रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । । अभ्रकके शोधनकी विधि । पादांशं शालिसंयुक्तमभ्रकं कम्बलोदरे । त्रिरात्रं स्थापयेन्नीरे तत्क्लिन्नं मर्दयेद्दृढम् ॥ १४७ ॥ कम्बलाद्गलितं श्लक्ष्णं वालुकारहितं च यत् । तद्धान्याभ्रमिति प्रोक्तमभ्रमारणसिद्धये ॥१४८॥ स्वच्छ वज्राभ्रक १ पाव, शालिधान्य १ सेर इन दोनोंको कंबलके टुकडेमें बांधकर जल ( कांजी ) में भिगो देवे तीसरे दिन निकालकर किसी बडी परातमें उस कंबलकी पोटलीको मसले जिससे सब अभ्रक बारीक होकर कंबलसे बाहर छनकर निकल आवे, उस स्वच्छ बारीक अभ्रकको ले लेवे इसमेंसे कोई कंकडी आदि अन्य वस्तु पहिलेही निकाल देना चाहिये । इसे धान्याभ्रक कहते हैं यही मारण आदि सब कर्मोंमें लेना चाहिये ॥ १४७ ॥ १४८ ॥ त्रिफलाक्वाथगोमूत्रक्षीरकासिकसेचितम् । भस्त्राग्नौ सप्तधा व्योम तप्तं तप्तं विशुद्ध्यति॥१४९॥ अन्य प्रकार-वज्राभ्रकको कोयलोंकी तीक्ष्णाग्निमें धोंकनीसे धमाकर लाल होनेपर त्रिफलेके क्वाथसे बुझावे ऐसे ही सात २ वार गरम करके त्रिफलेके क्वाथ, गोमूत्र, दूध और कांजीसे बुझावे तो अभ्रक शुद्ध होजाता है ॥ १४९ ॥ अथवा बदरीक्वाथे ध्मातमभ्रं विनिःक्षिपेत् । मर्दितं पाणिना शुष्कं धान्याभ्रादतिरिच्यते १५०॥ तीसरा प्रकार-अथवा अभ्रकको तीक्ष्णाग्निमें तपा २ कर बेरीके क्वाथमें बुझावे फिर सुखाकर हाथोंसे मलकर बारीक करले यह अभ्रक शुद्ध होता है और धान्याभ्रकसे भी अच्छा होता है ॥ १५० ॥