रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 77, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ५१ ) खपरियेको लाल और पीले वर्णके फूलोंके रसमें पीसकर भावना देवे, अथवा मनुष्यके मूत्रमें, गोमूत्रमें और सेंधानमक डाली हुई जवोंकी कांजीमें डोलायंत्रद्वारा सात २ दिन अथवा तीन २ दिन पकावे ( या इनमेंसे किसी एकमें ७ दिन दोलायंत्रमें पकावे ) फिर निकालकर गर्म पानीसे धो डाले तो खपरिया शुद्ध होजाता है ॥ २०० ॥ खर्परः परिसन्तप्तः सप्तवारान्निमज्जितः । निम्बुबीजरसे चान्तर्निर्मलत्वमवाप्नुयात् ॥ १ ॥ खपरियेको कोयलोंकी अग्निमें तपा तपा कर बिजौरे नींबूके रसमें सात वार बुझावे तो खपरिया शुद्ध होजाता है ॥ १ ॥ खपरियामारण । खर्परं पारदेनैव वालुकायन्त्रगं पचेत् । चूर्णयित्वा दिनं यावच्छोभनं भस्म जायते ॥ २ ॥ शुद्ध खपरियाको अग्निपर गरम कर उसमें पारा मिला खरलमें डाल खूब घोटे फिर शीशीमें डाल कपड़मिट्टी कर सुखाले. इस शीशीको वालुकायन्त्रमें रख आठ प्रहर ( या १२ प्रहर ) की अग्नि दे, शीतल होनेपर निकाल ले तो उत्तम भस्म होजायगी ॥ २ ॥ खर्परं लोहपात्रस्थं चूल्ह्यां दत्त्वा विपाचयेत् । गलिते सैन्धवं चूर्णं दत्त्वा दत्त्वा विमर्दयेत् ॥ भूयः पलाशदण्डेन यावद्भस्मीभवेत्तु तत् ॥ ३ ॥ खपरियेको लोहपात्र ( कड़ाही ) में रख चूल्हेपर चढ़ावे नीचे बेरीकी लकडीकी अग्नि जलावे, जब खपरिया गल जावे तो उसमें सैन्धव नमकका चूर्ण बार २ डालकर पलाशके डंडेसे तबतक रगड़ता रहे जबतक खर्परकी भस्म न होजावे ॥ ३ ॥ खपरियेके गुण । नेत्ररोगहरः क्लेदी क्षयहा खर्परो गुरुः ॥ ४ ॥