचेत् ॥ १८० ॥ स्वाङ्गशीतं समादाय तालकं तु मृतं भवेत् । गलत्कुष्ठं हरेच्चैत्तत्तालकं स्यान्मृतं यदा ॥ १८१ ॥ एक पल शुद्ध हरतालको घीकारके रसमें घोट पीस शराव सम्पुटमें बन्दकर बारह प्रहर अग्निमें पकावे, स्वांगशीतल होजानेपर निकाले । जब हरताल भलीभांति मारा जाय तो यह गलत्कुष्ठको नष्ट करता है ॥ १८० ॥ १८१ ॥ ३ अन्य मारणविधि । अम्लरोलीजलैर्भाव्यं तालं द्वादशयामकम् । तथैव निम्बुनीरेण ततश्चूर्णोदकेन च॥ १८२॥ प्रक्षाल्य शाल्मलीक्षारैर्द्विगुणैः खातमध्यगम् । विधाय कवचीयन्त्रं वालुकाभिः प्रपूरयेत् ॥ १८३॥ द्वादशप्रहरं पक्त्वा स्वाङ्गशीतञ्च चूर्णयेत् । खादयेद्रक्तिकामेकां कुष्ठश्लीपदशान्तये ॥ १८४ ॥ शुद्ध हरितालको चांगेरीकेरसमें १२ प्रहर भावना देवे फिर नींबूके रसमें १२ प्रहर भावना देवे तदनंतर चूनेके पानीमें १२ प्रहर भावना देवे फिर इसको पानीसे धोकर सुखा ले। नदनंतर एक आतशी शीशीमें हरितालसे दूना सींवल ( सेमल ) का खार ले आधा हरितालके नीचे आधा ऊपर डाल दो सरावों में बंदकर कपडमिट्टी करके सुखाले, फिर
भाषाटीकासहित । ( ४७ ) इस संपुटको वालुकायंत्रमें रख १२ प्रहर अग्नि दे सांगशीतल होनेपर निकालकर चूर्ण करले । इसकी एक रत्ती मात्रा खानेसे कुष्ठ और श्लीपद दूर होते हैं ॥ १८२-१८४ ॥ मरे हुए हरतालकी परीक्षा । तालं मृतं तदा ज्ञेयं वह्निस्थं धूमवर्जितम् । सधूमं न मृतं प्राहुर्वृद्धवैद्या इति स्थितिः ॥१८५॥ हरिताल भस्मको धधकते हुए अंगारेपर डालना, यदि उसमेंसे धूम न निकले तो मरा हुआ जानो, नहीं तो कच्चा रहा, ऐसा वृद्ध वैद्य कहते हैं ॥ १८५ ॥ हरितालके गुण । हरितालं कटु स्निग्धं कषायञ्च विसर्पनुत् । तालकं हरते रोगान् कुष्ठमृत्युज्वरादिकान् ॥ संशुद्धं कान्तिवीर्यौजः कुरुते मृत्युनाशनम् ॥१८६॥ हरिताल-कटु स्निग्ध और कषैली है । एवं विसर्पनाशक, संपूर्ण रोगोंको हरनेवाली, कुष्ठ, ज्वर और मृत्युको नाश करनेवाली है । भले प्रकार शोधन मारण की हुई हरिताल कांतिजनक, वीर्यप्रद, ओजवर्धक और मृत्युको भी नष्ट करती है ॥ १८६° ॥ माणिक रस । तालकं वंशपत्राख्यं कूष्माण्डसलिले क्षिपेत् । सप्तधा वा त्रिधा वापि दध्ना चाम्लेन वा पुनः१८७॥ शोषयित्वा पुनः शुष्कं चूर्णयेत्तण्डुलाकृति । ततः शरावके पात्रे स्थापयेत्कुशलो भिषक्॥१८८॥