भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

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( २२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । श्वेतभस्म (रसकपूरकी दूसरी विधि । सुधानिधि रस) । पिष्टं पांसुपटुप्रगाढममलं वज्रच्यम्बुना नैकशः, सूतं धातुगतं खटीकवलितं तं सम्पुटे रोधयेत् । अन्तःस्थं लवणस्य तस्य च तले प्रज्वाल्य वह्निं दृढं घस्रं ग्राह्यमथेन्दुकुन्दधवलं भस्मोपरिस्थं शनैः ॥ तद्वल्लद्वितयं लवङ्गसहितं प्रातः प्रयुक्तं भजे- दूर्ध्वं रेचयति द्वियाममसकृत्पेयं जलं शीतलम् ७५ पांसुनमक और शुद्ध पारा इन दोनोंको थोहरके दूधमें अनेक वार घोटे जब पारा और नमक थोहरके दूधमें मिलजावे तो इसको एक लोहेके पात्रमें डाल उस पात्रको खड़िया मिट्टीसे बंद कर संपुट करे फिर एक बडे मिट्टीके पात्रमें सेंधानमक भरकर उस नमकके मध्यमें यह लोहेका संपुट टिका दे, ऊपरसे नमक डालकर संपुटको नमकके मध्यमें छिपा दे फिर इस नमकवाले मिट्टीके पात्रको चूल्हेपर रख इसके नीचे तीक्ष्ण अग्नि जलावे, ४ पहरकी आंच देनेके अनंतर इसको स्वांग शीतल होने दे । फिर संपुटके ऊपरके भागमें लगे हुए सफेद पदार्थको युक्तिसे निकालले यह पारेकी सफेदभस्म है इसको छः रत्ती लेकर २।। मासे लौंगोंके चूर्णमें मिला प्रातःकाल खिलावे तो दोपहरके बाद दस्त होंगे । इसके ऊपर शितल जल पिलाना चाहिये । इसीको रसमंजरीमें रसकपूर और रसचंद्रिकामें भस्म लिखा है ( यह रक्तगत विष और गर तथा उपदंशादि विकारोंमें प्रयोग करना चाहिये ) इस ग्रंथमें इसीको सुधानिधि रस कहा है ॥ ७५ ॥ सर्वाङ्गसुंदर रस ( पीतभस्म ) मर्दयेद्रसगन्धौ च हस्तिशुण्डीद्रवैर्दृढम् । भूधात्रिकार सैर्वापि पर्यन्तं दिनसप्ततः ॥ ७६ ॥