भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ५८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । है। जो कौड़ी तोलमें एक टंककी हो वह मध्यम है। जो पौनटंक ( ३ मासे ) तोलमें हो वह कौड़ी कनिष्ठा कही है। इसको वराटक भी कहते हैं ॥ २८ ॥ २९ ॥ कौड़ियोंका शोधन । वराटी काञ्जिके स्विन्ना यामाच्छुद्धिमवाप्नुयात् २३० कौड़ियोंको कांजीमें दोलायंत्र द्वारा एक प्रहर स्वेदन करे तो शुद्ध होजाती है ॥ २३० ॥ कौड़ियोंकी भस्मविधि । भूगर्ते च समे शुद्धे पोटलीं स्थापयेत्सुधीः । तुषेण पूरयेत्तस्याः किञ्चिन्मध्यं भिषग्वरः ॥ ३१ ॥ वराटपूरितां मूषां तन्मध्ये विनिवेशयेत् । करीषाग्निं ततो दद्यात्पालिकायन्त्रमुत्तमम् । अनेन म्रियते नूनं वराटं सर्वरोगजित् ॥ ३२ ॥ कौड़ियोंका कपड़ेमें पोटली बांध पृथ्वीमें गढा खोदकर उस गढेको स्वच्छ बना उसमें जंगली उपले और तुष भर बीचमें कौड़ियोंवाली पोटली सरावमें रखकर गजपुट विधानसे फूंक दे । अथवा ( “ चषकं वर्त्तुलं लौहं विनताग्रोर्ध्वदण्डकम् । एतद्धि पालिकायंत्रं वह्नि- जारणहेतवे॥ १॥ ” एक लोहेका प्यालासा गोल बनाकर उसमें ऊपरसे मुड़ी हुई एक लंबी डंडी लगावे जैसे माठमेंसे तेल निकालनेके लिये दुकानदार पली रखते हैं ऐसा बनावे इसको पालिकायंत्र कहते हैं इसमें कौडियें और तुष भरकर उपलोंकी आगमें फूके तो कौड़ियोंकी भस्म होजायगी) यह भस्म संपूर्ण रोगोंको जीतनेवाली उत्तम है ॥ ३१॥३२॥ वराटिकाभस्मके गुण । परिणामादिशूलघ्नी क्षयहा ग्रहणीहरा । कटूष्णा दीपनी वृष्या तिक्ता वातकफापहा ॥ ३३॥

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