रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 50, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( २४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । कृष्णभस्म । कृष्णभस्म भवेत्तच्च पुनर्मर्म्मद्यं नियामकैः । दिनैकं पातयेद्यन्त्रे कन्दुकाख्ये न संशयः । मृतः सूतो भवेत्सत्यं तत्तद्रोगेषु योजयेत् ॥ ८४ ॥ धान्याभ्रक और पारद दोनों समान भाग ले आगे कही हुई मारक औषधियोंके रसमें एक दिन मर्दन करे फिर इस कल्कको कपड़े- पर लेपन कर बत्ती बनाले उस बत्तीको एरंडके तेलमें भिगोकर जलावै उसमेंसे जो तेलकी बूंदें गिरें उनको चीनीके पात्र वा घृतके चिकने पात्रमें ग्रहण करे, जो नीचे बैठजाय उस कृष्णवर्ण भस्मको नियामक औषधियोंके रसमें एक दिन मर्दन करे फिर कंदुक यंत्रमें पातन करले तो यह उत्तम कृष्णभस्म होजायगी इसको अनुपान भेदसे अनेक रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ८२-८४ ॥ चतुर्विध भस्मकी उत्तरोत्तर श्रेष्ठता । श्वेतं पीतं तथा रक्तं कृष्णञ्चेति चतुर्विधम् । लक्षणं भस्म सूतानां श्रेष्ठं स्यादुत्तरोत्तरम् ॥ ८५ ॥ पारेकी भस्म ४ प्रकारकी होती है-श्वेत, पीत, रक्त, कृष्ण इन चारों प्रकारकी पारदकी भस्ममें उत्तरोत्तर गुण अधिक जानने । यथा श्वेत भस्मकी अपेक्षा पीत भस्म श्रेष्ठ है और पीतभस्मकी अपेक्षा रक्त भस्म श्रेष्ठ है एवं रक्तभस्मकी अपेक्षा कृष्ण भस्मको श्रेष्ठ कहा है॥८५॥ मूषाके बनानेकी श्रेष्ठ विधि । द्वौ भागौ तुषदग्धस्य चैका वल्मीकमृत्तिका । लौहकिट्टस्य भागैकं श्वेतपाषाणभागिकम् ॥८६॥ नरकेशं समं पञ्च च्छागीक्षीरेण पेषयेत् । याममात्रं दृढं पश्चात्तेन मूषां प्रकल्पयेत् ॥ ८७ ॥ शोषयित्वा तु संलिप्य तत्कल्कैः सन्निरोधयेत् । वज्रमूषेयमाख्याता सम्यक् पारदसाधिका ॥८८॥