भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । तोरी ), पद्मचारिणी ( गेंदा ), घंटा ( कठपाडर ), गोखरू, गोजिह्वा ( गोजियाघास ), तालमखाना, चौलाई, मूसाकनी, क्षीरिणी दूधली ), त्रपुषी ( खीरा ), मेढ़ासिंगी, काली तुलसी, श्वेत तुलसी, सिंहिका ( बड़ी कटेली ), श्वेत अपराजिता, यह सब पुष्प; मूल और पत्रयुक्त द्रव्य नियामक कहे हैं इनमें मर्दन करनेसे पारा स्थिर होजाता है ॥ ८९-९३ ॥ मारक गण । घनवचाचित्रकगोक्षुरकटुतुम्बीदंतिकाजाति । सर्पाक्षी शरपुंखा कन्या चांडालिनीकन्दम् ॥ ९४ ॥ विषमुष्टिवज्रवल्ल्यौ लज्जा देवदाली लाक्षा । सहदेवी नीपकणा निर्गुण्डी चक्रं लांगलिका ॥ ९५ ॥ माणार्कचन्द्ररेखा रविभक्ता काकमाचिका चार्कः । विष्णुक्रांता वायसतुण्डी वज्रो बला शुण्ठी चैव ॥९६॥ कोषातकी जयन्ती वाराही हस्तिशुण्डिका रम्भा । मत्स्याक्षी यमचिञ्चा हरिद्रे द्वे पुनर्नवाद्वितयम् ॥९७॥ धुस्तूरः काकजङ्घा शतावरी कंचुकी चैव वन्ध्या । तिलभेकपर्णिके दूर्वा मूर्वा हरीतकी तुलसी ॥९८॥ गोकण्टकाखुपण्यौ कर्कटीकन्दवर्गलता च । मूसली हिङ्गु गुडूची शिग्रुगिरिकर्णिका महाराष्ट्री ॥९९॥ मार्कवसैन्धवसरणी सोमलता श्वेतसर्षपासनञ्च । हंसपदीव्याघ्रपदीकिंशुकभल्लातकेन्द्रवारुणिका ॥१००॥ सर्वैश्चार्द्धांशं वा अष्टादशाधिका वापि द्रव्यम् । रसमारणमूर्च्छादौ च युक्तिज्ञैर्विधिबदुपयोज्यम् ॥१०१॥