रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 39, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( १३ ) रसाधो ज्वालयेदग्निं यावत्सूतों जलं विशेत् । तिर्यक्पातनमित्युक्तं सिद्धैर्नागार्जुनादिभिः ॥ ४४ ॥ एक बडे अच्छे घडेमें पारा डाल दे और दूसरे वैसेही घडेमें पानी डाले फिर दोनों घटोंको तिरछे करके विधिवत् दोनोंके मुख जोड देवे। फिर पारेवाले घटके नीचे अग्नि जलावे तो पारा उडकर पानीमें चला जायगा । इस पारदके संस्कारको नागार्जुन आदि सिद्धोंने तिर्यक्- पातन संस्कार कहा है ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ बोधनसंस्कार । एवं कदर्थितः सूतः षण्ढत्वमधिगच्छति । तन्मुक्तयेऽस्य क्रियते बोधनं कथ्यते हि तत् ॥ ४५ ॥ इस प्रकार मर्दन और पातन आदि करनेसे कंचुकी आदि दोष तो दूर हो जाते हैं परंतु पारेमें षण्ढत्व ( नपुंसकता ) आजाती है । उस षण्ढत्वके दूर करनेको हम बोधन संस्कार कहते हैं ॥ ४५ ॥ विश्वामित्रकपाले वा काचकूप्यामथापि वा । सूतं विनिक्षिप्य जलं तत्र तन्मज्जनावधि ॥ ४६ ॥ पूरयेत्रिदिनं भूम्यां गजहस्तप्रमाणतः । अनेन सूतराजोऽयं षण्ढभावं विमुञ्चति ॥ ४७ ॥ नारियलमें या काचकी शीशीमें पारा डालकर उसमें इतना पानी डाले जिसमें पारा डूबजावे फिर इसका मुख बंद करके डेढगज गहरे गढेमें दबादे चौथे दिन निकाल ले तो पारेका षण्ढत्व दूर होजाता है। कोई इस पारेको नारिकेल या शीशीमें डालकर इसमें नमकका पानी डाल पृथ्वीमें गाडे ऐसा मानते हैं । कहीं “ सूतं विनिक्षिप्य जलं ” इस पाठकी जगह “ सृष्ट्यंबुजं विनिक्षिप्य ” ऐसा पाठ लिखकर सोलह वर्षकी स्त्रीका मासिक रज डालना ऐसा मानते हैं ॥४६॥४७॥ २