भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( ४६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हांडीके मध्य स्थित शरावपर जो लगेगा इस शरावसंलग्न कुन्द पुष्पके समान प्रकाशमान श्वेत चूर्णको युक्तिसे लेना, यही श्वेतवर्ण हरिताल भस्म है। इसे कुष्ठादि महाव्याधियोंमें प्रयुक्त करना चाहिये ॥ १७७-१७९॥ २ प्रकारान्तरसे मारण । पलमेकं शुद्धतालं कुमारीरसमर्दितम् । शरावसम्पुटे रुद्धं यामद्वादशकं पचेत् ॥ १८० ॥ स्वाङ्गशीतं समादाय तालकं तु मृतं भवेत् । गलत्कुष्ठं हरेच्चैत्तत्तालकं स्यान्मृतं यदा ॥ १८१ ॥ एक पल शुद्ध हरतालको घीकारके रसमें घोट पीस शराव सम्पुटमें बन्दकर बारह प्रहर अग्निमें पकावे, स्वांगशीतल होजानेपर निकाले । जब हरताल भलीभांति मारा जाय तो यह गलत्कुष्ठको नष्ट करता है ॥ १८० ॥ १८१ ॥ ३ अन्य मारणविधि । अम्लरोलीजलैर्भाव्यं तालं द्वादशयामकम् । तथैव निम्बुनीरेण ततश्चूर्णोदकेन च॥ १८२॥ प्रक्षाल्य शाल्मलीक्षारैर्द्विगुणैः खातमध्यगम् । विधाय कवचीयन्त्रं वालुकाभिः प्रपूरयेत् ॥ १८३॥ द्वादशप्रहरं पक्त्वा स्वाङ्गशीतञ्च चूर्णयेत् । खादयेद्रक्तिकामेकां कुष्ठश्लीपदशान्तये ॥ १८४ ॥ शुद्ध हरितालको चांगेरीकेरसमें १२ प्रहर भावना देवे फिर नींबूके रसमें १२ प्रहर भावना देवे तदनंतर चूनेके पानीमें १२ प्रहर भावना देवे फिर इसको पानीसे धोकर सुखा ले। नदनंतर एक आतशी शीशीमें हरितालसे दूना सींवल ( सेमल ) का खार ले आधा हरितालके नीचे आधा ऊपर डाल दो सरावों में बंदकर कपडमिट्टी करके सुखाले, फिर