रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पुटमें फूंकदे ) जब स्वांगशीतल होजाय तो निकालकर पीसले(निश्चन्द्र भस्म न हो तो फिर इसी प्रकार फूंके ) निश्चन्द्र होनेपर इस भस्मका सब योगोंमें प्रयोग करना न्याहिये ॥ १६२ ॥ १६३ ॥ छठी विधि १० पुटी भस्म । धान्याभ्रकं दृढं मर्द्यमर्कक्षीरैर्दिनावधि । वेष्टयेदर्कपत्रेण चक्राकारं तु कारयेत् ॥ १६४ ॥ कुञ्जराख्ये पुटे दग्ध्वा सप्तवारान् पुनः पुनः । ततो वटजटाक्वाथैस्तद्वद्देयं पुटत्रयम् । म्रियते नात्र सन्देहः सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ १६५ ॥ धान्याभ्रकको २४ घंटे आकके दूधमें खूब रगडे फिर गोल गोल टिकिया बनाकर आकके पत्रोंमें लपेट संपुट करे और गजपुटमें फूंक दे शीतल होनेपर निकालकर फिर आकके दूधमें उसी प्रकार रगड कर टिकिया बना गजपुटमें फूंके । ऐसे सात पुट आकके दूधकी देवे तदनंतर तीन पुट बड़की जटाके क्वाथकी देवे तो अवश्य अभ्रककी उत्तम भस्म हो जायगी; इसका संपूर्ण योगोंमें प्रयोग करे ॥ १६४ ॥ १६५ ॥ सातवीं विधि । १०० पुटी भस्म । दुग्धत्रयं कुमार्यम्बुगङ्गापत्रं नृमूत्रकम् । वटशुङ्गमजारक्तमेभिरभ्रं विमर्दयेत् ॥ १६६ ॥ शतधापुटितं भस्म जायते पद्मरागवत् । निश्चन्द्रकं भवेद्व्योम शुद्धदेहे रसायनम् ॥ १६७ ॥ आकका दूध, बड़का दूध, थोहरका दूध, घीकुमारका रस, गंगापत्री ( गंगतितिरी घास ), मनुष्यका मूत्र, बड़के अंकुर, बक- रीका रक्त इनमें पृथक् २ रगड कर टिकिया बना गजपुटमें फूंक दे ऐसे सौ १०० बार पुटें देनेसे अभ्रककी उत्तम लाल वर्णकी भस्म