भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( १४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । हिंगुलसे पारा निकालनेकी विधि । अथवा हिंगुलात्सूतं ग्राहयेत्तन्निगद्यते । जम्बीरनिम्बुनीरेण मर्दितो हिंगुलो दिनम् ॥ ४८ ॥ ऊर्ध्वपातनयन्त्रेण ग्राह्यः स्यान्निर्मलो रसः । कंचुकैर्नागवङ्गाद्यैर्निर्मुक्तो रसकर्मणि । विना कर्माष्टकेनैव सूतोऽयं सर्वकर्मकृत् ॥ ४९ ॥ जहांपर संस्कारशुद्ध पारद् न मिल सके तो सिंगरफसे निकाला हुआ पारा लेना चाहिये सो सिंगरफसे पारा निकालनेकी विधि कहते हैं- सिंगरफको एक दिन नींबूके रसमें मर्दन करके ऊर्ध्वपातन यंत्रद्वारा पारा निकाल ले । यह पारा मलरहित सप्तकंचुकी और नाग वंगादि दोष रहित होता है यह हिंगुलसे निकाला हुआ पारा अष्ट संस्कारके विनाही सब कर्ममें लेने योग्य होता है ॥ ४८ ॥ ४९ ॥ पारदके अष्ट संस्कार । स्वेदनं मर्दनञ्चैव मूर्च्छनोत्थापनं तथा । पातनं बोधनञ्चैव नियामनमतः परम् । दीपनञ्चेति संस्काराः सूतस्याष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ ५० ॥ स्वेदन, मर्दन, मूर्च्छन, उत्थापन, पातन, बोधन, नियामन और दीपन यह पारेके आठ संस्कार कथन किये हैं । वह इस प्रकार हैं- ( १ ) त्रिफला, त्रिकुटा, चित्रक, घीकुमार और कांजी इन सबको एक घडेमें डालकर चूल्हेपर रक्खे, इस घडेमें किसी अच्छे गाढे वस्त्रको चौलड ( चार तह ) करके उसमें पारेको बांधकर दोलायंत्रके विधानसे लटकावे नीचे आग जलावे इस प्रकार घडेके कांजीवाले पानीमें तीन दिन पकानेको स्वेदन संस्कार कहते हैं । अथवा त्रिकुटा, नमक, राई, मूलीके बीज, त्रिफला, अदरख, महाबला, नागबला, चौलाई, पुनर्नवा, मेढासिंगी, चित्रक और नौसादर इनको धान्याम्ल ( धान्योंकी कांजी ) में रगड़कर एक गाढे वस्त्रपर एक अंगुल मोटा

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