रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । (४१) मारक गण (१३ मारण) । तण्डुलीयक-बृहती-नागवल्ली पिण्डतगरपुनर्नवा- हिलमोचिकामण्डूकपर्णी । तिक्ताखुपर्णिकामद्- नार्कावपिलक्षसुतमातृकाभिः ॥ १६० ॥ चौलाई, कटेली, नागरवेल (पान), सिलहक, तगर, पुनर्नवा, हुलहुल, मण्डूकपर्णी (ब्राह्मी), कुटकी, मूषकपर्णी (दंती), मैनफल, आक और शतावर यह १३ द्रव्य अभ्रकको मारनेवाले हैं (शुद्ध अभ्रकको अलग २ इनके रसमें रगड़कर गजपुटमें फूंक देनेसे भस्म होजाता है) ॥ १६० ॥ चौथी विधि । रम्भादिनाभ्रं लवणेन पिष्ट्वा चक्रीकृतं तद्दलमध्य- वर्ति । दग्धेन्धनेषु व्यजनानिलेन स्नुह्यर्कमूला- म्बुपुटेन सिद्धम् ॥ १६१ ॥ रंभादिगणके रसमें अथवा केलाखार, सज्जीखार, चनाखार और नमक इनके जलोंमें शुद्ध अभ्रकको खूब घोटकर टिकिया बनाले इन टिकियोंको केलेके पत्रोंमें रख पंखेकी पवनसे चैतन्यकी हुई कोयलोंकी अग्निमें फूंके । फिर निकालकर थोहरके दूधमें घोटकर टिकिया बना संपुट करे और गजपुटमें फूंकदे । ऐसेही आकके दूधमें घोटकर टिकिया बना संपुट कर गजपुटमें फूंके तो अभ्रककी भस्म होजाती है ॥१६१॥ पांचवीं विधि । धान्याभ्रकस्य भागैकं भागौ द्वौ टङ्कणस्य च । पिष्ट्वा तदन्धमूषायां रुद्ध्वा तीव्राग्निना पचेत्॥१६२॥ स्वभावशीतलं चूर्णं सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ १६३ ॥ धान्याभ्रक एक भाग, सुहागा दो भाग इन दोनोंको इकट्ठेही घोट- कर अंधमूषामें बंदकर कोयलेकी तीव्र अग्निमें फूंक दे (अथवा गज-