रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । सोनामक्खी ४ भाग, शुद्ध गंधक एक भाग इन दोनोंको खरल करे फिर एरण्डका तेल मिलाकर गोल२टिकिया बनाले, इन टिकियाओंको शरावसंपुटमें बंद कर कपड़मिट्टी कर सुखा ले फिर गजपुटमें रख फूंकदे स्वांगशीतल होनेपर निकाले तो निःसन्देह सिंदूरके समान लाल वर्णकी उत्तम भस्म बन जायेगी ॥ २२० ॥ २१ ॥ सोनामक्खीके गुण । माक्षिकं तिक्तमधुरं मेहार्शःकृमिकुष्ठनुत् । कफपित्तहरं बल्यं योगवाहि रसायनम् ॥ २२ ॥ सोनामक्खी-कडवी, मीठी तथा प्रमेह, अर्श, क्रिमि और कुष्ठ को नाश करती है । कफनाशक, पित्तनाशक, बलवर्द्धक, योगवाही और रसायन है ॥ २२ ॥ अथ काशीसशोधन । काशीशे धातुकाशीशं खेचरं दन्तरञ्जनम् । सकृद्भृङ्गाम्बुना स्विन्नं काशीशं निर्मलं भवेत्॥२३॥ काशीश, धातुकाशीश, खेचर, दन्तरञ्जन, ( कासीस हीराक्सीस ) यह काशीसके पर्याय ( नाम ) हैं । ( काशीस दो प्रकारका होता है- एक धातुकाशीस, दूसरा पुष्पकाशीस. इनमें धातुकाशीस हरे या लाल अथवा पीलेसे वर्णका होता है और पुष्पकाशीस सफेद वर्णका होता है ) काशीसको भांगरेके रसमें एक बार स्वेदन करनेसे ही शुद्ध होजाता है ॥ २३ ॥ काशीसके गुण । कांशीशं निर्मलं स्निग्धं चित्तनेत्ररुजापहम् । पित्तापस्मारशमनं रसवद्गुणकारकम् ॥ २४ ॥ काशीस-निर्मल है, स्निग्ध है, चित्तविकारनाशक, नेत्ररोग- हर, पित्तनाशक, अपस्मारको शमन करनेवाला और पारेके समान गुणकारी है ॥ २४ ॥