भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । (३१५) इयं यदि सदा सेव्या तदा स्याद्योगवाहिका ॥ वृद्धोऽपि तरुणः शक्तः स्त्रीशतेषु वृषायते ॥७२॥ पारा १ भाग और गंधक २ भाग लेवे, दोनोंकी एकत्र कजली बनाकर उसमें त्रिकुटा ३ भाग और त्रिफला ३ भाग मिलावे । फिर बकरीके दूधकी भावना देकर गोली बनाकर अदरखके साथ सेवन करे और ऊपरसे थोड़ा शीतल जल पीवे । यह औषधि खाँसी और श्वासको हरनेवाली और अग्निको दीपन करनेवाली है । इस योगवाही औषधिको नित्य प्रातःकाल सेवन करनेसे वृद्ध मनुष्य भी तरुणके समान होजाता है तथा सौ स्त्रियोंसे रमण करनेको समर्थ होता है । इसको पुरन्दरवटी कहते हैं ॥ ७०-७२ ॥ कासांतक रस । सूतं गन्धं विषञ्चैव शालपर्णी च धान्यकम् । यावन्त्येतानि चूर्णानि तावन्मात्रं मरीचकम् ॥ गुञ्जाचतुष्टयं खादेन्मधुना कासशान्तये ॥ ७३ ॥ पारा, गंधक, विष, शालिपर्णी और धनिया यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग और कालीमिरचोंका चूर्ण पांच भाग लेवे, सबको एकत्र पीसकर चार २ रत्ती परिमाण सहतके साथ सेवन करनेसे कासरोग नष्ट होता है । इसको कासान्तक रस कहते हैं ॥ ७३ ॥ कासकुठार रस । हिंगुलं मरिचं गन्धं सव्योषं टंकणन्तथा । द्विगुञ्जमार्द्रकद्रावैः सन्निपातं सुदारुणम् ॥ कासं नानाविधं हन्ति शिरोरोगं विनाशयेत् ॥७४॥ हिंगुल, काली मिरच, गंधक, सोंठ, मिरच, पीपल और सुहागा यह प्रत्येक औषधि एक एक भाग लेवे, सबको एकत्र बारीक खरल करके दो रत्ती परिमाण औषधि अदरखके रसके साथ सेवन करनेसे