भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ५३ ) गन्धकेन समं तुत्थं तुत्थार्द्धेनार्द्धयामकम् । वान्तिभ्रान्ती यदा न स्तस्तदा सिद्धिं विनिर्दिशेत्॥८॥ तीसरी विधि—नीलेथोथेसे आधा भाग गंधक मिला दोनोंको आधा प्रहर ( नींबूके रसमें ) मर्दन करे फिर संपुटमें रख कपडमिट्टी कर सुखा ले इस संपुटको लघुपुटमें फूंक दे फिर आधा भाग गंधक मिला आधा प्रहर रगड़कर पूर्ववत् संपुट बना लघुपुटमें फूंके ऐसे तीन पुट देवे तो वान्ति और भ्रांति आदि दोष रहित शुद्ध तुत्थ होजावेगा ॥ ८ ॥ तुत्थं सकटुकक्षारं कषायं विशदं लघु । लेखनं भेदि चक्षुष्यं कण्डूक्रिमिविषापहम् ॥ ९ ॥ तूतिया-कटु, क्षार, कषाय रसवाला है तथा विशद, हलका, लेखन, भेदी और नेत्ररोगनाशक है, एवं कण्डुनाशक, क्रिमियोंको हरनेवाला और विषको दूर करनेवाला है ॥ ९ ॥ विमल शोधन । मूत्रारनालतैलेषु गोदुग्धे कदलीरसे । कौलत्थे कोद्रवक्वाथे माक्षिकं विमलं तथा ॥ २१० ॥ मुहुः शूरणकन्दस्थं स्वेदयेद्वरवर्णिनि ॥ ११ ॥ क्षाराम्ललवणैश्चैव तैलसर्पिःसमन्वितम् । पुटत्रयं प्रदातव्यं ततस्तु शोधितं भवेत् ॥ १२ ॥ विमल ( रूपामाक्खी ) या सोनामाक्खीको जिमीकंदमें रखकर गोमूत्र, कांजी, तिलतैल, गोदुग्ध, केलेका रस, कुलथीका काढ़ा और कोदोंका काढ़ा इनमें दोलायंत्र द्वारा बार २ अलग २ स्वेदन करे तो रूपामाक्षिक और स्वर्णमाक्षिक शुद्ध होजायेंगे । अथवा सुहागा, बिजौ- रेका रस, सेंधानमक, तिलतैल और घृत मिलाकर मर्दन करे फिर लघु- पुटमें फूंकदे इस प्रकार सुहागा आदिमें तीन बार खरलकर तीन पुट