भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (२५) दो भाग तुषोंकी भस्म, एक भाग बम्बीकी मिट्टी और एक भाग लोहाकेट्ट, एक भाग श्वेत पत्थरका चूर्ण और एक भाग मनुष्यके केश ( बाल ) ये पांचों चीजें लेकर इनको बकरीके दूधमें एक पहर भर खूब घोटे फिर मूषा बनाकर धूपमें सुखा लेवे जब सूख जावे फिर उसीके कल्कसे लेप कर बंद कर देवे इसको वज्रमूषा कहते हैं । इसमें भली प्रकार पारेका संस्कार होता है ॥ ८६-८८ ॥ नियामक गण । सर्पाक्षी वन्यकक्कोटी कंचुकी यमचिंचिका । शतावरी शंखपुष्पी शरपुंखा पुनर्नवा ॥ ८९ ॥ मण्डूकपर्णी मत्स्याक्षी ब्रह्मदण्डी शिखंडिनी । अनन्ता काकजंघा च काकमाची कपोतिका ॥९०॥ विष्णुक्रांता सहचरा सहदेवी महाबला । बला नागबला मूर्वा चक्रमर्दः करञ्जकः ॥ ९१ ॥ पाठा तामलकी नीली जालिनी पद्मचारिणी । घण्टा त्रिकण्टगोजिह्वा कोकिलाक्षघनध्वनिः ॥९२॥ आखुपर्णी क्षीरिणी च त्रिपुषी मेषशृङ्गिका ॥ कृष्णवर्णा च तुलसी सिंहिका गिरिकर्णिका । एता नियामकौषध्यः पुष्पमूलदलान्विताः ॥९३॥ नाकुलीकंद, वांझककौडा, कंचुकी ( शिरीषवृक्ष ), यमचिंचा ( बृहद् इमली ), शतावर, शंखाहुली, सरफोंका, पुनर्नवा ( साँठी ), मंडूकपर्णी ( ब्राह्मी ), मत्स्याक्षी, ब्रह्मदण्डी, शिखंडिनी ( पीले वर्णकी जूही ), शारिवा, काकजंघा, मकोह, कपोतिका ( नलिका ), विष्णुक्रान्ता ( कोयल ), सहचरा ( पीयावासा ), सहदेवीं, महा- बला, बला, नागबला ( खरैटीके भेद ), मूर्वा, चक्रमर्द ( पनवाड़ ), लताकरंज, पाटला, पाठा, भूमि आमला, नीलनी, जालनी ( कड़वी -