रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (४५) तिलतैले पचेद्यामं यामं तत्रैफले जले । दोलायन्त्रे चतुर्यामं पाच्यं शुद्ध्यति तालकम् ॥ १७६॥ हरितालको एक पोटलीमें बांध सीपीके चूनेयुक्त कांजीमें दोलायंत्र- द्वारा एक प्रहर पकावे, फिर पेठेके रसमें एक प्रहर पकावे। एवं तिलोंके तेलमें और त्रिफलेके काथमें एक एक प्रहर पकावे इस प्रकार इन चारों द्रव्योंमें चार प्रहर अर्थात् प्रत्येक द्रव्यमें एक एक प्रहर पकानेसे हरि- ताल शुद्ध होजाती है ॥ १७५ ॥ १७६ ॥ इति हरितालशोधनविधि ॥ १ हरितालमारण विधि । तालकं कणशः कृत्वा सुशुद्धं हण्डिकान्तरे । चूर्णोदकेन सम्पिष्टमपामार्गजतोद्भवैः ॥ १७७ ॥ क्षारोदकैश्च संपिष्टमूर्ध्वाधो यावशूकजम् । चूर्णं दत्त्वा निरुध्याथ कूष्माण्डैश्च प्रपूरयेत् ॥ १७८॥ पुनर्मुखं निरुध्याथ चतुर्यामं क्रमाग्निना । पचेदेवं हि तच्चूर्णं कुष्ठादौ परियोजयेत् ॥ १७९॥ विशुद्ध हरितालके टुकडोंको चूनेके पानीमें घोटना, सूखनेपर उसे फिर अपामार्ग ( ओंगा वा चिरचिटा ) के मूलकाष्ठसे बनाये गये क्षारसे मिले हुए पानीमें मर्दन करना । फिर इस पिष्टीका एक गोल चक्राकार चपटा पिण्ड बना उत्तम हांडीमें रखना, हरितालके ऊपर और नीचे शुद्ध यवक्षारका चूर्ण बिछा एक शरावसे हांडीके मध्य स्थित हरता- लको ढांककर उत्तम रीतिसे बन्द करना, बदरी पल्लवकल्क आदिसे संधि- रोध करना अन्यथा उड़ जानेका भय है । इसके अनन्तर कूष्माण्ड ( पेठा वा कोहला ) के खण्डोंसे उस हांडीको पूर्ण कर देना और हांडीके मुखको शरावसे ढककर कपड़मिट्टी कर सुखा लेना और चार प्रहर तक मन्द, मध्य एवं तीक्ष्ण अग्निका आंच देना । इससे हरताल ३