भारतकोश
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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( ४२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । पुटमें फूंकदे ) जब स्वांगशीतल होजाय तो निकालकर पीसले(निश्चन्द्र भस्म न हो तो फिर इसी प्रकार फूंके ) निश्चन्द्र होनेपर इस भस्मका सब योगोंमें प्रयोग करना न्याहिये ॥ १६२ ॥ १६३ ॥ छठी विधि १० पुटी भस्म । धान्याभ्रकं दृढं मर्द्यमर्कक्षीरैर्दिनावधि । वेष्टयेदर्कपत्रेण चक्राकारं तु कारयेत् ॥ १६४ ॥ कुञ्जराख्ये पुटे दग्ध्वा सप्तवारान् पुनः पुनः । ततो वटजटाक्वाथैस्तद्वद्देयं पुटत्रयम् । म्रियते नात्र सन्देहः सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ १६५ ॥ धान्याभ्रकको २४ घंटे आकके दूधमें खूब रगडे फिर गोल गोल टिकिया बनाकर आकके पत्रोंमें लपेट संपुट करे और गजपुटमें फूंक दे शीतल होनेपर निकालकर फिर आकके दूधमें उसी प्रकार रगड कर टिकिया बना गजपुटमें फूंके । ऐसे सात पुट आकके दूधकी देवे तदनंतर तीन पुट बड़की जटाके क्वाथकी देवे तो अवश्य अभ्रककी उत्तम भस्म हो जायगी; इसका संपूर्ण योगोंमें प्रयोग करे ॥ १६४ ॥ १६५ ॥ सातवीं विधि । १०० पुटी भस्म । दुग्धत्रयं कुमार्यम्बुगङ्गापत्रं नृमूत्रकम् । वटशुङ्गमजारक्तमेभिरभ्रं विमर्दयेत् ॥ १६६ ॥ शतधापुटितं भस्म जायते पद्मरागवत् । निश्चन्द्रकं भवेद्व्योम शुद्धदेहे रसायनम् ॥ १६७ ॥ आकका दूध, बड़का दूध, थोहरका दूध, घीकुमारका रस, गंगापत्री ( गंगतितिरी घास ), मनुष्यका मूत्र, बड़के अंकुर, बक- रीका रक्त इनमें पृथक् २ रगड कर टिकिया बना गजपुटमें फूंक दे ऐसे सौ १०० बार पुटें देनेसे अभ्रककी उत्तम लाल वर्णकी भस्म

भाषाटीकासहित । ( ५३ ) बन जाती है । यह निश्चन्द्र अभ्रक भस्म शुद्ध शरीरवाला मनुष्य सेवन करे तो रसायन है ॥ १६६ ॥ १६७ ॥ अभ्रक भस्मके गुण । निश्चन्द्रमारितं व्योम रूपवीर्यं दृढं तनुम् । कुरुते नाशयेन्मृत्युं जरारोगकदंबकम् ॥ १६८ ॥ निश्चंद्र शुद्ध अभ्रक भस्म मनुष्य सेवन करे तो आयुकी वृद्धि हो, रूप और वीर्य बढे शरीर दृढ होजाय, निश्चन्द्र अभ्रक भस्म जरा और मृत्यु तथा रोगोंके समूहको नष्ट करती है ॥ १६८ ॥ इति अभ्रकमारण । हरिताल ( हडताल ) प्रकरण । हरितालके पर्याय । हरितालं तालमालं मालं शैलूषभूषणम् । पिञ्जकं रोमहरणं तालकं पीतमित्यपि ॥ १६९ ॥ हरिताल, ताल, आल, माल, शैलूषभूषण, पिञ्जक, रोमहरण, तालक और पीत ( ताल, मनोज्ञ, पीतक, पिंग, कांचनक, हरिबीज, पीत, चित्रांग, वंशपत्रक, गौरीललित ) यह हरितालके पर्यायवाचक शब्द ( नाम ) हैं ॥ १६९ ॥ हरितालके भेद । तालकं पटलं पिण्डं द्विधा तत्राद्यमुत्तमम् ॥ १७०॥ हरिताल दो प्रकारकी होती है, एक पटल ( वर्की ), दूसरी पिण्ड, इनमें पटल अर्थात् वर्की हरिताल उत्तम होती है ॥ १७० ॥ अशुद्ध हरितालके दोष । अशुद्धतालमायुर्घ्नं कफमारुतमेहकृत् । तापस्फोटाङ्गसङ्कोचान् कुरुते तेन शोधयेत् ॥ १७१॥

( ४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अशुद्ध हरिताल आयुका नाश करती है, कफ वायु और प्रमेहको उत्पन्न करती है । एवं ताप, फोडे और अंगोंका संकोच करती है इसलिये हरितालका शोधन कर लेना चाहिये ॥ १७१ ॥ हरितालशोधन विधि । शुद्धं स्यात्तालकं स्विन्नं कूष्माण्डसलिले ततः । चूर्णोदके पृथक् तैले तस्मिन् पूते न दोषकृत् ॥१७२॥ हरितालको लेकर वस्त्रमें पोटली बांध दोलायंत्रद्वारा पेठेके रसमें १ प्रहर स्वेदन करे फिर चूनेके पानीमें इसी प्रकार स्वेदन करे एवं तिलोंके तेलमें मंद अग्निसे १ प्रहर स्वेदन करे तो हरिताल शुद्ध होजाती है और कोई दोष नहीं करती ॥ १७२ ॥ शोधनेकी दूसरी विधि । तालकं कणशः कृत्वा दशांशेन च टङ्कणम् । जम्बीरोत्थैर्द्रवैः क्षाल्यं काञ्जिकैः क्षालयेत्पुनः ॥१७३॥ वस्त्रे चतुर्गुणे बद्ध्वा दोलायन्त्रे दिनं पचेत् । तच्चूर्ण्य आरनालेन दिनं कूष्माण्डजै रसैः । वेद्यं वा शाल्मलीतोयैस्तालकं शुद्धिमाप्नुयात् ॥१७४॥ हरितालको दश भाग ले सुहागेका चूर्ण एक भाग मिलावे इन दोनोंको नींबूके रसमें खूब धोवे, फिर कांजीमें धोवे फिर हरि- तालका चूर्ण कर इसकी चौतहे वस्त्रमें पोटली बांध दोलायन्त्रद्वारा कांजीमें १२ घंटे स्वेदन करे । फिर पेठेके रसमें इसी प्रकार १२ घंटे दोलायन्त्रमें स्वेदन करे अथवा सेमलके रस ( क्वाथ ) में १२ घंटे स्वेदन करे तो हरिताल शुद्ध होजाती है ॥ १७३ ॥ १७४ ॥ तीसरी विधि । तालकं पोटलीं बद्ध्वा सचूर्णे काञ्जिके पचेत् । दोलयन्त्रेण यामैकं ततः कूष्माण्डजे रसे ॥१७५॥

भाषाटीकासहित । (४५) तिलतैले पचेद्यामं यामं तत्रैफले जले । दोलायन्त्रे चतुर्यामं पाच्यं शुद्ध्यति तालकम् ॥ १७६॥ हरितालको एक पोटलीमें बांध सीपीके चूनेयुक्त कांजीमें दोलायंत्र- द्वारा एक प्रहर पकावे, फिर पेठेके रसमें एक प्रहर पकावे। एवं तिलोंके तेलमें और त्रिफलेके काथमें एक एक प्रहर पकावे इस प्रकार इन चारों द्रव्योंमें चार प्रहर अर्थात् प्रत्येक द्रव्यमें एक एक प्रहर पकानेसे हरि- ताल शुद्ध होजाती है ॥ १७५ ॥ १७६ ॥ इति हरितालशोधनविधि ॥ १ हरितालमारण विधि । तालकं कणशः कृत्वा सुशुद्धं हण्डिकान्तरे । चूर्णोदकेन सम्पिष्टमपामार्गजतोद्भवैः ॥ १७७ ॥ क्षारोदकैश्च संपिष्टमूर्ध्वाधो यावशूकजम् । चूर्णं दत्त्वा निरुध्याथ कूष्माण्डैश्च प्रपूरयेत् ॥ १७८॥ पुनर्मुखं निरुध्याथ चतुर्यामं क्रमाग्निना । पचेदेवं हि तच्चूर्णं कुष्ठादौ परियोजयेत् ॥ १७९॥ विशुद्ध हरितालके टुकडोंको चूनेके पानीमें घोटना, सूखनेपर उसे फिर अपामार्ग ( ओंगा वा चिरचिटा ) के मूलकाष्ठसे बनाये गये क्षारसे मिले हुए पानीमें मर्दन करना । फिर इस पिष्टीका एक गोल चक्राकार चपटा पिण्ड बना उत्तम हांडीमें रखना, हरितालके ऊपर और नीचे शुद्ध यवक्षारका चूर्ण बिछा एक शरावसे हांडीके मध्य स्थित हरता- लको ढांककर उत्तम रीतिसे बन्द करना, बदरी पल्लवकल्क आदिसे संधि- रोध करना अन्यथा उड़ जानेका भय है । इसके अनन्तर कूष्माण्ड ( पेठा वा कोहला ) के खण्डोंसे उस हांडीको पूर्ण कर देना और हांडीके मुखको शरावसे ढककर कपड़मिट्टी कर सुखा लेना और चार प्रहर तक मन्द, मध्य एवं तीक्ष्ण अग्निका आंच देना । इससे हरताल ३

( ४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हांडीके मध्य स्थित शरावपर जो लगेगा इस शरावसंलग्न कुन्द पुष्पके समान प्रकाशमान श्वेत चूर्णको युक्तिसे लेना, यही श्वेतवर्ण हरिताल भस्म है। इसे कुष्ठादि महाव्याधियोंमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ १७७-१७९॥ २ प्रकारान्तरसे मारण । पलमेकं शुद्धतालं कुमारीरसमर्दितम् । शरावसम्पुटे रुद्धं यामद्वादशकं पचेत् ॥ १८० ॥ स्वाङ्गशीतं समादाय तालकं तु मृतं भवेत् । गलत्कुष्ठं हरेच्चैत्तत्तालकं स्यान्मृतं यदा ॥ १८१ ॥ एक पल शुद्ध हरतालको घीकारके रसमें घोट पीस शराव सम्पुटमें बन्दकर बारह प्रहर अग्निमें पकावे, स्वांगशीतल होजानेपर निकाले । जब हरताल भलीभांति मारा जाय तो यह गलत्कुष्ठको नष्ट करता है ॥ १८० ॥ १८१ ॥ ३ अन्य मारणविधि । अम्लरोलीजलैर्भाव्यं तालं द्वादशयामकम् । तथैव निम्बुनीरेण ततश्चूर्णोदकेन च॥ १८२॥ प्रक्षाल्य शाल्मलीक्षारैर्द्विगुणैः खातमध्यगम् । विधाय कवचीयन्त्रं वालुकाभिः प्रपूरयेत् ॥ १८३॥ द्वादशप्रहरं पक्त्वा स्वाङ्गशीतञ्च चूर्णयेत् । खादयेद्रक्तिकामेकां कुष्ठश्लीपदशान्तये ॥ १८४ ॥ शुद्ध हरितालको चांगेरीकेरसमें १२ प्रहर भावना देवे फिर नींबूके रसमें १२ प्रहर भावना देवे तदनंतर चूनेके पानीमें १२ प्रहर भावना देवे फिर इसको पानीसे धोकर सुखा ले। नदनंतर एक आतशी शीशीमें हरितालसे दूना सींवल ( सेमल ) का खार ले आधा हरितालके नीचे आधा ऊपर डाल दो सरावों में बंदकर कपडमिट्टी करके सुखाले, फिर

भाषाटीकासहित । ( ४७ ) इस संपुटको वालुकायंत्रमें रख १२ प्रहर अग्नि दे सांगशीतल होनेपर निकालकर चूर्ण करले । इसकी एक रत्ती मात्रा खानेसे कुष्ठ और श्लीपद दूर होते हैं ॥ १८२-१८४ ॥ मरे हुए हरतालकी परीक्षा । तालं मृतं तदा ज्ञेयं वह्निस्थं धूमवर्जितम् । सधूमं न मृतं प्राहुर्वृद्धवैद्या इति स्थितिः ॥१८५॥ हरिताल भस्मको धधकते हुए अंगारेपर डालना, यदि उसमेंसे धूम न निकले तो मरा हुआ जानो, नहीं तो कच्चा रहा, ऐसा वृद्ध वैद्य कहते हैं ॥ १८५ ॥ हरितालके गुण । हरितालं कटु स्निग्धं कषायञ्च विसर्पनुत् । तालकं हरते रोगान् कुष्ठमृत्युज्वरादिकान् ॥ संशुद्धं कान्तिवीर्यौजः कुरुते मृत्युनाशनम् ॥१८६॥ हरिताल-कटु स्निग्ध और कषैली है । एवं विसर्पनाशक, संपूर्ण रोगोंको हरनेवाली, कुष्ठ, ज्वर और मृत्युको नाश करनेवाली है । भले प्रकार शोधन मारण की हुई हरिताल कांतिजनक, वीर्यप्रद, ओजवर्धक और मृत्युको भी नष्ट करती है ॥ १८६° ॥ माणिक रस । तालकं वंशपत्राख्यं कूष्माण्डसलिले क्षिपेत् । सप्तधा वा त्रिधा वापि दध्ना चाम्लेन वा पुनः१८७॥ शोषयित्वा पुनः शुष्कं चूर्णयेत्तण्डुलाकृति । ततः शरावके पात्रे स्थापयेत्कुशलो भिषक्॥१८८॥

( ४८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । बदरीपल्लवोत्थेन कल्केन लेपयेद्भिषक् । अरुणाभमधःपात्रं तावज्ज्वाला प्रदीयते ॥ १८९ ॥ स्वाङ्गशीतं समुद्धृत्य माणिक्याभं भवेद्ध्रुवम् । तद्रक्तिद्वितयं खादेद्धृतभ्रामरमर्द्दितम् ॥ १९० ॥ संपूज्य देवदेवेशं कुष्ठरोगाद्विमुच्यते । स्फुटितं गलितं यच्च वातरक्तं भगन्दरम् ॥ १९१ ॥ नाडीव्रणं व्रणं दुष्टमुपदंशं विचर्चिकाम् । नासाऽऽस्यसम्भवान् रोगान् क्षतान् हन्ति सुदारुणान् पुण्डरीकञ्च चर्माख्यं विस्फोटं मण्डलं तथा ॥ १९२॥ उत्तम वर्की हरिताल लेकर उसको पेठेके रसकी भावना देकर सुखाले फिर भावना देवे फिर सुखाले ऐसे ७ भावना पेठेके रसकी, सात या तीन भावना दहीकी और सात या तीन भावना कांजी या नीम्बूके रसकी देवे प्रत्येक भावना देकर सुखाता जावे । फिर सुखाकर चावलोंकी बराबर छोटे छोटे टुकड़े कर दो शरावोंमें रख बेरीके पत्रोंके कल्कसे सन्धी लेप करे ( ऊपर एक वस्त्र और गाजनी मिट्टीका लेप करे ) फिर इसके नीचे बेरीकी लकड़ीकी आंच देवे जब नीचेका शराव अग्निके तापसे लाल होजाय तो आग निकालदे स्वांगशीतल होनेपर माणिकके समान बनी हुई हरितालको निकाल ले । फिर महादेवका पूजनकर इस माणिक रसको १ रत्ती या २ रत्ती ले घी और शहदमें मिलाकर खावे तो कुष्ठरोग दूर होता है एवं फूटा हुआ कुष्ठ, गलितकुष्ठ, वातरक्त, भगंदर, नाड़ीव्रण, व्रण, दुष्ट उपदंश, विच- र्चिका, नासारोग, मुखरोग, दारुण क्षत, पुण्डरीक कुष्ठ, चर्मदल, विस्फोटिक और मण्डलकुष्ठ यह सब दूर होते हैं । शरावमें सम्पुट करते समय अभ्रकके पत्रोंमें हरिताल बंद करना चाहिये॥१८७-१९२ इति माणिकरस विधि ।

भाषाटीकासहित । ( ४९ ) मनशिलके पर्याय । मनःशिला च नेपाली शिलाह्वा नागजिह्विका । मनोह्वा कुनटी गौणी करञ्जी करवीरिका ॥१९३ ॥ मनःशिला, नेपाली, शिलाह्वा, नागजिह्विका, मनोह्वा, कुनटी, गौणी, करञ्जी और करवीरिका यह मनसिलके नाम हैं (मनसिल लाल वर्णका पत्थरसा होता है, मनसल मनसिल इन नामोंसे प्रसिद्ध है) ॥१९३॥ उत्तम मनसिल । मनोह्वा त्वोड्रपुष्पाभा शस्यते सर्वकर्मसु ॥ १९४ ॥ मनसिल गुडहलके फूलके समान लाल वर्णवाला उत्तम होता है, वही सब कामोंमें लेना चाहिये ॥ १९४ ॥ अशुद्ध मनसिलके दोष । मनःशिला मन्दबलं च नूनं करोति जन्तोः शुभ- पाकहीना । मलन्तु बद्धं कुरुते च नूनं सशर्करं कृच्छ्रगदं करोति ॥ १९५ ॥ अशुद्ध मनसिल मनुष्यके बलको नष्ट करता है, मलको बद्ध, (कबजी) करता है, एवं शर्करा और मूत्रकृच्छ्र रोगको उत्पन्न करता है ॥ १९५ ॥ अश्मरीमूत्रहृद्रोगमशुद्धा कुरुते शिला । मन्दाग्निं मलदुष्टिं च शुद्धा सर्वरुजापहा ॥१९६॥ अशुद्ध मनसिल अश्मरी (पथरी) मूत्रकृच्छ्र हृद्रोग मंदाग्नि और मलको दूषित करता है और शुद्ध मनसिल संपूर्ण रोगोंको नाश करता है ॥ १९६ ॥ मनशिलशोधनविधि । जयन्तीभृङ्गराजोत्थै रक्तागस्त्यरसैः शिला।

( ५० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दोलायन्त्रे दिनं पाच्या यामं छागस्य मूत्रके । क्षालयेदारनालेन सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ १९७ ॥ जयंतीका रस या भांगरेका रस अथवा लाल फूलके अगस्तियेका रस लेकर उसमें दोलायंत्रकी विधिसे एक दिन स्वेदन करे । अथवा बकरेके मूत्रमें दोलायन्त्रकी विधिसे एक प्रहर पकावे फिर निकालकर कांजीसे धो डाले तो मनासिल शुद्ध होजाता है, इसका सब रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये ॥ १९७ ॥ मातुलुङ्गरसैः पिष्टा जयानीरैर्मनःशिला । शृङ्गवेररसैर्वापि विशुध्यति मनःशिला । अगस्त्यपत्रतोयेन भाविता सप्तवासरम् ॥ १९८ ॥ मनासिलको बिजौरेके रसमें और जयंतीके रसमें ( तीन २ दिन ) घोटता रहे । अथवा अदरखके रसमें ( सात दिन ) घोटे तो मनशिल शुद्ध होजाता है. अथवा अगस्त्यके फूलोंके रसमें सात भावना देवे तो मनशिल शुद्ध होता है ॥ १९८ ॥ मनशिलके गुण । कटुः स्निग्धा शिला तिक्ता कफघ्नी लेखनी सरा । भूतावेशभयं हन्ति कासश्वासहरा शुभा ॥ १९९ ॥ शुद्ध मनशिल--चरपरा, चिकना और कडवा है एवं कफनाशक, लेखन, दस्तावर, भूतावेशके भयको दूर करनेवाला, खांसीनाशक, श्वासरोगको हरनेवाला और शुभ है ॥ १९९ ॥ खपरिया शोधनविधि । पुष्पाणां रक्तपीतानां रसैः पिष्ट्वा च भावयेत् । नरमूत्रैश्च गोमूत्रैर्वाम्लैश्च ससैन्धवैः ॥ सप्ताहं त्रिदिनं वापि पश्चाच्छुद्ध्यति खर्परः ॥२००॥

भाषाटीकासहित । ( ५१ ) खपरियेको लाल और पीले वर्णके फूलोंके रसमें पीसकर भावना देवे, अथवा मनुष्यके मूत्रमें, गोमूत्रमें और सेंधानमक डाली हुई जवोंकी कांजीमें डोलायंत्रद्वारा सात २ दिन अथवा तीन २ दिन पकावे ( या इनमेंसे किसी एकमें ७ दिन दोलायंत्रमें पकावे ) फिर निकालकर गर्म पानीसे धो डाले तो खपरिया शुद्ध होजाता है ॥ २०० ॥ खर्परः परिसन्तप्तः सप्तवारान्निमज्जितः । निम्बुबीजरसे चान्तर्निर्मलत्वमवाप्नुयात् ॥ १ ॥ खपरियेको कोयलोंकी अग्निमें तपा तपा कर बिजौरे नींबूके रसमें सात वार बुझावे तो खपरिया शुद्ध होजाता है ॥ १ ॥ खपरियामारण । खर्परं पारदेनैव वालुकायन्त्रगं पचेत् । चूर्णयित्वा दिनं यावच्छोभनं भस्म जायते ॥ २ ॥ शुद्ध खपरियाको अग्निपर गरम कर उसमें पारा मिला खरलमें डाल खूब घोटे फिर शीशीमें डाल कपड़मिट्टी कर सुखाले. इस शीशीको वालुकायन्त्रमें रख आठ प्रहर ( या १२ प्रहर ) की अग्नि दे, शीतल होनेपर निकाल ले तो उत्तम भस्म होजायगी ॥ २ ॥ खर्परं लोहपात्रस्थं चूल्ह्यां दत्त्वा विपाचयेत् । गलिते सैन्धवं चूर्णं दत्त्वा दत्त्वा विमर्दयेत् ॥ भूयः पलाशदण्डेन यावद्भस्मीभवेत्तु तत् ॥ ३ ॥ खपरियेको लोहपात्र ( कड़ाही ) में रख चूल्हेपर चढ़ावे नीचे बेरीकी लकडीकी अग्नि जलावे, जब खपरिया गल जावे तो उसमें सैन्धव नमकका चूर्ण बार २ डालकर पलाशके डंडेसे तबतक रगड़ता रहे जबतक खर्परकी भस्म न होजावे ॥ ३ ॥ खपरियेके गुण । नेत्ररोगहरः क्लेदी क्षयहा खर्परो गुरुः ॥ ४ ॥

( ५२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । खपरिया नेत्ररोगनाशक, छेदी, क्षयरोगनाशक और भारी है ॥ ४ ॥ इति खर्परविधान । तुत्थ ( नीलाथोथे ) के नाम । तुत्थकं तु शिखिग्रीवं हेमसारं मयूरकम् ॥ ५ ॥ तुत्थ ( तुत्थक, तूतिया, सस्यक ) शिखिग्रीव, हेमसार, ( ताम्रो- पधातु ) और मयूरक यह नीलाथोथेके नाम हैं ॥ ५ ॥ तूतियाशोधनमारण । विष्ठया मर्दयेत्तुत्थं मार्जारककपोतयोः । दशांशं टंकणं दत्त्वा पाच्यं मृदुपुटे ततः। पुटं दद्यात्पटुक्षौद्रैः किल तुत्थविशुद्धये ॥ ६ ॥ तूतियेको बिल्ली और कबूतरकी विष्ठामें खरल करके तूतियेसे दशवां भाग सुहागा मिलाकर शराव संपुटमें रख कपड़मिट्टीकर सुखा ले फिर जंगली उपलोंकी हलकीसी पुट देवे । फिर निकाल कर चतुर्थांश नमक और किंचित् शहदके साथ घोटकर हलकी पुट देवे ( कोई " पुटं दध्ना पुटं क्षौद्रैः " दहीमें एक पुट शहदमें एक पुट देवे ऐसा लिखते हैं ) तो तूतिया अवश्य शुद्ध होजाता है ॥ ६ ॥ ओतोर्विष्ठासमं तुत्थं सक्षौद्रं टंकणांघ्रियुक । त्रिधा संपुटितं शुद्धं वान्तिभ्रान्तिविवर्जितम् ॥ ७ ॥ दूसरी विधि-नीलेथोथेके समानभाग बिल्लीकी विष्ठा और शहदमें चतुर्थांश सुहागा मिलाकर खरल करे और शराव संपुटकर मृदुपुटकी आंच देवे, इसप्रकार तीन पुटें देनेसे वमन और भ्रांति दोषसे रहित शुद्ध तुत्थ भस्म तैयार होजाता है ॥ ७ ॥ १ तुत्थ ( तूतिया ) तांबेका उपधातु हैं । खपरिया-जिस्तका उपधातु है, खपरियाके अभावमें जिस्तकी भस्म लेवे ।

भाषाटीकासहित । ( ५३ ) गन्धकेन समं तुत्थं तुत्थार्द्धेनार्द्धयामकम् । वान्तिभ्रान्ती यदा न स्तस्तदा सिद्धिं विनिर्दिशेत्॥८॥ तीसरी विधि—नीलेथोथेसे आधा भाग गंधक मिला दोनोंको आधा प्रहर ( नींबूके रसमें ) मर्दन करे फिर संपुटमें रख कपडमिट्टी कर सुखा ले इस संपुटको लघुपुटमें फूंक दे फिर आधा भाग गंधक मिला आधा प्रहर रगड़कर पूर्ववत् संपुट बना लघुपुटमें फूंके ऐसे तीन पुट देवे तो वान्ति और भ्रांति आदि दोष रहित शुद्ध तुत्थ होजावेगा ॥ ८ ॥ तुत्थं सकटुकक्षारं कषायं विशदं लघु । लेखनं भेदि चक्षुष्यं कण्डूक्रिमिविषापहम् ॥ ९ ॥ तूतिया-कटु, क्षार, कषाय रसवाला है तथा विशद, हलका, लेखन, भेदी और नेत्ररोगनाशक है, एवं कण्डुनाशक, क्रिमियोंको हरनेवाला और विषको दूर करनेवाला है ॥ ९ ॥ विमल शोधन । मूत्रारनालतैलेषु गोदुग्धे कदलीरसे । कौलत्थे कोद्रवक्वाथे माक्षिकं विमलं तथा ॥ २१० ॥ मुहुः शूरणकन्दस्थं स्वेदयेद्वरवर्णिनि ॥ ११ ॥ क्षाराम्ललवणैश्चैव तैलसर्पिःसमन्वितम् । पुटत्रयं प्रदातव्यं ततस्तु शोधितं भवेत् ॥ १२ ॥ विमल ( रूपामाक्खी ) या सोनामाक्खीको जिमीकंदमें रखकर गोमूत्र, कांजी, तिलतैल, गोदुग्ध, केलेका रस, कुलथीका काढ़ा और कोदोंका काढ़ा इनमें दोलायंत्र द्वारा बार २ अलग २ स्वेदन करे तो रूपामाक्षिक और स्वर्णमाक्षिक शुद्ध होजायेंगे । अथवा सुहागा, बिजौ- रेका रस, सेंधानमक, तिलतैल और घृत मिलाकर मर्दन करे फिर लघु- पुटमें फूंकदे इस प्रकार सुहागा आदिमें तीन बार खरलकर तीन पुट

( ५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । देवे तो विमल ( रूपामक्खी ) और सोनामक्खी शुद्ध होजाते हैं ( कोई इसीको विमलभस्म मानते हैं ) ॥ २१०-२१२ ॥ जम्बीरस्य रसैः स्विन्ने मेषशृङ्गीरसैस्तथा । रम्भातोयेन वा पाच्यं घस्रं विमलशुद्धये ॥ १३ ॥ अन्यप्रकारसे शोधन-जम्बीरी नींबूके रसमें और मेढासिंगीके रसमें एवं केलाकंदके रसमें दोलायंत्रद्वारा एक दिन स्वेदन करे तो विमल ( रूपामक्खी ) शुद्ध होजाता है ॥ १३ ॥ सोनामक्खीके नाम । माक्षिके धातुमाक्षीकं तप्तस्तापिसमुद्भवम् । गारुडो माक्षिकः पक्षी बृहद्वर्ण इति स्मृतः ॥ १४ ॥ धातुमाक्षिक, तप्त, तापिसमुद्भव, गारुड, माक्षिक, पक्षी और बृहद्वर्ण यह सोनामक्खीके नाम हैं ॥ १४ ॥ उत्तम सुवर्णमक्खी । भंगे सुवर्णसंकाशो मनाक्कृष्णच्छविर्बहिः । बृहद्वर्ण इति ख्यातो माक्षिकः श्रेष्ठ उच्यते ॥ १५ ॥ जो सोनामक्खी तोड़नेसे भीतरसे सुवर्णके समान वर्णवाली हो और ऊपरसे किंचित् कृष्णवर्ण हो उस सोनामक्खीको बृहद्वर्ण कहते हैं, यह माक्षिक औषधिकर्ममें श्रेष्ठ कही है ॥ १५ ॥ अशुद्ध सोनामक्खीके दोष । मंदाग्निं बलहानिं च व्रणं विष्टम्भगात्ररुक् । कुरुते माक्षिको मृत्युमशुद्धो नात्र संशयः ॥ १६ ॥ बिना शुद्ध सोनामक्खी मंदाग्निकारक, बलनाशक, व्रणकारक, विष्टम्भ ( कबजी ) करनेवाली और अंगोंमें पीड़ा करनेवाली है एवं मृत्युको भी करनेवाली है इसमें सन्देह नहीं ॥ १६ ॥

भाषाटीकासहित । (५५) सोनामक्खी शोधन । स्वर्णमाक्षिकचूर्णन्तु वस्त्रे बद्ध्वा विपाचयेत् । कालमारिषशालिञ्च क्वाथे दोलाविधानतः । तदधः पतितं शस्तमेवं शुद्ध्यति माक्षिकम् ॥ १७ ॥ सोनामक्खीको कूटकर एक वस्त्रमें पोटली बांधे इस पोटलीको डोरेमें बांध दोलायंत्रविधिसे कालमारिष ( मरसा शाक, कञ्चटशाक जलके किनारे होनेवाली जलचौलाई ) के स्वरस और शालिशाक ( शांतिशाक ) के क्वाथमें पकावे पकते २ इस पोटलीमेंसे छनकर जो बारीक २ सोनामक्खी पात्रमें गिर जायगी वही शुद्ध सोनामक्खी जाननी, यह सब काममें लेने योग्य श्रेष्ठ है ॥ १७ ॥ माक्षिकस्य त्रयो भागा भागैकं सैन्धवस्य च । मातुलुङ्गद्रवैर्वाथ जम्बीरोत्थद्रवैः पचेत् ॥१८॥ लोहपात्रे पचेत्तावल्लोहदर्य्या च चालयेत् । भासवर्णमयो यावत्तावच्छुद्ध्यति माक्षिकम् ॥१९॥ सोनामक्खी तीन भाग और सेंधानमक एक भाग इन दोनोंको पीसकर लोहेकी कडाहीमें डाल चूल्हेपर चढ़ावे नीचे अग्नि जलावे और कड़ाहीमें बिजौरे नींबूका रस या जम्भीरी नींबूका रस डालता जावे तथा कड़छीसे सोनामक्खीको चलाता रहे जब कड़ाही और सोना- मक्खी लालवर्ण होजाय तो अग्नि बुझा दे, शीतल होनेपर सोनामक्खी- को निकाल ले यह शुद्ध माक्षिक जानना ॥ १८ ॥ १९ ॥ माक्षिकभस्मविधि । माक्षिकस्य चतुर्थांशं गन्धं दत्त्वा विमर्दयेत् । उरुबूकस्य तैलेन ततः कुर्य्याच्च चक्रिकाम् ॥२०॥ शरावसंपुटे कृत्वा पुटेद्गजपुटेन तु । सिन्दूराभं भवेद्भस्म माक्षिकस्य न संशयः ॥ २१ ॥

( ५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सोनामक्खी ४ भाग, शुद्ध गंधक एक भाग इन दोनोंको खरल करे फिर एरण्डका तेल मिलाकर गोल२टिकिया बनाले, इन टिकियाओंको शरावसंपुटमें बंद कर कपड़मिट्टी कर सुखा ले फिर गजपुटमें रख फूंकदे स्वांगशीतल होनेपर निकाले तो निःसन्देह सिंदूरके समान लाल वर्णकी उत्तम भस्म बन जायेगी ॥ २२० ॥ २१ ॥ सोनामक्खीके गुण । माक्षिकं तिक्तमधुरं मेहार्शःकृमिकुष्ठनुत् । कफपित्तहरं बल्यं योगवाहि रसायनम् ॥ २२ ॥ सोनामक्खी-कडवी, मीठी तथा प्रमेह, अर्श, क्रिमि और कुष्ठ को नाश करती है । कफनाशक, पित्तनाशक, बलवर्द्धक, योगवाही और रसायन है ॥ २२ ॥ अथ काशीसशोधन । काशीशे धातुकाशीशं खेचरं दन्तरञ्जनम् । सकृद्भृङ्गाम्बुना स्विन्नं काशीशं निर्मलं भवेत्॥२३॥ काशीश, धातुकाशीश, खेचर, दन्तरञ्जन, ( कासीस हीराक्सीस ) यह काशीसके पर्याय ( नाम ) हैं । ( काशीस दो प्रकारका होता है- एक धातुकाशीस, दूसरा पुष्पकाशीस. इनमें धातुकाशीस हरे या लाल अथवा पीलेसे वर्णका होता है और पुष्पकाशीस सफेद वर्णका होता है ) काशीसको भांगरेके रसमें एक बार स्वेदन करनेसे ही शुद्ध होजाता है ॥ २३ ॥ काशीसके गुण । कांशीशं निर्मलं स्निग्धं चित्तनेत्ररुजापहम् । पित्तापस्मारशमनं रसवद्गुणकारकम् ॥ २४ ॥ काशीस-निर्मल है, स्निग्ध है, चित्तविकारनाशक, नेत्ररोग- हर, पित्तनाशक, अपस्मारको शमन करनेवाला और पारेके समान गुणकारी है ॥ २४ ॥

भाषाटीकासहित । ( ५७ ) कान्तपाषाणके पर्याय । राजपट्टं महापट्टं शिखिग्रीवं विराटकम् ॥ राजपट्ट, महापट्ट, शिखिग्रीव और विराटक यह कान्तपाषाणके नाम हैं ॥ कांतपाषाणका शोधन । चूर्णितं कान्तपाषाणं महिषीक्षीरसंयुतम् । विपचेदायसे पात्रे गोघृतेन समन्वितम् ॥ २५ ॥ लवणे च तथा क्षारे शोभाञ्जनरसे क्षिपेत् । अम्लवर्गस्य तोयेन दिनं घर्मे विभावयेत् ॥ २६ ॥ तथैव दोलिकायन्त्रे दिवसं पाचयेत्सुधीः । कांतपाषाणशुद्धौ तु रसकर्म समाचरेत् ॥ २७ ॥ कांतपाषाणको कूटकर भैंसके दूध और गोघृतमें दोलायन्त्र विधिसे लोहेके पात्रमें पकावे फिर नमक जौखार और सुहांजनेके रस ( क्वाथ ) में स्वेदन करे । तदनन्तर अम्लवर्गके पानीमें एक दिन भिगोकर धूपमें रक्खे, फिर दोलायन्त्र द्वारा अम्लवर्गमें एक दिन पकानेसे कांतपाषाण शुद्ध और रसकर्मके योग्य हो जायेगा ॥ २५–२७ ॥ इति कांत- पाषाण शोधन ॥ कौड़ीके भेद । पीताभा ग्रन्थिला पृष्ठे दीर्घवृन्दा वराटिका । सार्द्धनिष्कभरा श्रेष्ठा निष्कभारा च मध्यमा॥२८॥ पादोनानिष्कभारा च कनिष्ठा परिकीर्तिता । रसवैद्यविनिर्दिष्टा सा वराटकसंज्ञिका ॥ २९ ॥ जो कौड़ी पीले वर्णकी पीठपरसे गांठदारसी लंबी और गोल हो तोलमें डेढ़ टंक ( ६ मासे ) हो वह रसवैद्योंने श्रेष्ठ वराटिका कही

( ५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । है। जो कौड़ी तोलमें एक टंककी हो वह मध्यम है। जो पौनटंक ( ३ मासे ) तोलमें हो वह कौड़ी कनिष्ठा कही है। इसको वराटक भी कहते हैं ॥ २८ ॥ २९ ॥ कौड़ियोंका शोधन । वराटी काञ्जिके स्विन्ना यामाच्छुद्धिमवाप्नुयात् २३० कौड़ियोंको कांजीमें दोलायंत्र द्वारा एक प्रहर स्वेदन करे तो शुद्ध होजाती है ॥ २३० ॥ कौड़ियोंकी भस्मविधि । भूगर्ते च समे शुद्धे पोटलीं स्थापयेत्सुधीः । तुषेण पूरयेत्तस्याः किञ्चिन्मध्यं भिषग्वरः ॥ ३१ ॥ वराटपूरितां मूषां तन्मध्ये विनिवेशयेत् । करीषाग्निं ततो दद्यात्पालिकायन्त्रमुत्तमम् । अनेन म्रियते नूनं वराटं सर्वरोगजित् ॥ ३२ ॥ कौड़ियोंका कपड़ेमें पोटली बांध पृथ्वीमें गढा खोदकर उस गढेको स्वच्छ बना उसमें जंगली उपले और तुष भर बीचमें कौड़ियोंवाली पोटली सरावमें रखकर गजपुट विधानसे फूंक दे । अथवा ( “ चषकं वर्त्तुलं लौहं विनताग्रोर्ध्वदण्डकम् । एतद्धि पालिकायंत्रं वह्नि- जारणहेतवे॥ १॥ ” एक लोहेका प्यालासा गोल बनाकर उसमें ऊपरसे मुड़ी हुई एक लंबी डंडी लगावे जैसे माठमेंसे तेल निकालनेके लिये दुकानदार पली रखते हैं ऐसा बनावे इसको पालिकायंत्र कहते हैं इसमें कौडियें और तुष भरकर उपलोंकी आगमें फूके तो कौड़ियोंकी भस्म होजायगी) यह भस्म संपूर्ण रोगोंको जीतनेवाली उत्तम है ॥ ३१॥३२॥ वराटिकाभस्मके गुण । परिणामादिशूलघ्नी क्षयहा ग्रहणीहरा । कटूष्णा दीपनी वृष्या तिक्ता वातकफापहा ॥ ३३॥

भाषाटीकासहित । ( ५९ ) वराटिकाभस्म परिणामशूल आदि संपूर्ण शूलोंका नाश करती है तथा क्षयरोगनाशक, ग्रहणीरोगको हरनेवाली, कटु, उष्ण, दीपनी, वृष्य, तिक्त और वातकफनाशक है ॥ ३३ ॥ नीलांजन शोधन । नीलाञ्जनं चूर्णयित्वा जम्बीरद्रवभावितम् । दिनैकमातपे शुद्धं भवेत्कार्येषु योजयेत् ॥ ३४ ॥ सुरमेंको चूर्णकर नींबूके रसमें एक दिन भावना देकर धूपमें सुखा ले तो सुरमा शुद्ध होजाता है इसको जिस कार्यमें लेना हो उसमें प्रयोग करे ॥ ३४ ॥ अथ हिंगुलप्रकरण । सिंगरफके पर्याय । हिंगुलो हिंगुलुर्यातिर्दरदः शुकतुण्डकः । रसगन्धकसम्भूतो हिङ्गलो दैत्यरक्तकः ॥ ३५ ॥ हिंगुल, हिंगुलु, याति, दरद, शुकतुण्ड, रसगंधकसम्भूत, हिङ्गुल, दत्यरक्तक ( रसगर्भ, कपिशीर्षक, मनोहर ) यह सिंगरफके नाम हैं ॥ ३५ ॥ हिंगुलशोधनविधि । अम्लवर्गद्रवैः पिष्ट्वा दरदो माहिषेण च । दुग्धेन सप्तधा पिष्टः शुष्कीभूतो विशुद्धयति ॥३६॥ सिंगरफको अम्लवर्गके रसमें पीस २ कर सात भावना देवे और भैंसके दूधमें सात भावना देकर सुखा लेनेसे सिंगरफ शुद्ध होजाता है ३६॥ मेषीदुग्धेन दरदमम्लवर्गैर्विभावितम् । सप्तवारं प्रयत्नेन शुद्धिमायाति निश्चितम् ॥ ३७ ॥

( ६० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । दूसरी विधि-सिंगरफको भेडके दूधमें सात भावना देकर सुखा ले फिर नींबू आदि अम्ल वर्गके रसमें सात भावना देकर सुखा ले तो सिंगरफ निश्चय ही शुद्ध होजाता है ॥ ३७ ॥ दरदं दोलिकायन्त्रे पक्वं जंबीरजैर्द्रवैः । सप्तवारमजामूत्रैर्भावितं शुद्धिमेति हि ॥ ३८ ॥ तीसरी विधि-सिंगरफके टुकड़ोंको कपडेमें बांध दोलायंत्रद्वारा जंबीरीके रसमें एक दिन पकावे फिर निकालकर बकरीके मूत्रमें सात भावना देवे ( रगड़कर सुखावे ) तो शुद्धताको प्राप्त हो निर्दोष होजाता है ॥ ३८ ॥ आर्द्रकैलकुचद्रावैः सप्तधा भावितो यदि । हिंगुलः शुद्धतां याति निर्दोषो जायते खलु ॥ ३९ ॥ चौथी विधि-सिंगरफको अदरखके रसमें और लकुच ( बडहर ) के रसमें सात भावना देनेसे शुद्धताको प्राप्त हो निश्चय ही निर्दोष होजाता है ॥ ३९ ॥ हिंगुलके लक्षण और गुण । बिम्ब्याभं हिंगुलं दिव्यं रसगन्धकसम्भवम् । मेहकुष्ठहरं रुच्यं बल्यं मेधाग्निवर्धनम् ॥ २४० ॥ जो हिंगुल ( सिंगरफ ) बिम्बी ( कंदूरी ) फलके समान लाल- वर्णवाला होता है वह दिव्य गुणोंवाला है, पारे गंधकके संयोगसे उत्पन्न होता है। यह प्रमेहनाशक, कुष्ठको हरनेवाला, रुचिकारक, बलवर्धक, मेधाजनक और जठराग्निको दीपन करनेवाला है ॥ २४० ॥ शिलाजीतके नाम । शिलाजतुनि शैलेयमद्र्यं गिरिजमश्मजम् । धातुजं चाश्मजतुकं शैलजं चाश्मसम्भवम् ॥ ४१ ॥

भाषाटीकासहित । ( ६१ ) शिलाजतु, शैलेय, अद्र्य, गिरिज, अश्मज, धातुज, अश्मजतु, शैलज और अश्मसंभव यह नाम शिलाजीतके हैं ॥ ४१ ॥ शिलाजीतका शोधन । गोदुग्धे त्रिफलाभृङ्गद्रवैः पिष्टं शिलाजतु । दिनैकं लौहजे पात्रे शुद्धिमायात्यसंशयम् ॥ ४२ ॥ शिलाजीतको कूटकर लोहेकी कडाहीमें डाल उसमें गोदुग्ध, त्रिफ- लेका क्वाथ और भांगरेका रस डालकर एक दिन रक्खा रहने दे फिर अग्निपर उबाल देकर तीक्ष्ण धूपमें रख दे, इसके ऊपर जो मलाईके समान गाढ़ा २ पदार्थ हो उसको उतारकर ( गर्दैसे बचाकर ) सुखा ले तो शिलाजीत निःसन्देह उत्तम शुद्ध हो जायगी ॥ ४२ ॥ शिलाजीतके गुण । शिलाजतु भवेत्तिक्तं कटुकञ्च रसायनम् । क्षयशोथोदरार्शांसि हंति वस्तिरुजां जयेत् ॥४३॥ शिलाजीत-रसमें तिक्त और कटु है । गुणमें रसायन ( सर्वरोग- नाशक आयुर्वर्द्धक ) तथा क्षयरोग, शोथरोग, उदररोग, बवासीर इन सबको नष्ट करनेवाली है एवं मूत्राशयके प्रमेह कृच्छ्रादि संपूर्ण रोगोंको जीतनेवाली है ॥ ४३ ॥ सौवीरादिकोंकी साधारण शुद्धि । सौवीरं टंकणं शंखं कंकुष्ठं गैरिकं तथा । एते वराटवच्छोध्या भवेयुर्दोषवर्जिताः ॥ ४४ ॥ सुरमा, सुहागा, शंख, कंकुष्ठ ( मुरदासिंगके समान पदार्थ ), गेरू इनमेंसे जिसको शुद्ध करना हो उसको कांजीमें स्वेदन कर ले तो शुद्ध होजाता है ॥ ४४ ॥ १ कोई कंकुष्ठको मुर्दासिंग मानते हैं, रसरत्नसमुच्चयकारने दोनाको भिन्न भिन्न पदार्थ माना है । वर्णमें कंकुष्ठ और मुर्दासिंग पीलेसे होते हैं, कंकुष्ठ वंगका मल होता है !