भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (२१) स्फोटयित्वा तु मुक्ताभमूर्द्ध्लग्नं वलिं त्यजेत् । अधःस्थं रससिन्दूरं सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ७२ ॥ अन्य प्रकार-पारा, गंधक, नौसादर, गृहधूम, फिटकिरी इन सबको चार चार तोला अलग २ लेकर नींबूके रसमें एक पहर मर्दन करके आतशी शीशीमें भरकर शीशीका मुख ईंट या पत्थरके डाटसे बंद् कर सात कपड़मिट्टी चढ़ाकर सुखाले फिर एक बड़ी चाटी (मिट्टीका पात्र) ले उसके तल भागमें छिद्र कर उस छेदपर शीशी रखकर पात्रको गलपर्यंत वालु (रेत) से भरदे (इसको वालुका यंत्र कहतें हैं ) इस यंत्रको चूल्हे पर चढ़ाकर क्रमसे मंद, मध्य और तीक्ष्ण अग्नि देवे ऐसे बारह (१२) पहर अग्नि देनेके अनंतर आग बुझा दे । स्वांग शीतल होनेपर शीशीको फोड़ कर उसमेंसे मोतीके समान चमकदार शीशीमें लगे हुए पारेको निकाल ले और स्याही तथा पीले वर्णके गंधकको जो ऊपर नलीमें लगा हो अलग निकाल लेवे, शीशीके पेटमें लगे हुए रससिंदूरको लेकर सब रोगोंमें प्रयोग करे ॥ ६८-७२ ॥ रसकपूरकी विधि । टंकणं मधु लाक्षा च ऊर्णागुञ्जायुतो रसः । मर्दितो भृङ्गजद्रावैर्दिनं सम्पुटमागतम् ॥ ७३ ॥ ध्मातो भस्मत्वमाप्नोति शुद्धकर्पूरसन्निभम् ॥ ७४ ॥ सुहागा, मधु (शहद), लाख, भेडकी ऊन, सफेद घुंघुची (श्वेतगुंजा) और पारा इन सबको भांगरेके रसमें खरलकर एक हांडीमें बंद करके कोयलोंकी तीन या चार पहर आंच देवे और धोंकनीसे मंद २ धोंकता रहे तो शुद्ध कपूरके समान भस्म होकर ऊपरकी ओर उड़कर लग जायगी, इसको रसकपूर कहते हैं (यह भी मूर्च्छित है भस्म नहीं, इसको उपदंशादि रोगोंमें प्रयोग करना चाहिये) ॥ ७३ ॥ ७४ ॥