भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ४४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अशुद्ध हरिताल आयुका नाश करती है, कफ वायु और प्रमेहको उत्पन्न करती है । एवं ताप, फोडे और अंगोंका संकोच करती है इसलिये हरितालका शोधन कर लेना चाहिये ॥ १७१ ॥ हरितालशोधन विधि । शुद्धं स्यात्तालकं स्विन्नं कूष्माण्डसलिले ततः । चूर्णोदके पृथक् तैले तस्मिन् पूते न दोषकृत् ॥१७२॥ हरितालको लेकर वस्त्रमें पोटली बांध दोलायंत्रद्वारा पेठेके रसमें १ प्रहर स्वेदन करे फिर चूनेके पानीमें इसी प्रकार स्वेदन करे एवं तिलोंके तेलमें मंद अग्निसे १ प्रहर स्वेदन करे तो हरिताल शुद्ध होजाती है और कोई दोष नहीं करती ॥ १७२ ॥ शोधनेकी दूसरी विधि । तालकं कणशः कृत्वा दशांशेन च टङ्कणम् । जम्बीरोत्थैर्द्रवैः क्षाल्यं काञ्जिकैः क्षालयेत्पुनः ॥१७३॥ वस्त्रे चतुर्गुणे बद्ध्वा दोलायन्त्रे दिनं पचेत् । तच्चूर्ण्य आरनालेन दिनं कूष्माण्डजै रसैः । वेद्यं वा शाल्मलीतोयैस्तालकं शुद्धिमाप्नुयात् ॥१७४॥ हरितालको दश भाग ले सुहागेका चूर्ण एक भाग मिलावे इन दोनोंको नींबूके रसमें खूब धोवे, फिर कांजीमें धोवे फिर हरि- तालका चूर्ण कर इसकी चौतहे वस्त्रमें पोटली बांध दोलायन्त्रद्वारा कांजीमें १२ घंटे स्वेदन करे । फिर पेठेके रसमें इसी प्रकार १२ घंटे दोलायन्त्रमें स्वेदन करे अथवा सेमलके रस ( क्वाथ ) में १२ घंटे स्वेदन करे तो हरिताल शुद्ध होजाती है ॥ १७३ ॥ १७४ ॥ तीसरी विधि । तालकं पोटलीं बद्ध्वा सचूर्णे काञ्जिके पचेत् । दोलयन्त्रेण यामैकं ततः कूष्माण्डजे रसे ॥१७५॥

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