रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । ऊपरके घटमें उडकर लगे हुए पारदको निकाल ले । इसको वैद्योंने ऊर्ध्वपातन यंत्र ( डमरुयन्त्र ) कहा है । यह पारेके शोधनमें ऊर्ध्वपातन संस्कार है ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ अधःपातनसंस्कार । नवनीताह्वयं सूतं घृष्ट्वा जम्भाम्भसा दिनम् । वानरी-शिग्रु-शिखिभिः सैन्धवा-ऽऽसुरिसंयुतैः॥४०॥ नष्टपिष्टं रसं कृत्वा लेपयेदूर्ध्वभाण्डके । ऊर्ध्वभाण्डोदरं लिप्त्वाऽधोभाण्डं जलसंयुतम् ॥४१॥ सन्धिलेपं द्वयोः कृत्वा तद्यन्त्रं भुवि पूरयेत् । उपरिष्टात्पुटे दत्ते जले पतति पारदः । अधःपातनमित्युक्तं सिद्धाद्यैः सूतकर्मणि ॥ ४२ ॥ शुद्ध आमलासार गंधक और पारेको एक दिन जम्बीरीरसमें खरल कर कजली बना ले, इस कजलीमें कौंचके बीज, सहँजनेके बीज, अपामार्ग (औंगा, चिरचिटा ) के बीज, सेंधानमक और राई मिलाकर जम्बीरीके रसमें घोटे । जब सब मिलकर पीठीसी बन जावे तो इस पीठीको ऊपरके घटमें लेप करदे, नीचेके पात्रमें पानी भरकर ऊपरका लेपवाला पात्र पानीवाले पात्रके मुखपर अधोमुख रख- कर दोनोंके मुखको कपडमिट्टीसे बंद करदे फिर पानीवाले पात्रको मुखपर्य्यंत पृथ्वीमें गाड दे, ऊपरवाले अधोमुख पात्रके सब ओर आरने उपले लगा कर अग्नि देवे तो सब पारा नीचे पानीमें चला जावेगा । पारेके संस्कारोंमें सिद्धादिकोंने इसको अधःपातन संस्कार कहा है ॥ ४०–४२ ॥ तिर्यक्पातनसंस्कार । घटे रसं विनिक्षिप्य सजलं घटमन्यकम् । तिर्यङ्मुखं द्वयोः कृत्वा तन्मुखं रोधयेत्सुधीः ॥ ४३ ॥