रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । देवे तो विमल ( रूपामक्खी ) और सोनामक्खी शुद्ध होजाते हैं ( कोई इसीको विमलभस्म मानते हैं ) ॥ २१०-२१२ ॥ जम्बीरस्य रसैः स्विन्ने मेषशृङ्गीरसैस्तथा । रम्भातोयेन वा पाच्यं घस्रं विमलशुद्धये ॥ १३ ॥ अन्यप्रकारसे शोधन-जम्बीरी नींबूके रसमें और मेढासिंगीके रसमें एवं केलाकंदके रसमें दोलायंत्रद्वारा एक दिन स्वेदन करे तो विमल ( रूपामक्खी ) शुद्ध होजाता है ॥ १३ ॥ सोनामक्खीके नाम । माक्षिके धातुमाक्षीकं तप्तस्तापिसमुद्भवम् । गारुडो माक्षिकः पक्षी बृहद्वर्ण इति स्मृतः ॥ १४ ॥ धातुमाक्षिक, तप्त, तापिसमुद्भव, गारुड, माक्षिक, पक्षी और बृहद्वर्ण यह सोनामक्खीके नाम हैं ॥ १४ ॥ उत्तम सुवर्णमक्खी । भंगे सुवर्णसंकाशो मनाक्कृष्णच्छविर्बहिः । बृहद्वर्ण इति ख्यातो माक्षिकः श्रेष्ठ उच्यते ॥ १५ ॥ जो सोनामक्खी तोड़नेसे भीतरसे सुवर्णके समान वर्णवाली हो और ऊपरसे किंचित् कृष्णवर्ण हो उस सोनामक्खीको बृहद्वर्ण कहते हैं, यह माक्षिक औषधिकर्ममें श्रेष्ठ कही है ॥ १५ ॥ अशुद्ध सोनामक्खीके दोष । मंदाग्निं बलहानिं च व्रणं विष्टम्भगात्ररुक् । कुरुते माक्षिको मृत्युमशुद्धो नात्र संशयः ॥ १६ ॥ बिना शुद्ध सोनामक्खी मंदाग्निकारक, बलनाशक, व्रणकारक, विष्टम्भ ( कबजी ) करनेवाली और अंगोंमें पीड़ा करनेवाली है एवं मृत्युको भी करनेवाली है इसमें सन्देह नहीं ॥ १६ ॥