भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 83

भाषाटीकासहित । ( ५७ ) कान्तपाषाणके पर्याय । राजपट्टं महापट्टं शिखिग्रीवं विराटकम् ॥ राजपट्ट, महापट्ट, शिखिग्रीव और विराटक यह कान्तपाषाणके नाम हैं ॥ कांतपाषाणका शोधन । चूर्णितं कान्तपाषाणं महिषीक्षीरसंयुतम् । विपचेदायसे पात्रे गोघृतेन समन्वितम् ॥ २५ ॥ लवणे च तथा क्षारे शोभाञ्जनरसे क्षिपेत् । अम्लवर्गस्य तोयेन दिनं घर्मे विभावयेत् ॥ २६ ॥ तथैव दोलिकायन्त्रे दिवसं पाचयेत्सुधीः । कांतपाषाणशुद्धौ तु रसकर्म समाचरेत् ॥ २७ ॥ कांतपाषाणको कूटकर भैंसके दूध और गोघृतमें दोलायन्त्र विधिसे लोहेके पात्रमें पकावे फिर नमक जौखार और सुहांजनेके रस ( क्वाथ ) में स्वेदन करे । तदनन्तर अम्लवर्गके पानीमें एक दिन भिगोकर धूपमें रक्खे, फिर दोलायन्त्र द्वारा अम्लवर्गमें एक दिन पकानेसे कांतपाषाण शुद्ध और रसकर्मके योग्य हो जायेगा ॥ २५–२७ ॥ इति कांत- पाषाण शोधन ॥ कौड़ीके भेद । पीताभा ग्रन्थिला पृष्ठे दीर्घवृन्दा वराटिका । सार्द्धनिष्कभरा श्रेष्ठा निष्कभारा च मध्यमा॥२८॥ पादोनानिष्कभारा च कनिष्ठा परिकीर्तिता । रसवैद्यविनिर्दिष्टा सा वराटकसंज्ञिका ॥ २९ ॥ जो कौड़ी पीले वर्णकी पीठपरसे गांठदारसी लंबी और गोल हो तोलमें डेढ़ टंक ( ६ मासे ) हो वह रसवैद्योंने श्रेष्ठ वराटिका कही